ध्‍यान प्रसाद - हे साधकों ! तुम परम साध्य को पा लो
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ध्‍यान प्रसाद - हे साधकों ! तुम परम साध्य को पा लो

ध्‍यान प्रसाद - हे साधकों ! तुम परम साध्य को पा लो

सदगुरू सत्पात्र शिष्य को अपना हृदय खोलकर आत्मिक अनुभूति का प्रसाद दे रहे हैं-

मैं चिदघन चैतन्य.... सबके दिल की धड़कनों को सत्ता देने वाला शांत आत्मा हूँ। चित्त की अशांति के कारण किसी-किसी शरीर में मैं अशांत दिखता हूँ। चित्त के दुराचार से कहीं कहीं मैं दुराचारी दिखता हूँ। चित्त के सदाचार से कहीं मैं सदाचारी दिखता हूँ। चित्त के शांत होने से मैं कहीं शांत दिखता हूँ। वास्तव में, मैं चैतन्यघन, मुक्त महेश्वर तत्त्व हूँ। मेरा मुझको धन्यवाद है।

मैं शांत, अशांत, सज्जन और दुर्जन, अनेक स्वांगों में, अनेक रंगों में, ढंगों में, अनेक देहों में मैं विषय-सुख भोग रहा हूँ। दैत्यों में ईर्ष्या की आग-सा लग रहा हूँ। ऋषियों में तप कर रहा हूँ। फिर भी मैं कुछ नहीं करता। यह मेरी अष्टधा प्रकृति है। यह मेरी आह्लादिनी शक्ति है जिससे यह सब प्रतीत हो रहा है। वास्तव में बना कुछ नहीं।

यह स्वप्न तुल्य खेल पाँच महाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार... इस अष्टधा प्रकृति से है। मैं सदैव निर्लेप और पर हूँ। जैसे आकाश में सब चीजें हैं, सब चीजों में आकाश है फिर भी चीजों के बनने बिगड़ने में, बढ़ने-घटने में आकाश पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। हजारों मकान बढ़ जाएँ या हजारों मकान गिर जाएँ फिर भी आकाश को कुछ नहीं होता। आकाश सबमें है फिर भी सबसे न्यारा है।

ऐसे ही मैं चैतन्य आकाश हूँ। चिदघन चैतन्य आत्मा हूँ। मेरी कभी मृत्यु नहीं होती क्योंकि मेरा जन्म ही नहीं हुआ। मुझे कोई पुण्य नहीं... मुझे कोई पाप नहीं। पुण्य और पाप तो मन को होता है, तन को होता है। मैं तो तन-मन से परे साक्षी, शान्त, शुद्ध, बुद्ध चैतन्य आत्मा हूँ। आकाश की तरह निर्लेप....।

ऐ मेरे मन ! अगर तू गुरू तत्त्व में जग जाएगा तो सुखी हो जायेगा। अगर तू इन्द्रियों के साथ जुड़कर विकारों को भोगेगा तो नाश को प्राप्त होगा। आज तक विकारों में परेशान होता ही आया है। इसलिए अब तू ऋषियों के अनुभव की तरफ चल। मुझ चैतन्य के प्रसाद को पाकर सदा-सदा के लिए सुखी हो जा। अन्यथा मैं तुझसे दोस्ती तोड़ दूँगा। आज तक तू मुझे गुलाम बनाकर मेरा नाश कर रहा था। दो आँख से जुड़कर देखने की इच्छा से बाहर भटक रहा था। कान से जुड़कर सुनने की इच्छा से भटक रहा था। हिरन बना तो भी मारा गया। पतंग बना तो भी मारा गया। हे मेरे मन ! जिस-जिस शरीर में गया वहाँ दुःखी रहा। अब तू अपने आप, चैतन्य स्वभाव की ओर, अपने सूक्ष्मातिसूक्ष्म, अणु से भी अणु और महान् से भी महान् परमेश्वर स्वभाव की ओर चल। अपने उस महान् स्वभाव को याद करके उसमें लीन हो जा।

हे बुलबुले ! हे तरंग ! तुम किनारों से टकराओगे, टूटोगे, फूटोगे, फिर बनोगे फिर बिगड़ोगे। हे तरंग ! तू अपने जल तत्त्व को जान ले। हे बुलबुला ! तू अपने जल तत्त्व को जान ले।

हे मनरूपी बुलबुला ! हे बुद्धिरूपी तरंग ! तू अपने चैतन्य स्वभाव को जान ले। उसका स्वभाव एक ध्वनि 'ॐ' कार है। 'मैं चैतन्य हूँ' ऐसा चिन्तन करके 'ॐ' कार का गुँजन कर दे। अपने चैतन्य स्वभाव में शीघ्र जाग जा। चैतन्य के प्रसाद से चैतन्यमय हो जा। ॐ....ॐ...ॐ....

