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हर हृदय में कृष्णावतार सम्भव है और जरूरी भी है

हर हृदय में कृष्णावतार सम्भव है और जरूरी भी है

(श्रीकृष्ण जन्माष्टमी : 11 व 12 अगस्त)

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म बुझे दीयों को फिर से जगाने का संदेश देता है, मुरझाये दिलों को अपना ओज का दान करता है । श्रीकृष्ण के जीवन में एक और महत्त्वपूर्ण बात छलकती, झलकती दिखती है कि बुझे दिलों में प्रकाश देने का कार्य कृष्ण करते हैं । उलझे दिलों को सुलझाने का कार्य करते हैं और उस कार्य के बीच जो अड़चनें आती हैं, वे चाहे मामा कंस हो चाहे पूतना हो, उनको वे किनारे लगा देते हैं । अर्थात् साधक साधना करे, मित्र, व्यवहार, खान-पान, रंग-ढंग... जो साधना या ईश्वरप्राप्ति में मददरूप हो अथवा जो हमारी घड़ीभर के लिए थकान उतारने के काम में आ जाय उसका उपयोग करके फिर साधक का लक्ष्य यही होना चाहिए - परमात्म-तत्त्व की प्राप्ति ! जिस हृदय को आनंद आता है और जहाँ से आनंद आता है वहाँ पहुँचने का ढंग साधक को पा लेना चाहिए ।

साधक को अपने स्वरूप में स्वस्थ होने के लिए इस बात पर खूब ध्यान देना चाहिए कि तुम्हारी साधना की यात्रा में, ईश्वर के रास्ते में यदि तुम्हारे को कोई नीचे गिराता है तो कितना भी निकट का हो फिर भी वह तुम्हारा नहीं है । और ईश्वर के रास्ते में यदि तुम्हें कोई मदद देता है तो वह कितना भी दूर का हो, वह तुम्हारा है । वे सब तुम्हारे गुरुभाई हैं । परमात्मा से जो तुम्हें दूर रखना चाहते हैं उनके लिए संत तुलसीदासजी कहते हैं :

जाके प्रिय न राम-बैदेही ।

तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ।।

वह परम स्नेही भी हो फिर भी उसे करोड़ों वैरियों की नाईं समझ के उसका त्याग कर देना । त्याग न कर सको तो उसकी बातों में न आना क्योंकि जो स्वयं को मौत से, विकारों से बचा न सका, अपने जीवन को धन्य न कर सका उसकी बातों में आकर हम कहाँ धन्यता अनुभव करेंगे ! इसलिए कौरवों की बातों में नहीं, कृष्ण की बातों में आना हमारा कर्तव्य होता है ।

आप भी ऐसी समझ बढ़ाओ

संसारी कोई भी बात आयी तो यह आयी, वह आयी... उसको देखनेवाला ‘मैं’ नित्य है - ऐसा श्रीकृष्ण जानते थे । आप भी इस प्रकार की समझ बढ़ाओ । यह आयी, वह आयी... यह हुआ, वह हुआ... यह सब हो-हो के मिटनेवाला होता है; अमिट ‘मैं’स्वरूप चैतन्य का कुछ नहीं बिगड़ता है । ऐसी सूझबूझ के धनी श्रीकृष्ण सदा बंसी बजाते रहते हैं, सदा माधुर्य का दान करते रहते हैं और प्रेमरस का, नित्य नवीन रस का पान करते-कराते रहते हैं । तो यह जन्माष्टमी का उत्सव श्रीकृष्ण की जीवनलीला की स्मृति करते हुए आप अपने कर्म और जन्म को भी दिव्य बना लें ऐसी सुंदर व्यवस्था है ।

यह तुम कर सकते हो

अपने-आपको आप नहीं छोड़ सकते । जिसको कभी नहीं छोड़ सकते, ॐकार का गुंजन करके उसमें विश्रांति पा लो । सत्संग सुन के उसका ज्ञान पा लो । भगवान साकार होकर आ गये तो भी अर्जुन का दुःख नहीं मिटा लेकिन भगवान के तत्त्वज्ञान का आश्रय लिया तो अर्जुन का दुःख टिका नहीं ।

श्रीकृष्ण की दिनचर्या अपने जीवन में ले आओ । श्रीकृष्ण थोड़ी देर कुछ भी चिंतन नहीं करते और समत्व में आ जाते थे । आप भी कुछ भी चिंतन न करके समता में आने का अभ्यास करो - सुबह करो, दोपहर करो, कार्य या बातचीत में भी बीच-बीच में करो ।

कंस, काल और अज्ञान से समाज दुःखी है । इसलिए समाज में कृष्णावतार होना चाहिए । हर हृदय में कृष्णावतार सम्भव है और जरूरी भी है । श्रीकृष्ण ने कंस को मारा, काल के गाल पर थप्पड़ ठोक दिया और अज्ञान मिटाकर अर्जुन व अपने प्यारों को ज्ञान दिया । शुद्ध अंतःकरण ‘वसुदेव’ है, समवान मति ‘देवकी’ है, हर परिस्थिति में यश देनेवाली बुद्धि ‘यशोदा’ है । भगवान बार-बार यशोदा के हृदय से लगते हैं । ऐसे ही बार-बार भगवद्-स्मृति करके आप अपने भगवद्-तत्त्व को अपने हृदय से लगाओ । बाहर से हृदय से लगाना कोई जरूरी नहीं, उसकी स्मृति करके हृदय भगवदाकार कर लो ! और यह तुम कर सकते हो बेटे !

