भजन का वास्तविक स्वरूप
Ashram India

भजन का वास्तविक स्वरूप

जिन्होंने सबमें आत्मा को और आत्मा में सबको जान लिया है, उनके लिए अद्वैतानुभूति ही उनका वास्तविक भजन है ।

तुम शरीर से एक न होकर विराट से एक हो जाओ । यह शरीर तुम्हारा शरीर नहीं है, आकाश तुम्हारा शरीर है । आकाश तुम्हारा शरीर नहीं है, चित्ताकाश तुम्हारा शरीर है । चित्ताकाश तुम्हारा शरीर नहीं है, चिदाकाश तुम्हारा शरीर है । शरीरी-अशरीरी भाव नहीं है, तुम अद्वय हो । जैसे रस्सी में सर्प दिखता है वैसे सर्वभूत-अधिष्ठाता परमात्मा में समस्त संसार दिख रहा है । वस्तुतः आत्मा ही परमात्मा है । तुम स्वयं साक्षात् परमात्मा हो । अपने-आपको अद्वितीय परब्रह्म-परमात्मा जानो । ‘मैं ही सर्वाधिष्ठान-सर्वावभासक1-स्वयंप्रकाश परमात्मा हूँ’ - इस एकत्व में - अद्वैत में स्थित हो जाओ ।

‘एक’ संख्या होती है । ‘एक’ का आधा होता है । एक + एक = दो होता है । संख्या गुण है, तत्त्व नहीं है । अद्वैत संख्या या गुण नहीं है । अद्वैत का आधा नहीं होता है । अद्वैत + अद्वैत = दो अद्वैत नहीं होता है । अद्वैत तत्त्व है । इसमें आस्था होने दो । अद्वैत तत्त्व में आस्था होना माने त्याग-वैराग्य-उपासना-योग या समाधि नहीं है । यह ज्ञान है । इसका अर्थ है कि जन्म-मरण, नरक-स्वर्ग प्रतीतियों में इस उदासीन अद्वय तत्त्व को अपने-आपके रूप में जानो । जन्म-मरण, नरक-स्वर्ग इत्यादि प्रतीतिमात्र है । अपने-आपको असंग-अद्वय-आत्मतत्त्व के रूप में जानो । जिन्होंने सबमें आत्मा को और आत्मा में सबको जान लिया है, उनके लिए अद्वैतानुभूति ही उनका वास्तविक भजन है ।

तुम अंगूर खाओ और उसमें मिठास न हो तो क्या तुम वह अंगूर खाओगे ? तुम मिर्च खाओ और उसमें तीखापन न हो तो क्या तुम वह मिर्च खाओगे ? वस्तुओं का स्वाद ही उनका रस है । उपाधि2 के कारण रस में जो भेद होता है, उसके कारण कोई वस्तु राग या द्वेष करने योग्य नहीं है । मनुष्य को कभी हर्रे (हरड़) या त्रिकटु (सोंठ, काली मिर्च व पीपर) भी खाना पड़ता है । उस कटु वस्तु के स्वाद, गुण, नाम, रूप में क्या परमात्मा नहीं है ? संसार की सभी वस्तुओं में - चाहे उनका कोई भी नाम-रूप हो और चाहे उनमें कोई भी गुण प्रतीत हो - जो सत्ता है, प्रकाश है, रस है, वह परमात्मा ही है । अतः भेद को मत देखो, एकता को देखो, अद्वयता को देखो ।

तुम भेद देखते हो, अभेद नहीं देखते हो । नाम-रूप-गुण के कारण भेद है । सत्ता-चित्ता-आनंदता में भेद नहीं है । जो सबमें एक है वह दृष्टि में नहीं आता है । तुम इन्द्रियों के कारण भेद-ही-भेद देखने लगे हो । अतः तुम संसार में पड़े हो । जो पार्थक्य है उसे मत देखो, एकत्व देखो । जब तुम एकत्व को देखोगे तब तुम्हारे ज्ञान का आकार विशाल हो जायेगा । प्राकृत ज्ञान के कारण तुम्हारे ज्ञान में जो अल्पता है वह मिट जायेगी । जब वृत्ति घटाकार होती है तब घड़े जितनी लगती है । जब वृत्ति अखिल जगत के अभिन्न-निमित्तोपादान कारण परमात्मा3 का आकार ग्रहण करेगी तब तुम्हारा ज्ञान सर्वव्यापक नारायणाकार हो जायेगा । तुम उन श्रीनारायण से एक होकर बैठ जाओ ।  (क्रमशः)

----------------------------------------------------

1. सर्वप्रकाशक  2. उपाधि माने वह आरोपित वस्तु जो मूल वस्तु को छुपाकर उसको और की और या किसी विशेष रूप में दिखा दे ।

3. समस्त जगत का उपादान कारण (अर्थात् वह कारण जिससे यह जगत बना) एवं निमित्त कारण (जिसने इसको बनाया है वह) परमात्मा है और वह जगत से अभिन्न भी है इसलिए वह जगत का अभिन्न-निमित्तोपादान कारण है ।

Previous Article जैसे वह न रहा वैसे यह भी न रहेगा !
Next Article इसीको बोलते हैं परमात्म-साक्षात्कार
Print
1564 Rate this article:
4.3
Please login or register to post comments.

LKS recent Articles

E-Subscription of Lok Kalyan Setu