ध्यान

ध्यान से प्राप्त शांति तथा आध्यात्मिक बल की सहायता से जीवन की जटिल से जटिल समस्याओं को भी बड़ी सरलता से सुलझाया जा सकता है और परमात्मा का साक्षात्कार भी किया जा सकता है। पूज्य बापूजी बताते हैं : “ चार अवस्थाएँ होती हैं – घन सुषुप्ति (पत्थर आदि ), क्षीण सुषुप्ति ( पेड़-पौधे आदि ), स्वपनावस्था ( मनुष्य, देव, गंधर्व आदि ) और जाग्रत अवस्था ( जिस ने अपने शुद्ध, बुद्ध, चैतन्यस्वभाव को जान लिया )। आधा घंटा परमात्मा के ध्यान में डूबने से जो शांति, आत्मिक बल व धैर्य आता है उससे एक सप्ताह तक संसारी समस्याओं से जूझने की ताकत आ जाती है। ध्यान में लग जाने से अद्भुत शक्तियाँ प्रकट होने लगती हैं। अत: ध्यान करके अपनी वृत्तियों को सूक्ष्म करने का प्रयास करना चाहिये।

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योगवाशिष्ठ में ध्यान की महिमा
   
 

देवाधिदेव महादेव जी ने श्री वशिष्ठजी से कहाः 'हे मुनीश्वर ! इस जगत में ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र जो बड़े देवता हैं वे सब सर्वसत्ता रूप एक ही आत्मदेव से प्रकट हुए हैं। सबका मूल बीज वही देव है। जैसे अग्नि से चिनगारी और समुद्र से तरंगे उपजते हैं वैसे ही ब्रह्मा से लेकर कीट पर्यन्त सभी उसी आत्मदेव से उपजते हैं और पुनः उसी में लीन होते हैं। सब प्रकाशों का प्रकाश और तत्त्ववेत्ताओं का पूज्य वही है।

हे मुनिशार्दूल ! जरा, मृत्यु, शोक और भय को मिटाने वाला आत्मदेव ही सबका सार और सबका आश्रय रूप है। उसका जो विराट रूप है वह कहता हूँ, सुनो। वह अनन्त है। परमाकाश उसकी ग्रीवा है। अनेक पाताल उसके चरण हैं। अनेक दिशाएँ उसकी भुजा हैं। सब प्रकाश उसके शास्त्र हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रूद्रादि देवता और जीव उसकी रोमावली है। जगज्जाल उसका विवृत है। काल उसका द्वारपाल है। अनन्त ब्रह्माण्ड उसकी देह के किसी कोण में स्थिति है। वही आत्मदेव शिवरूप सर्वदा और सबका कर्त्ता है, सब संकल्पों के अर्थ का फलदाता है। आत्मा सबके हृदय में स्थित है।

हे ऋषिवर्य ! अब मैं वह आत्म-पूजन कहता हूँ जो सर्वत्र पवित्र करने वाले को भी पवित्र करता है और सब तम और अज्ञान का नाश करता है। आत्मपूजन सब प्रकार से सर्वदा होता है और व्यवधान कभी नहीं पड़ता। उस सर्वात्मा शान्तरूप आत्मदेव का पूजन ध्यान है और ध्यान ही पूजन है। जहाँ-जहाँ मन जाय वहाँ-वहाँ लक्ष्य रूप आत्मा का ध्यान करो। सबका प्रकाशक आत्मा ही है। उसका पूजन दीपक से नहीं होता, न धूप, पुष्प, चन्दनलेप और केसर से होता है। अर्घ्य पाद्यादिक पूजा की सामग्रियों से भी उस देव का पूजन नहीं होता।

हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ ! एक अमृतरूपी जो बोध है, उससे उस देव का सजातीय प्रत्यय ध्यान करना ही उसका परम पूजन है। शुद्ध चिन्मात्र आत्मदेव अनुभव रूप है। सर्वदा और सब प्रकार उसका पूजन करो अर्थात् देखना, स्पर्श करना सूँघना, सुनना, बोलना, देना, लेना, चलना, बैठना इत्यादि जो कुछ क्रियाएँ हैं, सब चैतन्य साक्षी में अर्पण करो और उसी के परायण बनो। आत्मदेव का ध्यान करना ही धूप-दीप और पूजन की सामग्री है। ध्यान ही उस परमदेव को प्रसन्न करता है और उससे परमानन्द प्राप्त होता है। अन्य किसी प्रकार स वह देव प्राप्त नहीं होता।