संस्कृति के लिए संकोच नहीं

कोई बड़ा शूरवीर रण छोड़कर भाग जाय तो उसे कायर कहते हैं किंतु हजारों की सुरक्षा और संस्कृति की रक्षा में रण का मैदान छोड़ के कायरों का नाटक करनेवाले का नाम हम लोग श्रद्धा-भक्ति, उत्साह से लेते हैं : ‘रणछोड़राय की जय !’ यह कैसा अद्भुत अवतार है ! भक्तों के लिए, संस्कृति, समाज व लोक-मांगल्य के लिए पुरानी चप्पल पीताम्बर में उठाने में श्रीकृष्ण को संकोच नहीं होता । अर्जुन के घोड़ों की मालिश और उनके घावों में मलहम-पट्टी करना और अर्जुन की घोड़ागाड़ी चलाना उन्हें नन्हा काम नहीं लगता । इसीमें तो ईश्वर का ऐश्वर्य है लाला ! इसीमें उनकी महानता का दर्शन हो रहा है ।

 

REF: RP-331-JULY2020


यह है श्रीकृष्णावतार का रहस्य !

यह है श्रीकृष्णावतार का रहस्य !

- पूज्य बापूजी

(श्रीकृष्ण जन्माष्टमी : 24 अगस्त)

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव बड़ा रहस्यभरा महोत्सव है । समाज में पहले से लेकर आखिरी व्यक्ति का खयाल करके उसके उत्थान के लिए भिन्न-भिन्न आयामों का आविष्कार और स्वीकार करते हुए व्यक्ति की आवश्यकताएँ व महत्ता को समझ के उसका विकास करनेवाला जो परात्पर ब्रह्म हर जगह मौजूद है... सगुण साकार होकर गुनगुनाता, गीत गाता, नाचता, खिलाता और खाता, अनेक अठखेलियाँ करता हुआ, जीव को अपनी महिमा में जगाता हुआ जो अवतार है, उसे श्रीकृष्णावतार कहते हैं ।

ग्वाल-गोपों जैसी लीला का रहस्य

जब पृथ्वी पर अहंकारी और वासना से लिप्त लोगों के हाथ में सत्ताएँ आ गयीं... धर्मसत्ता स्वार्थी लोगों के हाथ में और राज्य-सत्ता प्रजा को निचोड़नेवाले लोगों के हाथ में आ गयी, तब प्रजा का वह आनंद, प्रजा का वह कृष्ण खो गया । प्रजा का वह प्रेम और मुक्त हास्य, स्वातंत्र्य और ‘स्व’ के गीत गुंजाने की क्षमता मारी गयी । श्रीकृष्ण ने देखा कि लोगों को अपने से छोटे मानकर यदि उन्हें उन्नत किया जायेगा तो काम नहीं चलेगा और बड़े मानकर करेंगे तो अवज्ञा करेंगे, लाभ न ले सकेंगे... तो चलो, अपने बराबरी के मान के उनके साथ नाचो, गाओ, गुनगुनाओ ताकि वे कुछ ऊपर उठ जायें ।

जेल में अवतरण का रहस्य

श्रीकृष्ण कोई राजकुमार अथवा राजाधिराज बनकर नहीं रहे हैं । श्रीकृष्ण का जेल में अवतरण हुआ है । हजारों जन्मों से यह जीव कैद में पड़ा है । कैद में पड़े हुए व्यक्तियों से मिलना है तो तुम्हें भी कैद में आना पड़ेगा । जहाँ श्रीकृष्ण कैद में आकर कैदियों को छुड़ा रहे हैं वहीं वे ज्ञानियों के लिए उतने ही पूर्ण स्वतंत्र हैं ।

श्रीकृष्ण में जिनकी जिस समय जैसी दृष्टि होती है उस समय उनको वे वैसे ही भासते हैं क्योंकि श्रीकृष्ण पूर्ण अवतार हैं । श्रीकृष्ण मित्रों को मित्र, चाणूर और मुष्टिक को पहलवान, कंस को काल, योगियों को योगेश्वर, भक्तों को भगवान, गोपियों को अपना प्यारा और वसुदेव को अपने बेटे दिखते हैं । वेदांत कहता है कि ‘वही कृष्ण, वही चैतन्य कहीं बेटा बना है, कहीं प्यारा बना है, कहीं मृत्यु बना है तो कहीं जीवन बना है, कहीं अपना बना है तो कहीं पराया बना है ।’

सनातन धर्म के ऋषियों ने, भारतीय प्रजा ने 33 करोड़ देवता माने हैं । उनमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश को मूर्धन्य, मुख्य माना है । सृष्टि की 3 सत्ताएँ हैं - उत्पत्ति (जन्म), स्थिति (जीवन) और प्रलय (मृत्यु) । इन सत्ताओं के अधिष्ठाता मुख्य 3 देव हैं - ब्रह्मा, विष्णु और महेश । सृष्टि की उत्पत्ति और मौत हम लोगों के हाथ में नहीं है । हम लोगों के हाथ में जीवन है तो उस जीवन में ही हमारे गीत गूँजें और उन गीतों को गुंजाने के लिए आदिनारायण विष्णुजी ने नन्हा-मुन्ना रूप धारण किया, उसी रूप का नाम है श्रीकृष्ण !

