अद्भुत है गीता ग्रंथ !
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अद्भुत है गीता ग्रंथ !

(श्रीमद्भगवद्गीता जयंती: 25 दिसम्बर)

सारे वेदों का, उपनिषदों का अमृत सरल भाषा में जिस ग्रंथ में है और जो सभी तक पहुँचे ऐसा ग्रंथ है श्रीमद्भगवद्गीता । भगवद्गीता ने क्रांति कर दी । श्रीकृष्ण ने प्रेमाभक्ति का दान देकर अंदर की चेतना जगा दी लेकिन जो विचारप्रधान थे उनको युद्ध के मैदान में ऐसी गीता दे डाली कि दुनिया में कोई किसी भी सम्प्रदाय, मत-मजहब का विचारक हो, चाहे राजनैतिक मंच पर गया हो चाहे धर्म के मंच पर गया हो, चाहे समाज-सुधार के मंच पर हो चाहे भक्तिमार्ग या योगमार्ग के मंच पर हो... ऐसा कोई विश्वविख्यात वक्ता नहीं मिलेगा जिसने गीता का अवलम्बन न लिया हो, दृष्टांत न लिया हो ।

कोई सम्प्रदाय, कोई पंथ हो... गीता में किसीके साथ पक्षपात नहीं किया गया । किसी पंथ-सम्प्रदाय को, किसी मजहब को, किसी बाड़े को लेकर गीता नहीं चली ।

गीता के द्वार सबके लिए खुले हैं

श्रीकृष्ण जानते हैं कि धरा का सुख तो पशु-पक्षियों को, अन्य जीव-जंतुओं को भी मिलता है लेकिन ये मेरे प्यारे मनुष्य-अवतार में आये हैं, जो मुझे अति प्यारी देह है - मनुष्य-तन, उसमें आये हैं और ये अगर धरा के अमृत में ही रुक जायेंगे, धरा के ही विषय-सुख में जीवन बरबाद कर देंगे तो जीवनदाता का सुख कब ले पायेंगे ? इसलिए श्रीकृष्ण ने कोई शर्त नहीं रखी । और पंथों ने, मजहबों ने शर्त रखी कि ‘यदि तुम पापी हो तो 12 वर्ष उपवास करो, एक दिन छोड़कर एक दिन खाओ । महीने में चान्द्रायण व्रत करो, अमुक यह करो, अमुक यह करो । खुदा को, गॉड को प्रार्थना करो... ।’ श्रीकृष्ण तो यह कह रहे हैं कि

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।

तू दुराचारियों में, पापियों में आखिरी पंक्ति का हो... जैसे प्रिय, प्रियतर, प्रियतम... प्रियतम अर्थात् सबसे प्रिय, ऐसे ही पापकृत्, पापकृत्तर, पापकृत्तम... पापकृत्तम अर्थात् सबसे बड़ा पापी भी हो तो भी -

सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ।।

तू उस ब्रह्मज्ञान की नाव में बैठ, तू यूँ तर जायेगा, यूँ !

अगर विश्व में कोई आश्वासन देनेवाला ग्रंथ है तो वह है भगवद्गीता । गीता ने अबोध बच्चों को, अनजान ग्वाल-गोपों को, अनपढ़ लोगों को भी आमंत्रित किया । भक्तों, योगियों, ज्ञानियों और राजनीतिज्ञों के लिए भी गीता के द्वार खुले हैं । निष्काम कर्म करनेवालों के लिए भी गीता कहती है कि ‘आ जा !’ और सकाम कर्म करनेवाला गीता-ज्ञान चाहता है तो भी कोई बात नहीं, ‘आ जा !’ जैसे माँ का विशाल हृदय होता है... फिर पठित बालक है तो माँ का है, अपठित है तो माँ का है, धनाढ्य है तो माँ का है और निर्धन है तो माँ का है । तोतली भाषा बोलता है तो भी माँ उसे प्यार करती है और सुंदर-सुहावनी, लच्छेदार भाषा बोलता है तब भी माँ के आगे तो वह बच्चा ही है । ऐसे ही गीता माता का हृदय अति विशाल है । गीता माता की जय हो, जय हो, जय हो !

गीता के प्राकट्य का उद्देश्य क्या था ?

गीता प्रकटते ही उसकी महिमा देखो ! रण के मैदान में गीता प्रकटी है । योद्धा अर्जुन को अपना अमृतपान कराती है । जिज्ञासु संजय के पास तो गीता प्रकटी है लेकिन अंधे धृतराष्ट्र के घर तक भी तुरंत पहुँची है । गीता के प्राकट्य का उद्देश्य युद्ध नहीं था । उद्देश्य क्या था ? व्यापक जनसमाज को सत्-चित्-आनंदमय जीवन की प्राप्ति में जो अति विघ्न हैं उनको कैसे आसानी से हटाया जाय क्योंकि वासनावालों के हाथ में राज्यसत्ता है । अति वासनावाले हैं दुर्योधन, शकुनि और वे कपट करके अपनी वासनापूर्ति के लिए लगे हैं । अर्जुन वासना से प्रेरित होकर युद्ध करना चाहता था क्या ? नहीं-नहीं ।

दुर्योधन बोलता है कि ‘ये सारे योद्धे मेरे लिए प्राण त्यागने को तैयार हैं’ अर्थात् मेरी इच्छा पूरी हो और मुझे राज्य मिले । यह वासना है ।

अर्जुन कहता है कि ‘कृष्ण ! मुझे विजय की इच्छा नहीं है और न मैं राज्य एवं सुख ही चाहता हूँ । जिनके लिए मैं राज्य चाहता हूँ वे ही रणभूमि में मेरे सामने खड़े हैं तो मैं राज्य पाकर क्या करूँगा ? गोविंद ! भला हमें राज्य से क्या प्रयोजन है ? तथा भोग या जीवन से भी क्या लेना है ?’

तो अर्जुन के जीवन में जनहित का उद्देश्य दिख रहा है और दुर्योधन के जीवन में वासना है ।

गीताकार ने कुछ नहीं छोड़ा

गीता का ज्ञान जिसके जीवन में उतरा, गीता उसकी हताशा-निराशा को दूर कर देती है । हारे हुए, थके हुए को भी गीता अपने आँचल में आश्वासन देकर प्रोत्साहित करती है । कर्तव्य-कर्म करने के मैदान में आया हुआ अर्जुन जब भागने की तैयारी करता है, ‘भीख माँगकर रहूँगा लेकिन यह युद्ध नहीं करूँगा ।’ ऐसे विचार करता है तो उसको कर्तव्य-कर्म करने की प्रेरणा देती है और कर्म में से आसक्ति हटाने के लिए अनासक्ति की प्रेरणा भी देती है ।

ऐसी कोई बात नहीं है जो गीताकार ने गीता में छोड़ी हो । कितना अद्भुत ग्रंथ है गीता ! इसकी जयंती मनायी जाती है, अच्छा है, उचित है गीता जयंती मनाना ।

- पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

 

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