हे मुनीश्वर ! मूढ़ भी इस प्रकार ध्यान से उस ईश्वर की पूजा करे तो त्रयोदश निमेष में जगत-दान के फल को पाता है। सत्रह निमेष के ध्यान से प्रभु को पूजे ते अश्वमेध यज्ञ के फल को पाता है। केवल ध्यान से आत्मा का एक घड़ी पर्यन्त पूजन करे तो राजसूय यज्ञ के फल को पाता है और जो दिनभर ध्यान करे तो असंख्य अमित फल पाता है। हे महर्षे ! यह परम योग है, यही परम क्रिया है और यही परम प्रयोजन है।

यथा प्राप्ति के समभाव में स्नान करके शुद्ध होकर ज्ञान स्वरूप आत्मदेव का पूजन करो। जो कुछ प्राप्त हो उसमें राग-द्वेष से रहित होना और सर्वदा साक्षी का रूप अनुभव में स्थित रहना ही उसका पूजन हो। जो नित्य, शुद्ध, बोधरूप और अद्वैत है उसको देखना और किसी में वृत्ति न लगाना ही उस देव का पूजन है। प्राण अपानरूपी रथ पर आरूढ़ जो हृदय में स्थित है उसका ज्ञान ही पूजन है।

आत्मदेव सब देहों में स्थित है तो भी आकाश-सा निर्लिप्त निर्मल है। सर्वदा सब पदार्थों का प्रकाशक, प्रत्यक् चैतन्य जो आत्मतत्त्व अपने हृदय  स्थित है वही अपने फुरने से शीघ्र ही द्वैत की तरह हो जाता है। जो कुछ साकाररूप जगत देख पड़ता है, सो सब विराट आत्मा है। इससे अपने में इस प्रकार विराट की भावना करो कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मेरी देह है, हाथ, पाँव, नख, केश है। मैं ही प्रकाश रूप एक देव हूँ। नीति इच्छादिक मेरी शक्ति है। सब मेरी ही उपासना करते हैं। जैसे स्त्री श्रेष्ठ भर्ता की सेवा करती है, वैसे ही शक्ति मेरी उपासना करती है। मन मेरा द्वारपाल है जो त्रिलोकी का निवेदन करने वाला है। चिन्तन मेरा आने-जाने वाला प्रतिहारी है। नाना प्रकार के ज्ञान मेरे अंग के भूषण हैं। कर्मेन्द्रियाँ मेरे दास, ज्ञानेन्द्रियाँ मेरे गण हैं ऐसा मैं एक अनन्त आत्मा, अखण्डरूप, भेद से रहित अपने आप में स्थित परिपूर्ण हूँ।

इसी भावना से जो पूजा करता है वह परमात्मदेव को प्राप्त होता है। दीनता आदि उसके सब क्लेश नष्ट हो जाते हैं। उसे इष्ट की प्राप्ति में हर्ष और अनिष्ट की प्राप्ति में शोक नहीं उपजता। न तोष होता है न कोप होता है। वह विषय की प्राप्ति से तृप्ति नहीं मानता और न इसके वियोग से खेद मानता है। न अप्राप्त की वाञ्छा करता है न प्राप्त के त्याग की इच्छा करता है। सब पदार्थों मे उसका समभाव रहता है।

हे मुनीश्वर ! भीतर से आकाश-सा असंग रहना और बाहर से प्रकृति-आचार में रहना, किसी के संग का हृदय में स्पर्श न होने देना और सदा समभाव विज्ञान से पूर्ण रहना ही उस देव की उपासना है। जिसके हृदयरूपी आकाश से अज्ञानरूपी मेघ नष्ट हो गया है उसको स्वप्न में भी विकार नहीं होता।

हे महर्षे ! यह परम योग है। यही परम क्रिया है और यही परम प्रयोजन है। जो परम पूजा करता है वह परम पद को पाता है। उसको सब देव नमस्कार करते हैं और वह पुरुष सबका पूजनीय होता है।"

(श्री योगवाशिष्ठ महारामायण)

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ध्यान के क्षणों में......