श्रीकृष्ण जिस वक्त जो उचित है वह करते हैं ऐसी बात नहीं, श्रीकृष्ण जो करते हैं वह उचित होता है क्योंकि जब अपना (व्यक्तिगत) स्वार्थ अलविदा हो जाता है तो उन ब्रह्मवेत्ताओं के द्वारा जो होता है, उचित होता है ।

गोवर्धन पूजा का रहस्य

समाज में जब सत्ता का, धन का पूजन होने लगता है तो उसकी चकाचौंध में व्यक्ति अंदर की आत्मसत्ता और अंदर का आत्मधन भूल जाता है । इन गलतियों को विनोद व युक्ति से दूर करके व्यक्ति की चेतना जगाने का जो कार्य है वह श्रीकृष्ण की लीला से प्रकट हो रहा है । लोग इन्द्र की अर्थात् धन और सत्ता की पूजा करते थे । कृष्ण ने कहा कि ‘‘हर साल इन्द्र की पूजा करते हो परंतु चलो, आज गोवर्धन की पूजा करें ।’’

‘गो’ उपनिषदों का भी नाम है । उपनिषदों के धन की पूजा अर्थात् आत्मज्ञानी महापुरुषों के चरणों में बैठकर अपने आत्मतत्त्व की पूजा - यह गोवर्धन की पूजा है । बाहर का धन, सत्ता न होने पर भी तुम्हारे पास यदि आत्मज्ञान और समझ है, उत्साह और हिम्मत है तो सत्ता और धन के बल से जो बड़े बन बैठे हैं उनकी परवाह किये बिना तुम महान गोवर्धन की पूजा कर सकते हो । हो सकता है कि सत्ता और धन तुम्हें दबायें, तुम पर मेघ गरजायें, भय दिखायें लेकिन कृष्ण तुम्हारे साथ हैं, आत्मदेव तुम्हारे साथ हैं । तुम छोटी-मोटी अपनी लकड़ियाँ लगाओ और वह भी जरा छोटी उँगली (कनिष्ठिका) अर्थात् अपनी वृत्ति लगा देगा तो बड़े-में-बड़ा पहाड़ जैसा दुःख भी दुःख न देगा, तुम्हारे लिए वह छतरी बन जायेगा ।

ये लीलाएँ देखकर नियम को, कायदों को भी खतरा हुआ कि ‘अब हमारा राज्य किस पर चलेगा ?’ कंस का अंधा कायदा कृष्ण को नहीं पकड़ सकता है । ज्यों पकड़ने की कोशिश करता है त्यों कंस को भागना पड़ता है ।

व्यवहार में बुद्धि का उपयोग होना चाहिए । जिनके पास बुद्धि थी उन्होंने बुद्धि लगा दी शोषण में और जिनके पास भाव था वे भाव से भयभीत हो गये । अब बुद्धिमानों के घर जन्म लेने की जरूरत नहीं है, भावुक भोले-भालों के बीच पैदा होकर विनोद का अवलम्बन लेते हुए, प्रेम का प्रसाद लुटाते हुए उनके अंदर बुद्धि का विकास हो । बुद्धि के विकास को यहाँ तक पहुँचाने का कृष्ण का लक्ष्य होगा कि व्यक्ति फिर जन्म-मृत्यु के चक्कर में न आये, वह अपनी महिमा में जग जाय ।

तो समझ लो कि आपका काम पूरा हो गया

श्रीकृष्ण की बाह्य लीला अथवा चमत्कारों के कारण ही श्रीकृष्ण को सब लोग मानते हैं ऐसी बात नहीं है । चमत्कार होना यह जीवन का आखिरी लक्ष्य नहीं है लेकिन चमत्कार जिस चैतन्य की सत्ता से होता है उस चैतन्य का साक्षात्कार करना यह जीवन का आखिरी लक्ष्य है । श्रीकृष्ण ने सब स्वीकार किया है । कृष्ण को बोलो कि ‘घोड़ागाड़ी चलाओ’ तो बोलेंगे, ‘ठीक है’, ‘माखन चोरी करो, किसीको अँगूठा दिखाओ’ तो ‘ठीक है’ और अभी यदि श्रीकृष्ण आ जायें तो उनको बोलो कि ‘बिगुल बजाओ, ढोल बजाओ’ तो बजायेंगे ।

श्रीकृष्ण के जीवन में देखो तो वल्लभाचार्यजी, रामानंदजी का हृदय, शंकराचार्यजी का तत्त्वज्ञान, कबीरजी की लीला - सब दिख जाता है । जैसे एक ब्रह्म में सारा ब्रह्मांड है, ऐसे ही श्रीकृष्ण के जीवन में समग्र आयाम स्वीकार किये गये हैं । इसलिए श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव हजारों वर्षों बाद भी ताजा है क्योंकि लोकमानस को छूता आया है ।

