श्रद्धा के साथ तत्परता चाहिए
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श्रद्धा के साथ तत्परता चाहिए

श्रद्धा के साथ तत्परता चाहिए

 

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शांतिमचिरेणाधिगच्छति।।

'जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के, तत्काल ही भगवत्प्राप्ति रूप परम शांति को प्राप्त हो जाता है।'

(भगवदगीताः 4.31)

भगवान श्रीकृष्ण यहाँ जो ज्ञान कहते हैं वह परमात्म-तत्त्व के ज्ञान से सम्बन्धित है। एक होता है ऐहिक ज्ञान और दूसरा होता है वास्तविक ज्ञान। वास्तविक ज्ञान की सत्ता से ही ऐहिक ज्ञान की गाड़ी चलती है। वास्तविक शुद्ध ज्ञान की सत्ता लेकर ही हमारी इन्द्रियाँ, हमारा मन सब अलग-अलग दिखाकर, भेद की कल्पना करके व्यवहार करते हैं। जब तक यह जीव वास्तिवक ज्ञान में टिकता नहीं तब तक उसे परम शांति नहीं मिलती। जब तक परम शांति नहीं मिली तब तक इस जीव के जन्म-मरण के दुःख, मुसीबतें और कष्ट का अन्त नहीं आता।

आधिदैविक शांति और आधिभौतिक शांति याने मानसिक शांति, ये शांतियाँ तो बेचारी कई बार आती हैं और चली जाती हैं। जब आत्मज्ञान होता है, आत्म-साक्षात्कार होता है तब आध्यात्मिक शांति, परम शांति का अनुभव होता है। एक बार परम शांति मिली तो वह जाती नहीं।

लब्ध्वा ज्ञानं परां शांतिम्.....।

परम शांति कब और कैसे आती है ?

अचिरेणाधिगच्छति।

ज्ञान हुआ कि परम शांति आ गई। उसमें समय नहीं लगता।

ज्ञान पाने के लिए भगवान साधन बता रहे हैं-

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।

कई बार हमें कहा जाता है कि, बस, 'श्रद्धा करो.... मान लो... कुछ बोलने की जरूरत नहीं है।' हम श्रद्धा करें और हमारी श्रद्धा का कोई उपयोग कर ले, दुरूपयोग कर ले और हमारे मन-बुद्धि कुण्ठित रह जाएँ तो ?

यहाँ सावधानी रखनी है। श्रीमद आद्य शंकराचार्य ने कहा हैः "श्रद्धा का अर्थ यह नहीं कि किसी मजहब को, किसी मत को, किसी पंथ को मानकर किसी कोने में जीवन भर पड़े रहो, कोल्हू के बैल की तरह वर्तुल में घूमते रहो... इसका नाम श्रद्धा नहीं है।"

श्रद्धालु लोगों को कई बार ऐसा लगता है कि उनमें बहुत श्रद्धाभाव है। ऐसे श्रद्धालुओं को उनकी श्रद्धा का माप निकालने के लिए अवसर देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं- आपकी श्रद्धा कितनी है उसे जानना चाहो तो सोचो, साधन भजन में आपकी तत्परता कितनी है, मुक्तिलाभ के लिए आपमें तत्परता कितनी है। आप में जितनी तत्परता होगी उतना इन्द्रियसंयम होगा। जितना इन्द्रियसंयम होगा उतनी अन्तरात्मा बलवान होगी। सुख-दुःख में आप हिलेंगे नहीं। ऐसा अवसर आयेगा कि विश्व का बड़े-में-बड़ा ऐहिक लाभ भी आपको उल्लू नहीं बनायगा, बड़े-में-बड़ी हानि भी आपको परेशान नहीं करेगी।

उल्लू को जैसे सूर्य नहीं दिखता ऐसे ही जिसको अपनी असलियत नहीं दिखती वही आदमी छोटी-छोटी चीजों में सुखी-दुःखी होकर, परिस्थितियों से प्रभावित होकर अपने आपको नष्ट कर देता है।