मैं निर्भय हूँ..... मैं शांत सच्चिदानंद आत्मा हूँ.... मुझे पता न था। जन्म-मृत्यु से पार मैं तो अपने स्वभाव को भूल प्रकृति से मिलकर बार-बार जन्मता-मरता-सा दिखता था लेकिन मैं जन्मता मरता नहीं था। आज मैं भ्रांति से जागा हूँ।

ॐ....ॐ.....ॐ......

समता जीवन है। ईश्वरार्पणबुद्धि जीवन है। ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान ही सच्चा ज्ञान और सच्चे जीवन का प्रागट्य है। ब्रह्मात्मैक्य का ज्ञान ही वास्तविक जीवन का द्वार खोलता है। यह आत्मा परमात्मा है। यह आत्मा ब्रह्म है। यह आत्मा शुद्ध बुद्ध चिदघन चैतन्य है। यह आत्मा ही सब देवों का देव है, सर्व कालों का काल है। यह हमारा आत्मा ही परब्रह्म परमात्मा है। यह आत्मा ही जननियंता है। यही हमारे अन्तःकरण का नियमन कर रहा है। यही हमारी आँखों को देखने की शक्ति देता है। यही परमेश्वर हमारे साथ था, हमें पता न था। यही आनन्दकन्द हमारा आत्मा था हमें मालूम न था।

'मरने के बाद कहीं जाएँगे और परमेश्वर मिलेंगे' यह तो शुरूआत में बच्चों को थोड़ा-सा मोटा मोटा ज्ञान देने की व्यवस्था थी। जब बुद्धि सूक्ष्म होती है तो पता चलता हैः

जो बिछड़े हैं प्यारे से

दर बदर भटकते फिरते हैं।

हमारा यार है हममें

हमन को बेकरारी क्या ?

हमारा राम हमारा आत्मा है। हमारा श्याम हमारा आत्मा ही है। हमारा विट्ठल हमारा आत्मा ही है। वही आत्मा परमात्मा है। घड़े का आकाश ही महाकाश है। तरंग का जल ही सागर का जल है।

ऐसे ही चित्त में जो चेतना है, व्यापक ब्रह्माण्ड में वही की वही चेतना है।

ॐ.....आनन्द..... खूब आनन्द...

जो श्रीकृष्ण हैं वह तुम हो। जो श्रीराम हैं वह तुम हो। जो शिव हैं वह तुम हो। जो जगदम्बा हैं वह तुम हो। वे अपने चैतन्य स्वभाव को जानते हैं और हम नहीं जानते थे। अब जान लिया तो बन गया काम।

लाख चोर्यासी के चक्कर से थका, खोली कमर।

अब रहा आराम पाना, काम क्या बाकी रहा ?

खूब आनन्द.... मधुर आनन्द..... मधुर शान्ति.... आत्म शांति.....

परमात्म-प्रसाद में हम परितृप्त हो रहे है। अब हमें यह वासना नहीं रही कि हम मरकर भगवान के लोक में जाएँगे। यह बेवकूफी भी हमने छोड़ दी। मरने के बाद भगवान मिलेगा यह तो बालकों को सिखाया गया था और बालकों ने सिखाया था। ब्रह्मवेत्ता कभी ऐसा नहीं सिखाते कि मरने के बाद भगवान मिलेगा। अभी तू वह चैतन्य हैः तत्त्वमसि। तेरा ही स्वभाव है 'ॐ'कार गुंजाना। 'ॐ'कार तेरे आत्म-स्वभाव से निकलता है। इसलिए तू अभी चैतन्य है।

दुराचारी मन ने, पापाचारी इच्छाओं ने, भयभीत विचारों ने राग-द्वेष के तरंगों ने तुम्हें अपनी महिमा से वंचित रखा था। अब गुरू का ज्ञान पचाने का अधिकार हो रहा है इसलिए भय के विचार, राग-द्वेष की आग, विषमता की चेष्टाएँ आदि को विदा देकर देहाध्यास को छोड़। गुरू अपने परमात्म-भाव में स्थित होकर तुम्हें आत्मा में जगा रहे हैं जो वास्तव में सत्य है। यही सर्व सफलताओं की कुंजी है। 'मैं आत्मा हूँ' यह बिल्कुल हकीकत है। 'मैं चैतन्य हूँ' यह बिल्कुल सच्ची बात है। 'मेरा आत्मा ही परमात्मा है' बिल्कुल निःसन्देह है।