जन्माष्टमी उन्हींका जन्मदिन है जिनके जीवन में परात्पर ब्रह्म-परमात्मा का पूरा ओज चमकता हुआ दिखता है; उनको हम लोगों के बार-बार प्रणाम हैं । उनके नाम पर नाच लेने, जय बोलने या उनके आगे दीया-बत्ती करने से काम पूरा नहीं होता है, यह तो उसकी शुरुआत है । जब पूर्ण स्वरूप जो तुम्हारे हृदय में छुपा है उसको जानकर अपने जन्म-मृत्यु के बंधन को तोड़ दिया, समझ लो कि काम पूरा हो गया ।


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The Mystery behind the incarnation of Lord Krishna!


                             (Shri Krishna Janmashtami: 24th August)                 – Pujya Bapuji


The birthday celebration of Lord Krishna is mysterious. The all-pervading Supreme Brahman who, understanding the need and importance of humans, invented and accepted various dimensions to ensure the progress of every level of individuals in society. The incarnation of the omnipresent Supreme Brahman assuming a form with attributes to awaken the Jiva (individual soul) in his innate greatness by singing, dancing, eating, feeding and enjoying life, is the incarnation of Lord Krishna.


The secret of playing the role of a cowherd


When the administrative power on Earth went into haughty and lustful hands; the power of Dharma (religion) into the hands of selfish people and the political power into the hands of exploiters of the public; people lost their Krishna- the bliss. The love, the laughter, independence and the ability to get inherent joy possessed by people were destroyed. Shri Krishna realised that efforts to uplift people by becoming their superior would not work. And they would disregard me if I make efforts to uplift them, considering them elders. They would not be able to get the benefits of my efforts. So, let me dance, sing and hum with them as their equal so that they are uplifted.


The secret of birth in jail


Shri Krishna did not live like a prince or an emperor in his childhood. He was born in a prison cell to symbolise that the jiva has been imprisoned for thousands of births. If you want to see prisoners, you only have to go to jail. On the one hand Shri Krishna goes into jail to release prisoners, and on the other hand he enjoys absolute freedom according to the jnanis (Self-realized men).


Everyone looked upon Lord Krishna’s form according to the concept each had about Him, because He is Poorna Avatar. The friends (cowherds) saw Krishna as a friend, the wrestlers Chanura and Mushtik as a wrestler, Kansa as death, Yogis as the Lord of Yogis, devotees as God and cowherd girls as their beloved, and Vasudeva as his son. Vedanta states: ‘The same Krishna, the same consciousness assumes various forms – a son, a beloved, death, life, our own and a stranger in different places.’


The people of India believe in 33 crore deities. Brahma, Vishnu and Mahesh are major gods. There are three stages the universe passes through – Creation (birth), sustenance (life) and destruction (death); and Brahma, Vishnu and Mahesh are their respective gods. Creation and destruction of the universe is not in our hands but Life surely is. So our blissful songs should resound in this life only, hence the Supreme Aadi Narayan Lord Vishnu incarnated as an endearing baby for that purpose, the name of this form is Shri Krishna.


It is not (true) that Shri Krishna does right acts at right times, instead whatever act He does becomes right. When selfishness is gone, every act being done by the Self-realized person is right.


The secret of worshipping Govardhan Hill


When power and wealth are worshipped in society, the human being, blinded by its glamour becomes oblivious of inner reality (inner Self) and inner wealth. Hence Lord Krishna, through tricks and humour, rectifies these mistakes to awaken the consciousness of the person. Krishna’s lila depicts this act well. People worshipped Indra, the symbol of wealth and power. So Krishna said, ‘We worship Indra every year. Let us worship Govardhan Hill this year.’


The Sanskrit word ‘Go’ also refers to Upanishads. Worship the ‘wealth of the Upanishads’ means worship of our Atman, the truth absolute, while sitting at the lotus feet of Self-realized great men is the worship of Govardhan Hill. If you have the wealth of Self-knowledge and understanding, zeal and courage, even without having material wealth and power you can worship the great Govardhan without caring about the support of so called big guns who have power and wealth. The men possessing wealth and power might possibly suppress, threaten and intimidate you, but still Lord Krishna is with you, Self-god is with you. Make efforts like the cowherds applied their sticks to support the hill, then He will lift the hill on his little finger and you will not be distressed even by mountain-like sorrow. It will become a protective shield for you.


Seeing such plays of Krishna, even the regulatory bodies felt insecure of their might on the public. They were worried as to who will now be governed by us. The blind laws of Kansa cannot trap Krishna. The more he tries to capture Krishna, the more he is compelled to run away.

Intellect should be applied to practice in life. Intellectuals misused their intellect exploiting people, and people of an emotional temperament became frightened. Hence, the need of the hour was to take birth among the sentimental, simple innocent people and develop their intellect and wisdom through amusement, and blessing them with pure love. Krishna’s goal would be to develop wisdom to such an extent that the person becomes free from the cycle of birth and death being awakened in his own glory.