श्रद्धा तो हर जगह करनी ही पड़ती है। भक्तिमार्ग में भी श्रद्धा की आवश्यकता है और व्यवहार में भी श्रद्धा की आवश्यकता है। 'व्यापार में मुनाफा होगा' इस श्रद्धा के साथ ही व्यापार-धंधा किया जाता है। बद्रीनाथ जाते-जाते कई गाड़ियाँ गिर पड़ती हैं फिर भी लोग ड्राइवर पर विश्वास करके बस में बैठते हैं। अपने बाप के विषय में भी श्रद्धा करनी पड़ती है। माँ ने कह दिया और बेटे ने मान लिया। चाचा-मामा भी श्रद्धा से मान लिया। हम गुजराती हैं, मारवाड़ी हैं, सिन्धी हैं यह भी तो हमने सुन-सुनकर माना है।

यह सब व्यवहारिक श्रद्धा है। श्रीकृष्ण जिस श्रद्धा की बात कहते हैं वह श्रद्धा है अपने आत्मदेव को पाने की, जन्म-मृत्यु जरा व्याधि से सदा के लिए छूटने की, तमाम-तमाम मुसीबतों से सदा के लिए जान छुड़ाने की।

जो सदा परिवर्तनशील है उस संसार के प्रति हमारा आकर्षण है और जो सदा अचल है उसके प्रति हमारी श्रद्धा नहीं है। अचल तत्त्व को पाने के लिए हममें उत्साह नहीं है इसलिए हम अशान्त होते हैं। जो नश्वर चीजें हैं, चल वस्तुएँ हैं उनकी पाकर सुखी होने की हमारी नादानी बनी रही है। जो वास्तव में शांतस्वरूप है, सुखस्वरूप है, जिसको पाने के बाद और कुछ पाना शेष नहीं रहता, जिसमें स्थित होने के बाद मौत की भी मौत हो जाती है ऐसे परमात्मतत्त्व को पाने की अगर तत्परता आ जाय, अपने उस वास्तविक स्वरूप में टिकने की दृढ़ता आ जाय तो शांति तो हमारा स्वभाव है।

शांति आपका स्वभाव है, अमरता आपका स्वभाव है, आपको पता नहीं। मरने वाले शरीर और मिटनेवाली वस्तुओं से हम इतने विमोहित हो गये कि अपनी अमरता का ज्ञान हमने आज तक नहीं पाया।

अपने मुँह में बत्तीस दाँत हैं। हैं तो पत्थर लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि 'ये पत्थर क्यों मुँह में पड़े हैं ? उसे निकालकर फेंक दूँ।' ऐसा विचार कभी नहीं आता। रोटी-सब्जी खाते-खाते कुछ तिनका दाँत में फँस जाता है तो जीभ वहाँ बार-बार जाती है। जब तक उसको निकाल नहीं देती तब चैन नहीं लेती। मुँह में दाँत होना स्वाभाविक है। लेकिन दाँतों के बीच कुछ फँस जाना यह अस्वाभाविक है। अस्वाभाविकता को हटाना पड़ता है।

ऐसे ही सुखी और शांतिपूर्ण जीवन सब चाहते हैं। दुःख और अशांति कोई नहीं चाहता। सुख और शांति प्राणी का मूल स्वभाव है। दुःख और अशांति मन की बेवकूफी से.... इच्छा और वासना की बेवकूफी से आती है।

कोई नहीं चाहता कि मुझे दुःख मिले, अशांति मिले। शांति और सुख तुम्हारा स्वभाव है। यह आपकी स्वाभाविक माँग है। अशांति और दुःख आपकी माँग नहीं, फिर भी अशांति और दुःख पैदा करे ऐसे विकारों के साथ, ऐसी तुच्छ चीजों के साथ आप मिल जाते हैं। मिलने की इस आदत को तोड़ने के लिए साधन में तत्परता होनी चाहिए।

साध्य को पाय बिना साधक क्यों रह जाय ?