हमारा सूक्ष्म विकास हो रहा है। हमारा चित्त ॐकार की ध्वनि से परम शान्ति में, परमात्मा के आह्लादक स्वरूप में शान्त हो रहा है। हम महसूस कर रहे हैं कि हम शान्त आत्मा हैं। संकल्प-विकल्प मिट रहे हैं। चित्त की चंचलता शिथिल हो रही है। भ्रम दूर हो रहे हैं। सन्देह निवृत्त हो रहे हैं।

हमें पता भी नहीं चलता इस प्रकार गुरुदेव हमारी सूक्ष्मातिसूक्ष्म यात्रा करा रहे हैं... हमें पता भी नहीं चलता। अन्तवाहक शरीर पर चढ़े हुए कई जन्मों के संस्कार निवृत्त होते जा रहे हैं। वाणी के उपदेश से भी मौन उपदेश, मौन रहकर संकल्प से गुरुदेव की कृपा हमारे भीतर काम करती है। हमें पता भी नहीं होता कि मौन से कितना लाभ हो रहा है ! सदगुरु की कृपा कैसे कार्य करती है इसका पता हमें प्रारम्भ में नहीं चलता। गुरुकृपा हमारी नजदीक होकर भी काम करती है और हजारों मील दूर होकर भी काम करती है। गुरुदेव के बोलने पर तो उनकी कृपा काम करती ही है लेकिन मौन होने पर विशेष रूप से काम करती है। मौन के संकल्प की अपेक्षा बोलने का संकल्प कम सामर्थ्यवाला होता है। मौन में आत्म-विश्रान्ति की अपेक्षा बाहर के क्रिया-कलाप छोटे हो जाते हैं। सूक्ष्म पर्तें उतारने के लिए सूक्ष्म साधनों की जरूरत पड़ती है। यह घटना मौन में, शान्ति में घटती है। शिष्य जब आगे बढ़ता है तब ख्याल आता है कि जीवन में कितना सारा परिवर्तन हुआ।

शास्त्रों में शिक्षा गुरु, दीक्षा गुरु, सूचक गुरु, वाचक गुरु, बोधक गुरु, निषिद्ध गुरु, विहित गुरु, कारणाख्य गुरु, परम गुरु (सदगुरु) आदि अनेक प्रकार के गुरु बताये गये हैं। इन सबमें परम गुरु अथवा सदगुरु सर्वश्रेष्ठ हैं। भगवान शंकर 'श्री गुरुगीता' में कहते हैं-

जलानां सागरो राजा यथा भवति पार्वति।

गुरुणां तत्र सर्वेषां राजायं परमो गुरुः।।

'हे पार्वती ! जिस प्रकार सब जलाशयों में सागर राजा है उसी प्रकार सब गुरुओं में ये परम गुरु राजा है।'

जिन्हें सत्य स्वरूप परमात्मा का बोध है, जो श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ हैं, स्व-स्वरूप में जगे हैं, परहितपरायण हैं ऐसे सदगुरुओं की प्राप्ति अति कठिन है। ऐसे सदगुरु मिलते हैं तो हमारा आमूल परिवर्तन हो जाता है। देहाध्यास गलने लगता है। चित्त सत्पद में विश्रान्ति पाने लगता है।

जैसे माँ बालक को कभी पुचकारती है, कभी डाँटती है, कभी दुलार करती है। कभी किसी ढंग से कभी किसी ढंग से बच्चे का लालन-पालन करती है। वह माँ की अपनी प्रकृति है। गुरु, जो सदा जागृत स्वरूप में सजाग हैं ऐसे परम गुरु कभी किसी ढंग से कभी किसी ढंग से हमारा भीतरी आध्यात्मिक लालन-पालन करते हैं। उनका पूर्व आयोजित कोई कार्यक्रम नहीं होता साधक के लालन-पालन का कि यह करना है, वह करना है। जिस समय जिस प्रकार से, जिस कारण, क्रिया-कलाप से हमारा उत्थान होता होगा उस समय उस प्रकार का व्यवहार करेंगे और उस ढंग से हम पर बरसते हैं।

