इसीको बोलते हैं परमात्म-साक्षात्कार
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इसीको बोलते हैं परमात्म-साक्षात्कार

(पूज्य बापूजी का 57वाँ आत्मसाक्षात्कार दिवस : 18 अक्टूबर)

ईश्वर का साक्षात्कार’ मतलब क्या होता है ? कि जो साक्षात् है, हाजरा-हजूर है उसके अस्तित्व को जानकर अपना मिथ्या अस्तित्व मिटा देना । जैसे तरंग का मिथ्या अस्तित्व मिट जाता है तो सागर हो जाती है, ऐसे ही जीव का मिथ्या अस्तित्व अंदर मिट जाय तो ब्रह्म हो जाता है । इसीको बोलते हैं परमात्म-साक्षात्कार । इसके लिए दीर्घकाल अभ्यास करना पड़ता है । सतत अभ्यास करे तो ब्रह्मज्ञान हो जाय । इससे बुद्धि में बहुत दिव्य गुण आ जाते हैं । मन पवित्र हो जाता है, ध्यान होने से शरीर के परमाणु भी दिव्य हो जाते हैं ।


 उस समय कैसा अनुभव होता है ?


बोले, ‘बापूजी ! आत्मसाक्षात्कार के समय कैसा अनुभव होता है ?’


एक बापूजी नहीं, हजार बापूजी मिलकर भी वर्णन करना चाहें तो भी नहीं कर सकते । यह राज समझ में आता है पर समझाया नहीं जाता । और जितना भी समझायेंगे, वह उसके इर्द-गिर्द का होगा, उधर का नहीं बोल सकते । बोले कि ‘चित्त में कोई राग-द्वेष नहीं रहता, व्यापक स्वरूप से एकता हो जाती है । भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश जिसमें रमण करते हैं उसीमें रमण होता है...’ यह सब वर्णन कर सकते हैं लेकिन उस समय क्या होता है... 
बोले : ‘अरे ऐसा हो गया... रामकृष्ण को 6 दिन की समाधि लग गयी, बापू ! आपको ढाई दिन की समाधि लग गयी ।’ 


अरे भैया ! शुद्ध ज्ञान में 3 मिनट भी टिक जायें बस, हो गया काम ! फिर दुबारा गर्भवास नहीं होता और जगत की सत्यता गला नहीं दबोचेगी, कोई भी दुःख तुम्हारा गला नहीं दबोचेगा, कोई भी सुख तुम्हें आकर्षित नहीं करेगा, कोई भी चिंता तुम्हें तंग नहीं कर पायेगी । कोई भी वैभव तुम्हारे आत्मवैभव के आगे मायना नहीं रखता । कोई आपको बोले, ‘इन्द्र बनो’ तब भी आपकी इच्छा नहीं होगी । आप क्या हैं वह कोई तौल नहीं सकता, ऐसे बन जायेंगे । इन्द्र का वैभव भी आपके लिए नन्हा खिलौना हो जायेगा और चवन्नी की चीज बिगड़ेगी तो आप चिल्लायेंगे ऐसे भी रहेंगे । मच्छर से आप डरेंगे और शेर आपके लिए पाले हुए पशु हो जायेंगे - क्या गति है !


धीरा की गति धीरा जाने ।


साधना करते-करते प्रथम तो शरीर तंदुरुस्त, दूसरी स्थिति में भावनाएँ दिव्य और तीसरी में बुद्धि दिव्य हो जाती है... यहाँ तक की तो साधना है, जब चौथी स्थिति आती है तो उसमें साध्य... फिर आपका बयान नहीं हो सकता । आप दिखेंगे दो हाथ-पैरवाले, दिखेंगे आप मनुष्य लेकिन देवलोक और ब्रह्मलोक भी आपके अंतर्गत हो जायेंगे । आप पूरे ब्रह्मांड को ढाँपे हुए हो जायेंगे । 


आठवें अर्श1 तेरा नूर चमकदा, होर2 भी ऊँच हो ।।
फकीरा ! आपे अल्लाह हो ।


फिर अल्लाह तुम्हारे लिए दूर नहीं रहेगा । ‘अनल्हक... मैं ही खुद खुदा हूँ ।’ मंसूर ने गर्जना कर दी थी चौथी स्थिति के अनुभव की । सुकरात ने भी की । कई संत करते हैं और कुछ संत समाज को साथ में ले चलते हैं इसलिए गर्जना नहीं करते ।


 

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