साध्य को पाय बिना अगर साधक रह जाता है तो परमात्मा में उसकी इतनी श्रद्धा नहीं है। कोई मत-पंथ-सम्प्रदाय बोले कि 'तुम मर जाओगे तब तुम्हें कन्धों पर उठाकर ले जाएँगे।' ....तो यह अन्धश्रद्धा है।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि श्रद्धा के साथ तत्परता हो। अगर मरने के बाद कोई किसी को कन्धों पर उठाकर कहीं ले जाता हो तो भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवदगीता कही क्यों ? अर्जुन को इतना ही कहते कि युद्ध कर ले... तू मर जायगा तो तुम्हें कन्धों पर उठाकर मुक्त कर दूँगा। वसिष्ठजी महाराज ने राम जी को आत्मज्ञान का उपदेश क्यों दिया ? राजा जनक को भी अष्टावक्र बोल देते कि तुम नामदान ले लो, मरने के बाद मैं कन्धों पर चढ़ाकर पहुँचा दूँगा।

नहीं...। श्रद्धा के साथ तत्परता चाहिए। ज्ञान के लिए साधन में तत्पर होगा तो इन्द्रियों में संयम आयेगा। असंयमी इन्द्रियाँ मन और देह को कमजोर कर देती है। छोटी-छोटी बातों का प्रभाव जिस आदमी के चित्त पर पड़ जाता है वह आदमी बहुत छोटा हो जाता है।

तुम किसी आदमी का भविष्य जानना चाहते हो तो देखो कि उससे बात करते-करते छोटी-छोटी बातों का प्रभाव उसके चित्त पर पड़ता है कि नहीं। छोटी-छोटी बातों का प्रभाव पड़ता है तो समझ लेना, उसका भविष्य छोटा है। जिस पर छोटी-छोटी बातों का प्रभाव नहीं पड़ता उसका हृदय विशाल होता चला जायगा। ज्यों-ज्यों छोटे-छोटे प्रसंगों का, छोटे-छोटे सुख-दुःखों का, मान-अपमान का प्रभाव चित्त पर कम पड़ेगा त्यों-त्यों उसकी साध्य के प्रति तत्परता सिद्ध होती जाएगी, उसका हृदय विशाल होता जाएगा, वह महान होता जाएगा और एक दिन वह महात्मा बन जाएगा।

अपने चित्त के ऊपर ही अपने व्यवहार का आधार है। कोई भी धर्मगुरू हो, कुलपति हो, समाज का अगुआ हो तो उसके घर की क्या परिस्थिति है यह मत देखो। उसके चित्त की जैसी स्थिति होगी ऐसी ही उसके घर में सुव्यवस्था या अव्यवस्था होगी।

हम किसी को कुछ कार्य करने का आदेश दें तब कहने के ढंग पर निर्भर करता है कि सामने वाले में कार्य करने के प्रति उत्साह की वृत्ति उठेगी, अर्ध उत्साह उठेगा या विपरीत विचार उठेगा। तुम्हारे चित्त में राग-द्वेष की ठोकरें जितनी कम लगेंगी, कार्य में जितनी तत्परता होगी, श्रद्धा होगी उतना ही तुम्हारा व्यवहार विशालतापूर्ण होगा, व्यापक भावनायुक्त होगा और जितनी व्यापक भावना होगी, चित्त एकाग्र होगा उतना ही सामने वाले पर प्रभाव पड़ेगा। वह आपके अनुकूल चलेगा।

जो दूसरों को ठग की नजरों से देखता है उसको ठग ही मिलते हैं। जो दूसरों को चोर की निगाहों से देखता है उसे चोर ही मिलते हैं। जो दूसरों को अपने प्यारे परब्रह्म परमात्मा की निगाहों से देखता है वह परमात्मामय बन जाता है। आपकी जैसी दृष्टि होती है ऐसा ही परिणाम आता है।

पाश्चात्य जगत में अभी श्रद्धा के विषय में कुछ अध्ययन चल रहा है। मानव के मन की मान्यता क्या-क्या परिणाम ला सकती है उस पर विज्ञानी लोग प्रयोग कर रहे हैं।

कुछ वर्ष पूर्व की एक घटित घटना है। किसी आदमी पर खून का केस चला। खून के दो मामलों में वह अपराधी सिद्ध हुआ और फाँसी की सजा घोषित हो गई। फिर उसने फैसला बदलवाने हेतु हाईकोर्ट में याचिका दायर की, सुप्रीम कोर्ट में गया लेकिन हारता चला गया। आखिर राष्ट्रपति को दया की अर्जी भेजी, वह भी ठुकरा दी गई। फाँसी की दिनाँक निश्चित की गई।