मैं अपने अनुभूत आत्मस्वभाव में जग रहा हूँ। देह की मान्यताओं से मैं मर रहा था और जन्म हो रहा था। अब आत्मा के स्वभाव से मैं अपने अमर स्वभाव में आ रहा हूँ।

शिष्य के ये अनुभवयुक्त वचन सुनकर गुरूवाणी भीतर से प्रकट हुईः

'हे पुत्र ! इस देहाध्यास ने तुझे चिर काल से बाँध रखा था। अब ॐकार का गुँजन करके देहाभिमान को भगाकर आत्म-अभिमान को जगा दे। काँटे से काँटा निकलता है। जीवभाव को हटाने के लिए अपने चैतन्य स्वभाव को, अपने आत्मस्वभाव को जगाओ। विकार और विषयों के आकर्षण को हटाने के लिए अपने आत्मानन्द को जगाओ। अपने आत्मा के सुख में सुखी हो जाओ तो बाहर का सुख तुम्हें क्यों बाँधेगा ? उसकी कहाँ ताकत है तुम्हें बाँधने की ? तुम्हीं बँध जाते थे वत्स ! अब तुम मुझ मुक्त आत्मा की शरण में आये हो तो तुम भी मुक्त हो जाओ। ले लो यह ॐकार की गुँजन और ज्ञान की कैंची। काट दो मोह-ममता के जाल को। तुम्हें बाँध सके या नर्कों में ले जा सके अथवा स्वर्ग में फँसा सके ऐसी ताकत किसी में भी नहीं। तुम ही नर्क और स्वर्ग के रास्ते बनाकर उसमें पचने और फँसने जाते थे, अज्ञान के कारण। अब ज्ञान के प्रसाद से तुम्हारा अज्ञान भाग गया। अगर थोड़ा रहा हो तो मार दो 'ॐ' की गदा फिर से। प्रकट कर दो अपना आनन्द। प्रकट कर दो अपनी मस्ती। प्रकट कर दो अपनी निर्वासनिकता। मुझे अब कुछ नहीं चाहिए, क्योंकि सर्व मैं ही बना बैठा हूँ। मुझे नर्क का भय नहीं, स्वर्ग की लालसा नहीं मृत्यु मेरी होती नहीं। जन्म मेरा कभी था नहीं। मैं वह आत्मा हूँ।

तुम सब आत्मा ही हो। सब परमेश्वर हो। मैं भी वही हूँ। तुम भी वही हो। जो मैं हूँ वही तुम भी हो। जो तुम हो वह मैं हूँ।

हे किल्लोल करते पक्षी ! तुम भी चैतन्य देव हो। हे गगनगामी योगी ! तुम अपने चैतन्य स्वभाव को जानो। देह से जुड़कर तुम कब तक आकाशगमन करते रहोगे ? तुम तो चिदाकाश स्वरूप में विश्रान्ति पा लो।

हे आकाशचारी सिद्धों ! आकाश में विचरण करने वाले उत्तम कोटि के साधकों ! तुम अपने साध्य स्वभाव को जान लो। तुम तो धन्य हो ही जाओगे, तुम्हारी धन्यता का होना प्राकृतिक जीवों के लिए बहुत कुछ आशीर्वाद हो जाएगा।

हे सिद्धों ! तुम परम सिद्धता को पा लो। हे साधकों ! तुम परम साध्य को पा लो। परम साध्य तुम्हारा परमात्मा है न ! खूब मधुर अलौकिक अनुभूति में तुम गोता मारते जाओ। तुम अगर आनन्दस्वरूप न होते, सुखस्वरूप न होते तो अभी अपने आत्मस्वभाव की बात सुनते तुम इतने पवित्र, शांत और सुखस्वरूप नहीं हो सकते थे। तुम पहले से ही ऐसे थे। ज्यों-ज्यों भूल मिटती है त्यों-त्यों तुम्हें अपने स्वभाव की शांति और मस्ती आती है।

जय हो....! प्रभु तेरी जय हो....! हे गुरूदेव तुम्हारी जय हो....!

ना जीना है ना मरना है मगन अपने में रहना है।

आन पड़े सो सहना है,

आतम नशे में देह भुलाकर साक्षी होकर रहना है।।

 

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