विज्ञानसहित ज्ञान क्या है?
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विज्ञानसहित ज्ञान क्या है?

एक बार सुकरात से किसी धनी आदमी ने कहाः

"आप कहें तो मैं आपके लिए लाखों रूपये, लाखों डॉलर खर्च कर सकता हूँ। आप जो चाहे खरीद सकते हैं। बस एक बार मेरे साथ बाजार में चलिए।"

सुकरात उस धनी व्यक्ति के साथ बाजार में घूमने गये। बड़े-बड़े दुकान देखे। फिर दुकान से बाहर निकलकर सुकरात खूब नाचने लगे। सुकरात को नाचते हुए देखकर उस धनी व्यक्ति को चिन्ता हो गयी कि कहीं वे पागल तो नहीं हो गये? उसने सुकरात से पूछाः "आप क्यों नाच रहे हैं?"

तब सुकरात बोलेः "तुम मेहनत करके डॉलर कमाते हो। डॉलर खर्च करके वस्तुएँ लाते हो और वस्तुएँ लाकर भी सुखी ही तो होना चाहते हो फिर भी तुम्हारे पास सुख नहीं है जो मुझे इन सबके बिना ही मिल रहा है। इसी बात से प्रसन्न होकर मैं नाच रहा हूँ।"

भारत ने सदैव ऐसे सुख पर ही नजर रखी है जिसके लिए किसी बाह्य परिस्थिति की गुलामी करने की आवश्यकता न हो, जिसके लिए किसी का भय न हो और जिसके लिए किसी का शोषण करने की ज़रूरत न हो। बाहर के सुख में तो अनेकों का शोषण होता है। सुख छिन न जाये इसका भय होता है और बाह्य परिस्थितियों की गुलामी भी करनी पड़ती है।

भगवान कहते हैं- 'मैं तेरे लिए विज्ञानसहित ज्ञान को पूर्णतया कहूँगा..."

यह विज्ञानसहित ज्ञान क्या है? 

आत्मा के बारे में सुनना ज्ञान है। आत्मा एकरस, अखंड, चैतन्य, शुद्ध-बुद्ध, सच्चिदानंदरूप है। देव, मनुष्य, यक्ष, गंधर्व, किन्नर सबमें सत्ता उसी की है' – यह है ज्ञान और इसका अपरोक्ष रूप से अनुभव करना - यह है विज्ञान।

ज्ञान तो ऐसे भी मिल सकता है लेकिन विज्ञान या तत्त्वज्ञान की निष्ठा तो बुद्ध पुरुषों के आगे विनम्र होकर ही पायी जा सकती है। संसार को जानना है तो संशय करना पड़ेगा और सत्य को जानना हो संशयरहित होकर श्रद्धापूर्वक सदगुरु के वचनों को स्वीकार करना पड़ेगा।'

आप गये मन्दिर में। भगवान की मूर्ति को प्रणाम किया। तब आप यह नहीं सोचते कि "ये भगवान तो कुछ बोलते ही नहीं हैं... जयपुर से साढ़े आठ हजार रूपये में आये हैं.... 'नहीं नहीं, वहाँ आपको संदेह नहीं होता है वरन् मूर्ति को भगवान मानकर ही प्रणाम करते हो क्योंकि मूर्ति में प्राणप्रतिष्ठा हो चुकी है। धर्म में सन्देह नहीं, स्वीकार करना पड़ता है और स्वीकार करते-करते आप एक ऐसी अवस्था पर आते हो कि आपकी अपनी जकड़-पकड़ छूटती जाती है एवं आपकी स्वीकृति श्रद्धा का रूप ले लेती है। श्रद्धा का रूप जब किसी सदगुरु के पास पहुँचता है तो फिर श्रद्धा के बल से आप तत्त्वज्ञान पाने के भी अधिकारी हो जाते हो। यही है ज्ञानसहित विज्ञान।

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