वैज्ञानिकों ने उसे समझायाः अपने पाप का फल भोगने के लिए अब तू फाँसी पर चढ़ेगा। अब बचने की कोई उम्मीद नहीं है तो मरते-मरते एक काम ऐसा करके जा जिससे तेरा शरीर मानव जात के काम आ जाय। फाँसी पर लटक मरो या हमारे प्रयोग में मरो, मरना तो है ही।"

वह अपराधी सहमत हो गया। वैज्ञानिकों ने कानूनी रीति से अनुमति प्राप्त कर ली। फाँसी के लिए जो दिन निश्चित किया गया था उस दिन डॉक्टरों तथा वैज्ञानिकों ने अपने साधनों से सुसज्ज होकर प्रयोग करना शुरू किया। उन्होंने उस आदमी से कहाः "हम सर्प के दंश से तेरी मृत्यु करायेंगे। सर्प के डँसने के बाद शरीर में जहर कैसे आगे बढ़ता है, कितने समय में कैसे मृत्यु होगी, यह हम वैज्ञानिक साधनों से जाँचेंगे। विष का निवारण कैसे करना इसकी खोज हम इस प्रयोग से करेंगे। इस प्रकार तेरी मृत्यु फाँसी से नहीं अपितु सर्पदंश से होगी।"

निश्चित समय पर प्रयोगशाला में एक घोड़ा लाया गया। फिर एक भयंकर विषैला साँप लाया गया। उस आदमी के सामने घोड़े को साँप का दंश लगवाया गया। घोड़े पर जहर का प्रभाव पड़ा। वह छटपटाकर गिर पड़ा और कुछ ही देर में मर गया। उस मुजरिम ने यह सब देखा। विज्ञानियों ने कहाः

"इसी सर्प के द्वारा तुम्हारी आखिरी मंजिल तय करायेंगे।"

आँखों पर पट्टियाँ बाँध दी गईं। कन्धे तक काला कपड़ा ढाँक दिया गया। समय बताया जा रहा हैः पाँच मिनट बाकी हैं.... अब चार मिनट बाकी... अब तीन... ढाई... दो डेढ़... एक.... आधी....अब सर्पदंश लगाया जा रहा है..... एक... दो... तीन....।

सर्पदंश के बदले विज्ञानियों ने चूहे से कटवा दिया। उसे कहा गया कि उसी साँप ने तेरे को काटा। उस आदमी को पक्का विश्वास था कि साँप ने ही काटा है। उसके चित्त पर प्रभाव पड़ गया। शरीर का छटपटाना शुरू हो गया। जैसे घोड़ा छटपटाया था ऐसे ही वह आदमी भी छटपटाया। डॉक्टरों ने उसका खून चेक किया तो वे हैरान हो गये कि इसके खून  जहर कैसे आ गया ? चूहे को जाँचा तो उसमें ऐसा जहन नहीं था। वह आदमी तो मर गया।

'मुझे साँप ने काटा.... साँप ने काटा.....' इस घबराहट से आदमी मर सकता है। भय के कारण हार्टफेल हो सकता है। कहीं छापे पड़े और आदमी का हार्टफेल हो जाय, ऐसे प्रसंग बनते हैं। मन का प्रभाव तन पर पड़ता है। विज्ञानी चकित हुए कि मन का प्रभाव तन पर तो लेकिन तन में विष कैसे बन गया ? उनको आखिर निष्कर्ष रूप में कहना पड़ा कि मन में ऐसी शक्ति होती है कि वह तन में जहर भी बना लेता है।

उनको यह पता नहीं था कि हजारों वर्ष पूर्व भारत के छोटे-छोटे योगी भी कहते थे कि तुम्हारे मन में अगर तीव्र श्रद्धा है तो अमृत से विष बन सकता है और विष से अमृत बन सकता है।

रात्रि के अन्धेरे में पेड़ के ठूँठे में चोर दिखते हो तो काँपने लगते हो। रस्सी में साँप की कल्पना कर लेते हो तो मारे डर के उछल पड़ते हो। आपके मन की जैसी अवस्था होती है वैसा प्रभाव आपके तन पर पड़ता है, आपका व्यवहार उस प्रकार का होता है।

