श्री कृष्ण का 'मैं' वास्तव में सबका 'मैं' है
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श्री कृष्ण का 'मैं' वास्तव में सबका 'मैं' है

श्रीमद् भगवद् गीता के सातवें अध्याय के पहले एवं दूसरे श्लोक में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युंजन्मदाश्रयः।

असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।।

'हे पार्थ ! मुझमें अनन्य प्रेम से आसक्त हुए मन वाला और अनन्य भाव से मेरे परायण होकर, योग में लगा हुआ मुझको संपूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणों से युक्त सबका आत्मरूप जिस प्रकार संशयरहित जानेगा उसको सुन।'

मय्यासक्तमनाः अर्थात् मुझमें आसक्त हुए मनवाला।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि 'मुझमें' यानि भगवान के 'मैं' का ठीक अर्थ समझा जाये। अगर भगवान के 'मैं' का सही अर्थ नहीं समझा और हममें आसक्ति है तो हम भगवान के किसी रूप को 'भगवान' समझेंगे। यदि हममें द्वेष है तो हम कहेंगे कि 'भगवान कितने अहंकारी हैं?' इस प्रकार अगर हमारे चित्त में राग होगा तो हम श्री कृष्ण की आकृति को पकड़ेंगे और अगर द्वेष होगा तो श्री कृष्ण को अहंकारी समझेंगे।

श्री कृष्ण कह रहे हैं 'मुझमें आसक्त...' जब तक श्री कृष्ण का 'मैं' समझ में नहीं आता अथवा जब तक श्री कृष्ण के 'मैं' की तरफ नज़र नहीं है तब तक श्री कृष्ण के इशारे को हम ठीक से नहीं समझ सकते। सच पूछो तो श्री कृष्ण का 'मैं' वास्तव में सबका 'मैं' है

श्रीकृष्ण ने गीता ने कही नहीं वरन् श्री कृष्ण द्वारा गीता गूँज गयी। हम जो कुछ करते हैं। इस प्रकार करने वाले परिच्छिन्न को मौजूद रखकर कुछ कहें। श्री कृष्ण के जीवन में अत्यन्त सहजता है, स्वाभाविकता है। तभी तो वे कहते सकते हैं- 'मय्यासक्तमना.....बनो'

'आसक्ति..... प्रीति....' शब्द तो छोटे हैं, बेचारे हैं। अर्थ हमें लगाना पड़ता है। जो हमारी बोलचाल की भाषा है वही श्रीकृष्ण बोलेंगे.. जो हमारी बोलचाल की भाषा है वही गुरु बोलेंगे। भाषा तो बेचारी अधूरी है। अर्थ भी उसमें हमारी बुद्धि के अनुसार लगता है। लेकिन हमारी बुद्धि जब हमारे व्यक्तित्व का, हमारे देह के दायरे का आकर्षण छोड़ देती है तब हम कुछ-कुछ समझने के काबिल हो पाते हैं और जब समझने का काबिल होते हैं तब यही समझा जाता है कि हम जो समझते हैं, वह कुछ नहीं। आज तक हमने जो कुछ जाना है, जो कुछ समझा है, वह कुछ नहीं है। क्योंकि जिसको जानने से सब जाना जाता है उसे अभी तक हमने नहीं जाना। जिसको पाने से सब पाया जाता है उसको नहीं पाया।

बुद्धि में जब तक पकड़ होती है तब तक कुछ जानकारियाँ रखकर हम अपने को जानकर, विद्वान या ज्ञानी मान लेते हैं। अगर बुद्धि में परमात्मा के लिए प्रेम होता है, आकांक्षाएँ नहीं होती हैं तो हमने जो कुछ जाना है उसकी कीमत कुछ नहीं लगती वरन् जिससे जाना जाता है उसको समझने के लिए हमारे पास समता आती है। भाषा तो हो सकती है कि हम 'ईश्वर से प्रेम करते हैं' किन्तु सचमुच में ईश्वर से प्रेम है कि पदार्थों को सुरक्षित रखने के लिए हम ईश्वर का उपयोग करते हैं? हमारी आसक्ति परमात्मा में है कि नश्वर चीजों को पाने में है? जब तक नश्वर चीजों में आसक्ति होगी, नश्वर चीजों में प्रीति होगी और मिटनेवालों का आश्रय होगा तब तक अमिट तत्त्व का बोध नहीं होगा और जब तक अमिट तत्त्व का बोध नहीं होगा तब तक जन्म-मरण क चक्र भी नहीं मिटेगा।