जैसे चतुर वैद्य अपने मरीज को अपनी निगाहों में रखता है और किस समय कौन-सी औषधि की आवश्यकता है यह ठीक से समझकर उसका इलाज करता है, ऐसे ही हमारे आन्तरिक स्वास्थ्य के लिए सदियों पुरानी लड़खड़ाती तंदरुस्ती के लिए, युगों पुरानी रूग्णता का निवारण करने के लिए परम गुरु भिन्न-भिन्न प्रकार की औषधि, उपचार, संयम-नियम का उपयोग करते हैं।

साधक की जिस समय जैसी प्रकृति होती है उस समय उसे गुरु उसी प्रकार के भासते हैं। हरेक साधक के अपने संस्कार होते हैं, योग्यता-अयोग्यता होती है, अपनी मान्यताएँ और पकड़े होती हैं। सबकी अपनी-अपनी देखने-सोचने की दृष्टि है। प्रारम्भ में हर साधक को अपने सदगुरु के प्रति अपने ढंग का आदर, मूल्य अथवा लड़खड़ाती श्रद्धा आदि होते हैं।

साधक जब प्रारम्भ में सदगुरु के श्रीचरणों में आता है उस समय उनको अपने ढंग से देखता है. उनकी योग्यता मापता है वह दृष्टि छोटी-सी होती है। साधक ज्यों-ज्यों संतत्व के नजदीक जाता है, ज्यों-ज्यों उस पर ब्रह्मवेत्ता सदगुरु की कृपा बरसती है, सूक्ष्म परिवर्तन होते हैं साधक की बुद्धि शुद्ध होती है, साधक का अन्तःकरण शान्त होता है, तन और मन के विकार क्षीण होते हैं त्यों-त्यों वह साधक सदगुरु का महत्व समझता जाता है। जब साधक में रजोतमोगुण आ जाता है तो उसके जीवन में सदगुरु के सान्निध्य का और उपदेश का प्रभाव थोड़ा सा शिथिल हो जाता है। जब सत्त्वगुण पुनः बढ़ता है तब उसके चित्त में सदगुरु तत्त्व का शुद्ध-विशुद्ध संचार निखरने लगता है।

चतुर साधक रजो-तमोगुण बढ़े नहीं उसकी सावधानी रखता है। अगर रजो-तमोगुण आ जाता है तो गुरु-निर्दिष्ट मार्ग से उस रजो-तमोगुण को दबाता है, क्षीण करता है।

गुरुकृपा अनिवार्य है साथ-साथ में साधक का पुरुषार्थ भी अनिवार्य है। सूर्यनारायण की कृपा अनिवार्य है खेती के लिए उतनी ही किसान की सजगता भी अनिवार्य है। किसान का परिश्रम और सावधानी अनिवार्य है, तभी खेती फलती है। ऐसे ही गुरु की कृपा आवश्यक है और साधक का साधन-भजन में उत्साह भी आवश्यक है, परिश्रम भी आवश्यक है तथा किया हुआ साधन-भजन, किया हुआ पुरुषार्थ, लायी हुई सात्त्विकता, की हुई आध्यात्मिक यात्रा कहीं बिखर न जाय इसकी सजगता भी साधक के लिए अनिवार्य है। सावधानी नहीं होगी तो गाय, बकरे आदि पशु उसे कुचल देंगे, नष्ट कर देंगे। अथवा, साधक सिंचाई नहीं करेगा, खाद नहीं डालेगा तो खेत का लहलहाना मुश्किल हो जायेगा।

ऐ साधक ! तू अपने दिल के खेत में ब्रह्मविद्या की सिंचाई करते रहना जिससे आत्मज्ञान का फल लगे। यह सिंचाई तब तक करते रहना, सावधानी से बाड़ बनाते रहना, निगरानी करते रहना जब तक तुझे अमृतपद की प्राप्ति न हो जाय।

यह संसार कटीला मार्ग है। जैसे खेत हरा-भरा होते ही पशु आ जाते हैं, छोटे-मोटे जीवाणु भी लग जाते हैं तो किसान उसका इलाज करता है, बाड़ मजबूत करता है वैसे साधना के खेत को बिगाड़ने वाले प्रसंग भी आते हैं।