Then your goal is accomplished


Believers of Krishna do not believe in Him due to His lilas and miracles alone. Performing miracles is not the ultimate goal of life. The ultimate goal is to attain realization of the consciousness which enables one do the miracle. Shri Krishna has accepted everything, be it driving a chariot, stealing the butter, making a gesture with a thumb in derision. If Shri Krishna comes now and you ask him to play a drum or bugle, he would even agree to that.


The life of Lord Krishna reflects the heart of Vallabhacharyaji and Ramanandji, the knowledge of Shankaracharyaji and the lila of Kabirji. The way the entire universe exists in the Absolute Brahman, all dimensions are accepted in the life of Lord Krishna. So the celebration of Lord Krishna’s birthday is ever fresh, even after thousands of years because it has been touching the human mind.  Janmashtami is the birthday of that Lord whose life shows the brilliance of that Supreme Brahman, Supreme Self in fullness. We salute Him again and again. Our goal is not achieved merely by singing and dancing on His name, making shouts of victory, or lighting a lamp before Him, which indeed is the beginning of the journey. The goal is achieved when you realise the eternal Supreme Being dwelling in your heart and get liberated from the endless cycle of birth and death.

 

[Rishi Prasad-Issue320-August-2019]


श्री गीता जी Tips

श्री गीता जी Tips

भक्ति बढाने हेतु :-


जिसको अपनी भक्ति बढानी है .... भगवद्‍गीता का १२वाँ अध्याय पढ़के, भगवद्‍गीता हाथ में ही रखकर भगवान को प्रार्थना करे: "हे भगवान! भगवद्‍गीता का १२वाँ अध्याय भक्तियोग नामक अध्याय है। जिसका मैंने आज पाठ किया है। ऐसी कृपा करना प्रभु कि मेरी भक्ति बढ़ जाये। बस मेरी भक्ति बढ़ जाये दाता !! " दिल से प्रार्थना करोगे न तो सचमुच भगवान के वचन गीता में हैं। और १२वें अध्याय को भक्तियोग नामक अध्याय कहते हैं। वो पाठ करके प्रार्थना की तो भगवान की, गुरु की कृपा क्यों नहीं बरसेगी!! भक्ति बढ़ेगी और वो ही भक्ति सब सुखों की खान है।

- श्री सुरेशानंदजी, रायपुर, 24 जून 2012

 

 

क्षमा याचना हेतु -

क्षमा याचना हेतु -

आपको लगता है की मेरे से ये गलती हुई है......तो ... हे! भगवान तू मुझे माफ़ कर, हे! गुरुदेव मुझे माफ़ करो ...... तो गीता का ये श्लोक... अठारवाँ आध्याय ६६वाँ श्लोक बोले , .... तो ये श्लोक दिन में कई बार बोले |

श्लोक - सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुच: ||

- Shri Sureshanandji Surat 9th Aug' 2012

 

 

घर में समृद्धि के लिए

घर में समृद्धि के लिए

 घर में समृद्धि लाना चाहते हो तो जिस घर के पुरुष काम पर जाते हों तो घर की महिलाएँ, जब पुरुष काम पर जायें तब गीता के 11 वें अध्याय का 40 वां श्लोक 108 बार पढ़ें और भगवान से प्रार्थना करें कि मैंने ये जो पाठ किया है इसका पुण्य हमारे घर के अमुक-अमुक पुरुष को ( उनका नाम लेकर) दीजिये उन्हें कार्य खूब सफलता मिल ऐसी प्रार्थना करके अर्घ्य दें इससे घर के काम करने वाले व्यक्ति को बहुत सफलता मिलेगी यह कई लोगों का अनुभव है इस श्लोक की इतनी महिमा है और इतना सरल भी है |

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते

नमोऽस्तुं ते सर्वत एव सर्व।

अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं

सर्व समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः।।40।।

हे अनन्त सामर्थ्य वाले ! आपके लिए आगे से और पीछे से भी नमस्कार ! हे सर्वात्मन्! आपके लिए सब ओर से नमस्कार हो क्योंकि अनन्त पराक्रमशाली आप समस्त संसार को व्याप्त किये हुए हैं, इससे आप ही सर्वरूप हैं।(40)"

 

 

श्राद्ध के दिन

 श्राद्ध के दिन

जिस दिन आप के घर में श्राद्ध हो उस दिन गीता का सातवें अध्याय का पाठ करे । पाठ करते समय जल भर के रखें । पाठ पूरा हो तो जल सूर्य भगवन को अर्घ्य दें और कहें की हमारे पितृ के लिए हम अर्पण करते हें। जिनका श्राद्ध है , उनके लिए आज का गीता पाठ अर्पण।
श्राद्ध पक्ष - 29th Sep to 15th Oct'2012
 

- श्री सुरेशानंदजी Rohini Delhi 12 Sep, 2011

 

 

 