मन आपका कल्पवृक्ष है। इसीलिए कहा जाता है कि कपड़ा बिगड़ जाय तो चिन्ता नहीं, पैसा बिगड़ जाये तो चिन्ता नहीं लेकिन अपना मन मत बिगाड़ना क्योंकि इसी के द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार होता है।

कभी छोटी-छोटी बातों में घबड़ाना नहीं। जो आदमी घबड़ा जाता है वह धोखा खाता है। जो आदमी कुपित होकर निर्णय लेता है उसे बहुत कुछ सहन करना पड़ता है। शांतमना होकर, मानसिक सन्तुलन लाकर सब निर्णय करें।

मरख बादशाह को बहकाया गया कि हिन्दुओं को मुसलमान बनाओगे तो खुदाताला आपको बिस्त  ले जाएँगे। उन नादानों को यह पता नहीं किः

शक्कर खिला शक्कर मिले, टक्कर खिला टक्कर मिले।

नेका का बदला नेक है, बदों को बदी देख ले।।

इसे तू दुनियाँ मत समझ मियाँ ! यह संसार की मझदार है।

औरों का बेड़ा पार कर, तो तेरा बेड़ा पार है।।

तलवार के बल से, राजसत्ता के जुल्म से दूसरों को धर्मभ्रष्ट करके उन्हें मुसलमान बनाने पर खुदाताला राजी होता हो, तो वह सच्चा खुदाताला हो भी नहीं सकता। जो खुद ही है रोम-रोम में, उसी को खुदा बोलते हैं। जो आप ही आप हैं.... ना कोई माई ना कोई बाप... आप  ही आप..... वही जो खुद ही खुद बस रहा है उसे खुदा कहते हैं। जो रोम-रोम में बस रहा है उसे राम बोलते हैं। वह एक का एक है, नाम अनेक है। जैसे गंगा एक और घाट अनेक, ऐसे ही ज्ञान स्वरूप परमात्मा एक और उसकी उपासना-आराधना के घाट अनेक हो सकते हैं। जरूरी थोड़े ही है कि सब एक ही घाट से गंगा-स्नान करें ? कोई कहीं से जाय, कोई कहीं से जाय। पहुँचना एक ही जल में है। लेकिन अंधश्रद्धा वाली मति को यह पता नहीं चलता। श्रद्धा के साथ तत्परता और इन्द्रयिसंयम तो तभी आदमी ठीक निर्णय लेता है।

मरख बादशाह ने गलत निर्णय लिया। गलत निर्णय कोई भले ही ले ले लेकिन उस गलत निर्णय के शिकार आप बनो न बनो यह आपके हाथ की बात है। कोई गलत निर्णय लेता है और आप पर जुल्म करता है, तो उसके जुल्म के शिकार बनो या न बनो, आप स्वतन्त्र हो। कोई आप पर कुपित होता है, आप पर कोप का विष फेंकता है, उस विष को पियो न पियो, उसे उड़ेल दो, आपकी मर्जी। वह तो कुपित होता है लेकिन आप उस समय सोचोः वह कोप कर रहा है इस शरीर को देखकर, हाड़-मांस के शरीर पर नाराज हो रहा है। मुझ चैतन्य आत्मा का क्या बिगड़ेगा ? हरि ॐ तत्सत्.... कोप सब गपशप....।

अपने चित्त की जो रक्षा नहीं करता है वह चाहे कितने ही मंदिरों में जाए, कितनी ही मस्जिदों में जाय, कितने ही गिरजाघरों में जाय लेकिन अपने दिल के घर में जाने का द्वार बन्द कर देता है तो मन्दिर-मस्जिद में भी भगवान नहीं मिलते।

जिसने अपने चित्त की ठीक से रक्षा की है वह मंदिर में जाता है तो उसे वहाँ भगवान मिलते हैं। वास्तव में कण कण मे भगवान हैं तो मूर्ति में उसे भगवान के दीदार क्यों नहीं होंगे ? जो आदमी अपने स्नेहियों, कुटुम्बियों में, समाज में परमात्मा को निहार नहीं सकता है वह मरने के बाद किसी लोक में जाकर भगवान को देखे यह बात गले नहीं उतरती।