चार पैसे का अनाज प्राप्त करने के लिए किसान सब प्रकार की सावधानी रखता है तो हे साधक ! विश्वनियन्ता को पाने के लिए तू भी सावधान रहना भैया ! तू भी अपनी संयम की बाड़ करना। साधना के भिन्न-भिन्न प्रकारों की सिंचाई करते रहना। साथ में देखना कि कहीं मान बड़ाई, सुख-दुःख के थपेड़े आकर तेरे साधनारूपी खेत को तो उजाड़ नहीं रहे हैं ! जब मौका मिले तब तू एकान्त में जाना। एकान्तवास करना, अल्प देखना, अल्प बोलना, अल्प सुनना। बाकी का समय अपनी साधनारूपी खेती की सिंचाई करना।

किसान घर छोड़कर खेत में ही खाट डाल देता है। ज्यों-ज्यों खेत उभरता है, दाने लगते हैं त्यों-त्यों किसान अपनी जिम्मेदारी अधिक महसूस करता है। ऐसे ही प्रारंभिक साधक भले ही जिम्मेदारी अधिक महसूस करता है। ऐसे ही प्रारंभिक साधक भले ही जिम्मेदारी महसूस न करे, साध्य को पाने के लिए सुरक्षा की बाड़ न करे मगर जो साधक कुछ चार कदम चल पड़े हैं, जिन्हें आत्मज्ञान का लगा हुआ फल महसूस हो रहा, जिन्हें शांति, प्रेम और आनन्द का एहसास हो रहा है, जिनका सूक्ष्म जगत में, सूक्ष्म साधना में प्रवेश हो रहा है, जो केवल बाहर के उपदेशों से ही नहीं लेकिन आन्तर मन से, आन्तर यात्रा से पवित्र हुए हैं ऐसे साधक घर से खटिया हटाकर खेत में खटिया डाल देते हैं। बाहर के लोकाचाररूपी घर से खटिया हटाकर ब्रह्मचिन्तनरूपी खेत में अपनी खटिया रख देना। आत्म-चिन्तन के खेत में, आत्म-प्रीति के खेत में खटिया धर देना। उठना भी खेत में, बैठना भी खेत में, चलना भी खेत में हो जाता है। खेत ज्यों लहलहाता है, फसल देने को तत्पर होता है त्यों किसान घर पर जाने का समय कम कर देता है। भोजन भी खेत में ही मँगा लेता है।

ऐसे ही हे साधक ! तू भी अपना खान-पान, रहन-सहन साधनामय बना दे। किसान चार पैसे के धान्य के लिए इतनी कुरबानी करता है तो ऐ मेरे  प्यारे वत्स ! तू भी अनन्त-अनन्त ब्रह्माण्डनायक रूपी आत्मज्ञान के फल को पाने के लिए सजग रहना। क्योंकि ते री संपत्ति किसान की संपत्ति से बहुत ऊँची है। तेरा लक्ष्य किसान के लक्ष्य से अनन्त गुना ऊँचा है। इसलिए तू सावधान रहना। तू हजारों मील गुरु से दूर होगा तभी भी याद रखना, तेरे गुरु की कृपा तेरी सहाय रहेगी।

साधक का दिल पुकार उठाः

"हे गुरुदेव ! जब जब मैं निराश हुआ हूँ, थका हूँ, हताश हुआ हूँ तब-तब क्षणभर के लिए ही आपकी स्मृति लाकर थोड़ा सा ही भीतर से आपकी ओर आया हूँ तो तुरन्त मुझे आश्वनासन मिला है, मार्ग मिला है, प्रेम मिला है, पुचकार मिली है। गुरुदेव ! जब मैं फिसला हूँ, मनमानी की है, तब-तब तुम्हारी डाँट मिली है, तुम्हारी कड़ी नज़र दिखी है। जब-जब मैं तुम्हारी करुणा कृपा के अनुकूल चला हूँ तब वही कड़ी नज़र मीठी नज़र हुई है।

आपकी कड़ी नज़र भी हमारी गढ़ाई के लिए है और आपकी मीठी निगाहें भी हमारी गढ़ाई के लिए है। आपका बोलना भी हमारे कल्याण के लिए है और मौन होकर सूक्ष्म सहाय करना भी हमारे कल्याण के लिए है। अब इस प्रकार की अनुभूतियाँ हो रही हैं।