श्रद्धा -भक्ति बढ़ाने हेतु

गीता के १२ वें अध्याय का दूसरा (२) और बीसवां (२०) श्लोक .. केवल दो श्लोक का पाठ कर के...भगवद गीता हाथ में रख कर..हम शुभ संकल्प करें कि " हे भगवन ! आप ने ये दो श्लोकों में जो परमश्रद्धा की बात बताई है वो हमारी हमारे गुरु चरणों में हो जाये " तो वो वचन भगवन के हैं ...भगवान सत्स्वरूप हैं तो उनके वचन भी सत है और हम उन वचनों का पाठ कर के संकल्प करें तो जो सचमुचअपने गुरु में श्रद्धा भक्ति बढ़ाना चाहते हैं उनका संकल्प भी ऐसा ही हो जाएगा ।
 

शोल्क :-
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।।2।। 

श्री भगवान बोलेः मुझमें मन को एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं।(2)

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः।।20।।

परन्तु जो श्रद्धायुक्त पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेमभाव से सेवन करते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं।(20) 

 

- श्री सुरेशानंदजी अहमदाबाद 16th Jan' 2012

 

 

पितृ पक्ष

 अपने घर के लोगजो गुजर गये हैं उनकी आत्मा को शांति देने के लिए इतना जरूर करें कि अब सर्व पितृअमावस्याआयेगी, उस दिन गीता का पाठ करें, सूर्यभगवान के सामने जल और अन्न ले जाकरप्रार्थना करें कि: "हे सूर्यदेव, यमराजआप के पुत्र हैं, हमारेघर के जो भी गुजरगये उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें, आज के गीता के पाठ का पुण्य उनके लिए दीजीये" पितृ गण राजी होंगे, घर में अच्छी संतान जन्म लेगी यह सर्व पितृ का दिन जरूरकरें

Pitru Paksh/Shraaddh Paksh

Pirtu Paksh is currently in progress. For peace of all the souls who passed away in your home, you must, on the day of Sarvapitri Amavasya, recite Bhagvad Gita, offer water and meal to Surya Narayan and pray:" He Suryadev, your son is Yamaraj; please offer peace to all who passed away in our home and pass on the virtues of today's Gita recitation to them."

If all ancestors are pleased, then good souls will take birth in your family. You must do this on the day of Sarvapitri Amavasya.

-5th September 07, Baksi(Ujjain)

 

 

घर में किसी के स्वास्थ्य बिगड़ने पर(Sickness of a family member)


  • अगर घर में कोई बहुत दिन से बीमार है और आप कोशिश में हों कि जल्दी आराम जाये तो वड़ दादा की परिक्रमा करके प्रार्थना करें और महा-मृत्युंजय का जप करें


  • कोई मृत्यु के समीप हो और आप वहाँ उपस्थित हों तो उस व्यक्ति की इतनी सेवा अवश्य की गीता का आठवां अध्याय पढ़ें भले ही वह व्यक्ति सुन नहीं पाये, समझ नहीं पाये फिर भी उस व्यक्ति के पास बैठ कर ये अध्याय पढ़ने मात्र से उसको लाभ होगा


  • Pray to the Lord while circumambulating the Bada dada in the nearby ashram. Chant maha mritunjaya mantra for the benefit of the sick.
    Read the 8th chapter of Gita to a person at the death’s door। A mere reading of this chapter benefits the beleaguered soul, irrespective of whether he is able to listen to or understand it।
     

 

-25th Nov 07, Vadodara

 

 

नौकरी धन्धे में समस्या (Service/Business related problems)

 

 

💠 कई लोगों का अनुभव है कि नौकरी धन्धे में कोई समस्या हो तो खाना खाने से पहले गीता के 15वें अध्याय का पाठ करें लाभ अवश्य होता है जादू टोना ऐसे मैले उपाय नहीं करें ऐसे शस्त्र सम्मत उपाय करने से लाभ निश्चित होता है

 

Many people have observed that reading the 15th chapter of Gita, before taking food, solves the problems one is facing in his service/business.

 

💠 नौकरी में कोई समस्या है तो हर शनिवार को दूध, पानी और गुड मिलाकर पीपल को अर्पण करें अपने आप सब कुछ अच्छा होगा

 

Offering the fluid prepared by mixing water, milk and jaggery to a sacred fig (Peepal tree) every Saturday, helps solving the service related problems.

 

-5th September 07, Baksi(Ujjain)


श्रीकृष्ण अवतार का रहस्य

श्रीकृष्ण अवतार का रहस्य

वह सुंदर जहाँ-तहाँ अपना सौंदर्य, वह दयालु जहाँ-तहाँ अपनी दया, वह करुणावरुणालय जहाँ-तहाँ अपनी करुणा फैलाता है, उसीका नाम है कृष्णावतार । भगवान के स्वभाव का अनुसंधान करने से आपको भगवान की करुणा-कृपा, अंतर्यामीपने और प्रेरकपने का चिंतन होगा तथा भगवान की करुणा व उदारता का चिंतन करते रहने से आपके मन में हिम्मत आयेगी ।