हरि व्यापक सर्वत्र समाना।

प्रेम ते प्रगट होई मैं जाना।।

परमात्मा तो सर्वत्र है। हमारी वृत्ति जितनी तदाकार होती है, प्रेम उभरता है उतना ही वह परमात्म रस से भरती है.... देर सबेर हमारा आवरण भंग होता है, परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है।

डेठो मुख शहनशाह जो हींयरे थ्योम करार।

लत्था रोग शरीर जा मुझे सत्गुरू जे दीदार।।

सत्गुरूअ शा तारीया श्रद्धावारा लख्ख।

बांभण क्षत्रिय वैश्य शूद्र ऊँचा नीचा मानखा।

मुं जेड़ा मूर्ख केई तार्या केतरा।।

सदगुरू जब निगाह देते हैं तब ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो, वैश्य हो, शूद्र हो, सब तर जाते हैं। भक्त जब सदगुरू की निगाह में अपनी निगाह मिला देते हैं, सदगुरू की तत्परता और श्रद्धा में अपनी तत्परता और श्रद्धा मिला देते हैं तब परमात्मा का दीदार हो जाता है। दूज का चाँद देखने के लिए दिखाने वाले की दृष्टि के साथ अपनी दृष्टि सूक्ष्म करनी पड़ती है। ऐसे ही परमात्मा पहले था, अब भी है, बाद में भी रहेगा। उसे देखने की तत्परता होती है, अपनी दृष्टि सूक्ष्म होती है तब दीदार हो जाता है। दूज का चाँद तो फिर गायब हो जायगा, अमावस्या को बिल्कुल नहीं दिखेगा लेकिन परमात्मारूपी चाँद एक बार फिर दिख गया तो फिर कभी अदृश्य नहीं होगा। वह सदा एकरस रहता है, शाश्वत रहता है।

मरख ने जब जुल्म किया तब जो कायर लोग थे वे जुल्म के शिकार हो गये और अपना धर्म छोड़ दिया। वे मुसलमान हो गये।

स्वधर्मे निधनं श्रेयः पर धर्मो भयावह।

अपने धर्म में रहकर मर जाना अच्छा है लेकिन दूसरे का धर्म भयजनक है, मुक्तिमार्ग से भटका देता है। अपने धर्म में, अपने कर्त्तव्य में जो आदमी टिका रहता है उसको पहले थोड़ा कष्ट सहना पड़े लेकिन धर्म में टिकने का बल भी आता है। टिकने में सफल होता है तो भी सुखी रहता है और कभी कठिनाई सहकर चला भी जाता है तो अपने धर्म पालने का भाव उसको वीरगति प्राप्त करा देता है।

यहाँ एक सन्देह कोई कर सकता हैः मरख बादशाह ने अपना धर्म तो पाला !

नहीं..... उसने अपना धर्म नहीं पाला। उसका राजधर्म क्या था ? राजा के लिए प्रजा बालक समान है। एक बालक की बातों में आ जाओ और दूसरे बालकों को मारो काटो....। यह माई बाप का कर्त्तव्य नहीं है। राजा तो प्रजा के तमाम वर्गों की उन्नति चाहे, हर पहलुओं पर ध्यान दे। लेकिन जो राजा किसी की चाबी से अपनी खोपड़ी भर ले और तलवार के बल से जुल्म करके खुदा के वहाँ खुश होना चाहे तो धर्मभ्रष्ट कहा जाएगा।

उस धर्मभ्रष्ट, महत्त्वाकाक्षी, रावण जैसे मरख ने अपना अंधा दमन चलाया और कई हिन्दुओं की, सिन्धियों को धर्म परिवर्तन के लिए लाचार किया। समझदार और हिम्मतवान लोगों ने मरख को कहा कि, "हमें सोचने के लिए थोड़ा समय दो। हम थोड़ी अर्चना-उपासना-पूजा करेंगे, भगवान हमारी सुनेगा और आपका भी कुछ मार्गदर्शन होगा।"

मरख ने कहाः "अगर तुम्हारा भगवान का ईश्वर नहीं आया तो धर्म बदलोगे ?"