हे ब्रह्मवेत्ता गुरुदेव ! हे आत्मारामी मेरे गुरुदेव ! आप न जाने किस-किस प्रकार से हमारा लालन-पालन करते हैं। आपका कोई पूर्व आयोजन नहीं लेकिन आपकी हर अदा, हर चेष्टा, हर अँगड़ाई, हर हिलचाल, चाहे फिर हाथ की चेष्टा हो चाहे नयनों की छटाएँ हो, चाहे बोलना हो, चाहे चुप होना हो, हम लोगों को न जाने किस-किस रूप में वह रहस्यमयी अँगड़ाईयाँ मिलती हैं ! नृत्य करता ब्रह्म हमारे जीवन में ब्रह्मभाव, अपनी ब्राह्मी अनुभूति का सिंचन करता है। उन ब्रह्मवेत्ताओं को एक क्षण बाद का भी कोई निश्चित कार्यक्रम नहीं होता है। सहज रूप से हमारी गढ़ाई करते हैं क्योंकि वे सहज स्वरूप में स्थित होते हैं। जिसने उनकी करीबी का एहसास किया है, जिसने अपने आपको उस परमात्मा में प्रतिष्ठित कर दिया है, अपने आपको उनमें मिला दिया है ऐसे ब्रह्मवेत्ताओं की हर चेष्टा बड़ी रहस्यमयी होती है, प्रारम्भ में हम समझें चाहे न समझें, हम पा सकें, हजम कर सकें चाहे न कर सकें लेकिन उनकी हर चेष्टा बड़ी रहस्यमयी होती है। उनके चलने, फिरने, खाने, पीने, बोलने, बैठने के ढंग की छोटी से छोटी चेष्टा भी हमारे लिए नितान्त कल्याणकारी होती है। ऐसे जो परम गुरुलोग हैं, ब्रह्मवेत्ता सत्पुरुष हैं उनका बयान करने की ताकत हमारी जिह्वा में नहीं है।"

शिल्पी तो पत्थर से भगवान की मूर्ति बनाता है लेकिन ब्रह्मगुरु सदगुरु तो विरोध करने वाले, प्रतिक्रिया करनेवाले मन्द बुद्धि के मनुष्य को ब्रह्म बनाते हैं। पत्थर में से मूर्ति बनाना आसान है क्योंकि पत्थर शंका नहीं करेगा, शिकायत नहीं करेगा, विरोध नहीं करेगा, घर नहीं भागेगा। परंतु साधक तो घर भी भागेगा, दुकान की तरफ भी भागेगा। थोड़ा सुकर्म में चलेगा तो कुकर्म में भी भागेगा, चिन्ता में भी गिरेगा, अहंकार की ओर भी दौड़ेगा। कभी-कभी अपने गुरु के विषय में उसके चित्त में कैसे-कैसे विचार उठेंगे। न जाने कैसे-कैसे खिसकने के तरीके खोजेगा, कैसे-कैसे बचाव के तरीके खोजेगा। पत्थर की मूर्ति बनाना आसान है लेकिन इस कलियुग के चलते पुर्जे, चंचल चित्त रखने वाले मानव को महेश्वर के अनुभव में प्रतिष्ठित करना कितना कठिन है ! वह अति कठिन कार्य सहज में, स्वाभाविक, स्वनिर्मित मनोरंजन के भाव से परम गुरुओं के द्वारा संपन्न होता है।

ऐसे गुरुओं को समझने के लिए हे मेरे साधक! हे मेरे मन ! तू अथाह विश्वास, अथाह साधन-सामग्री, अथाह पुरुषार्थ, अथाह प्रेम से अथाह ईश्वर को पाने का दृढ़ निश्चय रखेगा तभी तू अथाह अनुभव के दाताओं को पहचान पायेगा, उनको समझ पायगा। जितना तू परमात्मा के लिए लालायित रहेगा उतना ही परमात्मा के प्यारों को पहचान पायगा, उनके निकट हो पायगा।

हे वत्स ! जो विकारों के प्यारे हैं, परिवर्तित पदार्थों के प्यारे हैं उनके प्रभाव से तू बचना। जो परमात्मा के प्यारे हैं और तुझे परमात्मा में प्रतिष्ठित बनाकर ही चैन की नींद लेना चाहते हैं, तुझे परमात्म-पद में विश्राम कराने के लिए तत्पर है उनको तू सहयोग करना। आनाकानी मत करना, इन्कार मत करना, शिकायत मत करना, छटकने के उपाय मत करना। तू फिसलने की अपनी पुरानी आदत को मत पकड़ना।