न्याय तो यमराज के हवाले है । राजा मृदु स्वभाव का होना चाहिए, सिर्फ दंड देनेवाला राजा या भगवान हमें नहीं चाहिए । भगवान की कितनी करुणा व उदारता है ! पूतना, जो अपने स्तनों पर कालकूट जहर लगा के आयी, उसका जहर पिये जा रहे हैं और उसे मुक्ति का दान दे रहे हैं । शकटासुर, अघासुर, बकासुर हो या फिर केशी, जो भी मारने आये उनको सुखी करने के लिए स्वधाम भेज रहे हैं । ये सिर्फ दंड देनेवाले भगवान नहीं हैं, ये तो दया, प्रेम करनेवाले भगवान हैं । युद्ध के मैदान में गीता का ज्ञान देनेवाले भगवान हैं । दैत्यों को, असुरों को दंड देकर भी माधुर्यलोक में भेजनेवाले भगवान हैं ।

जो चतुर्भुजी मानते हैं उनको चतुर्भुजी, जो द्विभुजी मानते हैं उन्हें द्विभुजी रूप में दिखते हैं और जो आत्मशांत मौनरूप में मानते हैं उन्हें अपने मौनस्वभाव में आनंदित कर देते हैं ।

गीता (७.२५) में भगवान ने कहा : योगमायासमावृतः... उस योगमाया से हमारे भगवान कभी भी कोई भी रूप धारण करने में, कभी भी कोई भी लीला करने में सक्षम हैं, अंतर्धान होने में सक्षम हैं । अंतप्र्रेरणा अंतर्यामी भगवान देते हैं । शुभ करो तो हिम्मत बढ़ाते हैं, आनंद देते हैं; अशुभ करो तो हृदय की धड़कनें बढ़ाते हैं और भीतर-ही-भीतर कुछ लानत बरसाते हैं ।

पृथ्वी पर शोषक राजा बढ़ गये, प्रजा त्राहिमाम् पुकारने लगी । दूध, दही, मक्खन, घी पैदा करनेवाले ग्वाल-गोपियाँ और जनसाधारण अपनी मेहनत-मजदूरी के बावजूद भी उन्हें नहीं खा-पी पाते थे, कंस के पहलवानों को देना पड़ता था । अति शोषण हो गया तब वह परात्पर ब्रह्म अष्टमी की मध्यरात्रि को कंस के कारागृह में चतुर्भुजी रूप से प्रकट हुआ और चतुर्भुजी को माँ देवकी व पिता वसुदेव ने प्रार्थना की तो द्विभुजी नन्हे बन गये ।

उन नन्हे कृष्ण-कन्हैया को वसुदेवजी टोकरी में लिये जा रहे हैं । यमुनाजी ने देखा, ‘अपनी योगमाया से सर्वव्यापक इतना नन्हा बन गया । सर्व में समाया हुआ और विशेष फिर यहाँ नन्हा-मुन्ना कृष्ण होकर पिता की टोकरी में मुझ यमुना से पसार हुए जा रहा है । ऐसे परात्पर ब्रह्म के चरण छूने का मौका मैं क्यों चुकूँगी !’ यमुनाजी उछल-कूद मचाती हुई वसुदेव की ठोड़ी तक पहुँच गयीं । वसुदेवजी घबराये । वसुदेवजी की घबराहट और यमुना के प्यार को समझनेवाले उस परात्पर ब्रह्म ने अपने पैर का अँगूठा यमुनाजी को छुआ दिया, यमुनाजी का जल घटा और वसुदेवजी पहुँचे यशोदा के घर ।

अपनी योगमाया को वहाँ अवतरित होने का आदेश देनेवाले को वहाँ रखकर योगमाया को टोकरी में ले के आये तो जेल की हथकड़ियाँ फिर लग गयीं । जैसे कृष्ण का अवतार हुआ तो हथकड़ियाँ खुल गयीं और माया का सान्निध्य लिया तो हथकड़ियाँ आ गयीं, यह अवसर संदेशा देता है कि ऐसे ही जब जीवात्मा भगवान के इस मायावी शरीर में, मायावी संसार में सुख खोजता है तो बंधन की हथकड़ियाँ पड़ जाती हैं और जब इसका आकर्षण छोड़कर कृष्णमय सुख खोजता है तो हथकड़ियाँ खुल जाती हैं ।

भगवान का स्वरूप है सत्-चित्-आनंद । सृष्टि का विस्तार सत् अंश से, चित् अंश से ज्ञान का प्रचार-प्रसार, विस्तार व धर्म की रक्षा होती है लेकिन आनंद अंश को विस्तृत होने के लिए भगवान की रासलीला चाहिए । आनंद के बिना जीव चुप नहीं बैठेगा । क्रिया से नृत्य और ध्वनि से गीत उत्पन्न होता है तो क्रिया और ध्वनि के मिश्रण से जो रासलीला हुई वह भगवान के आनंदस्वभाव को प्रकटाती है ।

रसो वै सः । इस रासलीला को शास्त्रीय भाषा में भगवान का रस-स्वभाव उद्दीपन करने की लीला भी कहते हैं । रासलीला को नाट्यशास्त्र में हल्लीशक नृत्य कहा है । हल्लीशक नृत्य अर्थात् बीच में नट तो एक हो और इर्द-गिर्द नटियाँ अनेक हों और नट इतनी स्फूर्ति से नृत्य करे कि हर नटी महसूस करे कि नट मेरे साथ ही नृत्य कर रहा है और मेरी ओर ही देख रहा है ।