श्री कृष्ण कहते हैं- मय्यासक्तमनाः पार्थ.... यदि सचमुच ईश्वर में प्रीति हो जाती है तो ईश्वर से हम नश्वर चीजों की माँग ही नहीं करते। ईश्वर से, संत से यदि स्नेह हो जाये तो भगवान का जो भगवद् तत्त्व है, संत का जो संत तत्त्व है, वह हमारे दिल में भी उभरने लगता है।

हमारे चित्त में होता तो है संसार का राग और करते हैं भगवान का भजन... इसीलिए लम्बा समय लग जाता है। हम चाहते हैं उस संसार को जो कभी किसी का नहीं रहा, जो कभी किसी का तारणहार नहीं बना और जो कभी किसी के साथ नहीं चला। हम मुख मोड़ लेते हैं उस परमात्मा से जो सदा-सर्वदा-सर्वत्र सबका आत्मा बनकर बैठा है। इसीलिए भगवान कहते हैं- 'यदि तुम्हारा चित्त मुझमें आसक्त हो जाये तो मैं तुम्हें वह आत्मतत्त्व का रहस्य सुना देता हूँ।'

जब तक ईश्वर में प्रीति नहीं होती तब तक वह रहस्य समझ में नहीं आता। श्री वशिष्ठ जी महाराज कहते हैं- 'हे राम जी! तृष्णावान के हृदय में संत के वचन नहीं ठहरते। तृष्णावान  से तो वृक्ष भी भय पाते हैं' इच्छा-वासना-तृष्णा आदमी की बुद्धि को दबा देती है।

दो प्रकार के लोग होते हैं- एक तो वे जो चाहते हैं कि 'हम कुछ ऐसा पा लें जिसे पाने के बाद कुछ पाना शेष न रहे।' दूसरे वे लोग होते हैं जो चाहते हैं कि 'हम जो चाहें वह हमें मिलता रहे।' अपनी चाह के अनुसार जो पाना चाहते हैं ऐसे व्यक्तियों की इच्छा कभी पूरी नहीं होती क्योंकि एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा खड़ी होती है और इस प्रकार इच्छा पूरी करते-करते जीवन ही पूरा हो जाता है। दूसरे वे लोग होते हैं जिनमें यह जिज्ञासा होती है किः 'ऐसा कुछ पा लें कि जिसे पाने के बाद और कुछ पाना शेष न रहे।' ऐसे लोग विरले ही होते हैं। ऐसे लोग ठीक से इस बात को समझते हैं किः 'ईश्वर के सिवाय, उस आत्मदेव के सिवाय और जो कुछ भी हमने जाना है उसकी कीमत दो कौड़ी की भी नहीं है। मृत्यु के झटके में वह सब पराया हो जायेगा।'

पाश्चात्य जगत बाहर के रहस्यों को खोजता है। एक-एक विषय की एक-एक कुंजी खोजता है जबकि भारत का अध्यात्म जगत सब विषयों की एक ही कुंजी खोजता है, सब दुःखों की एक ही दवाई खोजता है, परमात्मस्वरूप खोजता है।

सब दुःखों की एक दवाई

अपने आपको जानो भाई।।

श्री कृष्ण का इशारा सब दुःखों की एक दवाई पर ही है जबकि पाश्चात्य जगत का विश्लेषण एक-एक विषय की कुंजी खोजते-खोजते भिन्न-भिन्न विषयों और कुंजियों में बँट गया।

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