हे मेरे साधक ! हे भैया ! तेरा जीवन कितना कीमती है यह वे ब्रह्मवेत्ता जानते हैं और तू कितना तुच्छ चीजों में गिर रहा है यह भी वे जानते हैं। नन्हा-मुन्ना बालक अपनी विष्टा में खेलता है और सुख मानता है, अंगारों को पकड़ने के लिए लालायित होता है, बिच्छु और साँप से खेलने को लालायित होता है। उस अबोध बच्चे को पता ही नहीं कि अभी उनके विषैले डंक तुझे त्राहिमाम करा देंगे। हे साधक ! विषय-विकाररूपी जिस मल-मूत्र-विष्टा में खेलने को तत्पर है वे तुझे बीमार कर देंगे ! तेरी तन्दुरुस्ती को बिगाड़ देंगे। तू अंगारों से खेलने को जा रहा है ! तू तो मक्खन-मिश्री खाने को आया है लाला ! मिट्टी में, गोबर में खेलने को नहीं आया। चौरासी-चौरासी लाख जन्मों में तू इन गोबरों में, कंकड़-पत्थरों में खेला है, पति पत्नी के तुच्छ विकारी सम्बन्धों में तू खेला है, तू बकरा बना है, कई बार तुच्छ बकरियों के पीछे घूमा है। तूने न जाने कितने-कितने जन्मों में तुच्छ खेल खेले हैं। अब तू लाला के साथ खेल, राम के साथ खेल, अब तो तू शिवजी की नाईं समाधि लगाकर स्व के साथ खेल।

हे प्यारे साधक ! अगर तू अपने सदगुरु को खुश करना चाहता है तो उनकी आज्ञा मान और उनकी आज्ञा यही है कि वे जहाँ खेलते हैं उस परमात्मा में तू भी खेल। गुरु जहाँ गोता मारते हैं उसी में तू गोता मार भैया ! गुरुओं की जो समझ है वहाँ अपनी वृत्ति को पहुँचाने का प्रयास कर। इन नश्वर खिलौनों को पकड़कर कब तक सुख मनायगा ? कब तक अंगारों की ओर तू भागेगा ? करुणामयी माँ बच्चे को समझाती है, बच्चा रुक जाता है। माँ इधर-उधर जाती है बच्चा फिर अंगारों की ओर जाता है, चमकते अंगारों को खिलौना समझकर तू छू लेता है और चिल्ला उठता है। तब उसकी माँ को कितना दुःख होता है ! उस समय बालक को माँ की करुण स्थिति का पता नहीं। माँ उसे थप्पड़ मार देती है उस थप्पड़ में भी वात्सल्य भरा होता है, करुणा होती है। बच्चे का कान पकड़ना भी करुणा से भरा है। बच्चे का हाथ-पैर बाँधकर सजा देना भी प्यार और करुणा से प्रेरित होता है।

ऐ साधक ! तू जब गलत रास्ते जाता है, कंटकों और अंगारों में कदम रखता है तो सदगुरुरूपी माता-पिता कड़ी आँख दिखाते हैं, तू उसे महसूस भी करता होगा। 'गुरु रूठ गये हैं.... नाराज हो गये हैं.... पहले जैसे नहीं हैं....' ऐसा तुझे लगेगा लेकिन गौर से जाँच करेगा तो पता चलेगा कि तू पहले जैसा नहीं रहा। तू अंगारों की ओर गया, तू बिच्छू की ओर गया, तू सर्पों की ओर गया इसलिए वे पहले जैसे नहीं भासते। तू शंका-कुशंका में गया, अपनी अल्प मति से ब्रह्मवेत्ता गुरुओं को तौलने का दुस्साहस करने को गया इसलिये उन्होंने कड़ी आँख दिखायी है। वह भी तेरे कल्याण के लिए है। कड़ी आँख भी करुणा से भरी है, कृपा से भरी है, प्रेम से भरी है। कड़ी आँख भी पुकार से भरी है कि तू चल... चल....। तू रुक मत। आगे चल। गिर मत। सावधान हो। फिसल मत। साहस कर। गद्दार मत बन, सतर्क हो। कृतघ्न मत बन, कृतज्ञ हो।