"हाँ, अगर नहीं आया तो बदलेंगे।"

उनको पूरा विश्वास था, आत्मश्रद्धा थी कि रोम-रोम में रमने वाला राम जरूर कुछ मार्ग दिखाएगा।

विश्व की कोई हस्ती आपका कुछ बिगाड़ नहीं सकती, जब तब आपने अपने में से श्रद्धा नहीं बिगाड़ी। हजार हजार मुसीबतों के बीच भी यदि अपने आप पर पूर्ण श्रद्धा है, आत्म-विश्वास है तो आखिरी क्षण में भी आपकी विजय हो सकती है। जैसे द्रौपदी जी की आखिरी क्षणों की प्रार्थना से भगवान वस्त्ररूप में प्रकट हो गये। वह पागल दुःशासन साड़ियाँ खींचता चला गया लेकिन सफल नहीं हुआ अपने दुष्ट इरादे में। द्रौपदी ने पूर्ण श्रद्धा और तत्परता से भगवान को पुकारा और भगवान ने पुकार सुन ली।

आपको अगर श्रद्धा है, तत्परता है तो सामने वाला आपको तंग नहीं कर सकता। आप जितने भयभीत होंगे उतनी परेशानी आपको आ मिलेगी। उस कैदी को वास्तव में साँप ने नहीं काटा था लेकिन उसने विश्वास कर लिया कि साँप ने ही काटा है और डर गया तो उसकी मृत्यु हो गई।

थोड़ी बहुत बीमारी आ जाती है और आप नर्वस (हताश) हो जाते हो, कराहने लगते हो कि 'मैं बीमार हूँ..... मैं बीमार हूँ....' बीमारी में आपकी श्रद्धा हो जाती है तो बीमारी बढ़ती है। निरोगता में श्रद्धा होती है तो निरोगता बढ़ती है। मस्ती में श्रद्धा होती है तो मस्ती बढ़ती है। झगड़े में श्रद्धा होती है तो झगड़े बढ़ते हैं। महिला मंदिर में जाती है, आश्रम में जाती है सत्संग सुनने और भीतर से डरती रहती है कि मेरा आदमी डाँटेगा....झगड़ा करेगा..... तो जरूर डाँटेगा। आपने पहले से ही उसको डाँटने के लिए प्रेरणा कर दी अपने भीतर से।

आपका मन कल्पवृक्ष है। ऐसी श्रद्धा बनाये रखो कि जीवन की शाम होने से पहले जीवनदाता को पा लूँगा। मरने के बाद किसी लोक में, किसी स्वर्ग में, किसी सचखण्ड में जीवनदाता का पाना नहीं है। जीवनदाता तो अभ है, यहीं है। उसी की सत्ता से तो तुम्हारे दिल की धड़कनें चलती हैं भाई ! उसी की सत्ता से आँखें देखती हैं। उसी की सत्ता से कान सुनते हैं। उसी की सत्ता से मन संकल्प-विकल्प करता है। उसी की सत्ता से बुद्धि निर्णय करती है। वह एकरस है।

आद सत जुगाद सत है भी सत।

नानक ! होसी भी सत।।

आदमी जब तक अपनी ओर नहीं आता है, आत्मसुख की ओर नहीं आता है तब तक उसको कितना भी सुख, कितनी भी सुविधाएँ मिले, अन्त में बेचारा भोग भोगते-भोगते लाचार हो जाता है।

भोगा न भुक्तवा वयमेव भुक्ताः।

भोगों को आदमी क्या भोगेगा, वह स्वयं ही बीमारियों का, लाचारियों का भोग हो जाता है। भोजन करना तो ठीक है लेकिन मजे के लिए भोजन करेगा तो दो ग्रास ज्यादा ठूँस देगा। देखना ठीक है लेकिन देखने में अगर विकार आता है, बार-बार देखकर मन में कुछ पाप आता है तो अपना नाश होता है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह सावधान रहे, तत्पर रहे, संयमी रहे। लक्ष्य याद रखे कि मुझे ईश्वर को पाना है और उसमें श्रद्धा रखे। इससे अवश्यमेव कल्याण होता है।

अपने ईश्वरीय स्वभाव में श्रद्धा करो। दुःख के समय, मान के समय, अपमान के समय सावधान रहो।

 

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