इस प्रकार की उन आँखों से झलकती हुई ज्योति को तू समझा कर। 'गुरु नाराज हैं' ऐसा करके तू शिकायत मत कर, दुःखी होकर तू संसार के कचरे में अधिक मत कूदना। गुरु नाराज हैं तो उन्हें रिझाने का एक ही तरीका है कि तू फिर जहाँ भी हो, घर में हो, मन्दिर में हो, अरण्य में हो, तू फिर ध्यान करना शुरु कर दे, फिर से परमात्मा को प्यार करना शुरु कर दे। तू फिर गुरुओं के अनुभव में डूबना शुरु कर दे। गुरु की कड़ी आँख, गरम आँख उसी समय तुझे शीतल मिलेगी। गुरु उसी क्षण तुझ पर प्रसन्न दिखेंगे। दूसरे क्षण में तुझ पर बरसते हुए दिखेंगे। तू उनके अनुभव में मिटता जा। तू भी अपनी खटिया खेत में रखता जा। तू भी अपना समय साधनारूपी खेत में बिताता जा। तेरे खेत में गुरु की बुआई हुई है, सिंचाई हुई है। उन्हें तेरा खेत लहलहाता दिखता है।

किसान का बेटा खेत की रखवाली न करे, खेत में गधे घुस जाएँ तो बाप नाराज होता है। ऐसे ही हे साधक ! तेरे साधनरूपी खेत में तू अहंकार और वासनारूपी गधे-गधियों को मत घुसने देना। जड़ भोगवादी भैंसों को मत घुसने देना। मीठी-मीठी बात बोलकर तेरे अपने होकर तेरा समय खराब करने वाले मित्र-सम्बन्धी रूपी गायों को भी मत घुसने देना। उन टोलों को दूर से आते देखता है तो चतुर किसान पहले से ही डंडा उठाता है, टार्च उठाता है, आवाज लगाता है। ऐसे ही जब तेरे खेत में कोई प्रवेश करने लगे तो ॐ की गर्जना करना। 'नारायण.... नारायण...' रूपी टार्च का प्रकाश कर देना। गुरुमंत्र की छड़ी खटका देना। वे ढोर दूर से ही भाग जायें, पक्षी उड़ान ले लें। तेरा खेत चुगने आयें उससे पहले ही तू तैयारी रखना।... तो तेरा खेत बच जायगा।

किसान चार पैसे के धान्य की इतनी रखवाली करते हैं। उन किसानों को भी तू गुरु मान लिया कर इस समय।

ऐ वत्स ! तुझे पता नहीं लेकिन तेरे गुरु को पता है कि तू क्या हो सकता है। तुझमें कितना सारा भरा वह तेरे परम हितैषी जानते हैं। तेरे दोस्त तो तेरी तिजोरियाँ जाँचेंगे, तेरे रिश्ते-नाते तेरी तन्दुरुस्ती और रूप लावण्य निहारेंगे। लेकिन गुरुदेव जो तू है उसको निहारेंगे। जो तू है वह उन्हें दिखता है। उन्हें तुझमें जैसा दिखता है वैसा तू एक दिन अपने में खोज ले, वे खुश हो जायेंगे। वे तुम्हें पहुँचाना चाहते हैं वहाँ तू पहुँचने का साहस कर। तू कहीं थकेगा तो वे तुझे सहाय करेंगे।यह सहाय वे दिखायेंगे भी नहीं, अन्यथा तू लाचार हो जायेगा। फिर हर कदम में उनकी सहाय चाहेगा। चलता रह। तू जहाँ थकेगा वहाँ सूक्ष्म रूप से सहयोग करते रहेंगे। तुझे पता तक नहीं चलने देंगे, वे इतने उदार हैं।

बस, ट्रेन या हवाई-जहाजवाले तो टिकट लेकर फिर तेरी मुसाफिरी कराते हैं। चालू गाड़ी में भी टिकट वसूल करते हैं लेकिन गुरुदेव तो पहुँचने के बाद भी टिकट नहीं माँगेगे।

भगवान सदाशिव कहते हैं कि ऐसे ब्रह्मवेत्ता सदगुरु सब गुरुओं में राजा हैं।