इस रासलीला के तीन पहलू हैं - पहला, एक नट और सैकड़ों नटियाँ, एक साक्षी चैतन्य और सैकड़ों-सैकड़ों वृत्तियाँ । दूसरा, दो गोपियों के बीच नट हो और दोनों गोपियों के कंधे पर नटराज के हाथ, दोनों को कृष्ण अपने लगते हैं । फिर इतना अपनत्व भाव में आ जाते हैं कि वे गोपियाँ महसूस करती हैं ‘कृष्ण हमारे हैं ।’ प्रत्येक गोपी के साथ कृष्ण प्रतीत होते हैं अर्थात् साधना की ऐसी अवस्था होती है कि हजारों-लाखों वृत्तियों को देखनेवाला एक, फिर दो वृत्तियों के बीच द्रष्टा एक, फिर सब वृत्तियों के साथ द्रष्टा का चैतन्य-आनंदस्वरूप एकाकार हो रहा है (यह एकाकार होना रासलीला का तीसरा पहलू है) ।

श्रीकृष्ण की लीला सूक्ष्म तत्त्व समझाने के लिए, अपने आनंदस्वरूप को पाने के लिए है ।

कृष्ण खेल रहे हैं । गेंद यमुनाजी में गिर गयी । कृष्ण गेंद लेने कूदे यमुना में । यमुना के गहरे जल में कृष्ण चले जा रहे हैं । वहाँ पहुँचे जहाँ कालिय नाग रहता था और १०१ उसके फन थे । ऐसे ही तुम्हारे हृदयरूपी यमुना के गहरे-गहरे में सौ-सौ विकारी गहरी वासनाओं के फन हैं । कृष्ण ने ॐ की ध्वनि सुनाती हुई बंसी बजायी । उस ध्वनि के नाद से वह सर्प मदोन्मत्त हो गया । वह अपना जहरीला स्वभाव भूलकर मानो बेहोश-सा हो गया । श्रीकृष्ण ने उसके एक-एक फन को अपने पैरों की एड़ी दे मारी और नृत्य किया । बंसी बजती जा रही है, एड़ियाँ ठुकती जा रही हैं, फन छिन्न-भिन्न होते जा रहे हैं और धीरे-धीरे वह कालिय नाग वश हुए जा रहा है ।

आश्चर्य यह था कि फन टूट रहे हैं फिर दूसरे बन रहे हैं लेकिन श्रीकृष्ण निराश नहीं होते हैं । वे ॐकार की ध्वनि गुंजाते जाते हैं । ऐसे ही साधक को भी सौ-सौ विकृत वृत्तियों के फन तोड़ते जाना है, फिर वृत्तियाँ उठेंगी तो साधक अपनी साधना का, मंत्र का आश्रय लेता जाय और उन वृत्तियों को दबोचता जाय, खुश रहता जाय तथा मनोमय उत्साह उभारता जाय तो कालिय नागरूपी आसुरी वृत्तियाँ और अहं वश हो जायेगा ।

कालिय नाग वश हुआ, मुख्य फन को श्रीकृष्ण ने नाथ दिया, ऐसे ही मुख्य विकारी वृत्ति को जो नाथ देता है, और फन भी उसके अधीन हो जाते हैं । कालिय नाग अधीन हुआ तो उसकी पत्नियाँ भी दासियाँ बन गयीं अर्थात् मुख्य वृत्ति को ज्ञानरूपी साधन से नाथ दो तो और वृत्तियाँ नथने लगती हैं, फिर गौण वृत्तियाँ भी नथने लगती हैं । जैसे श्रीकृष्ण कालिय को नाथने में सफल हुए, ऐसे ही साधक अंतःकरण की गहराई में जाय, जपरूपी बंसी बजाता रहे और मुख्य दोष को नाथ ले, फिर अन्य दोषों को नाथे तो अवांतर दोष नथ जायेंगे और निर्दोष नारायण का आनंदस्वभाव प्रकट हो जायेगा ।


हजार एकादशी का फल देनेवाला व्रत

हजार एकादशी का फल देनेवाला व्रत

जन्माष्टमी के दिन किया हुआ जप अनंत गुना फल देता है । उसमें भी जन्माष्टमी की पूरी रात जागरण करके जप-ध्यान का विशेष महत्त्व है भविष्य पुराण’ में लिखा है कि जन्माष्टमी का व्रत अकाल मृत्यु नहीं होने देता है । जो जन्माष्टमी का व्रत करते हैं, उनके घर में गर्भपात नहीं होता ।’

एकादशी का व्रत हजारों-लाखों पाप नष्ट करनेवाला अद्भुत ईश्वरीय वरदान है लेकिन एक जन्माष्टमी का व्रत हजार एकादशी व्रत रखने के पुण्य की बराबरी का है । एकादशी के दिन जो संयम होता है उससे ज्यादा संयम जन्माष्टमी को होना चाहिए । बाजारू वस्तु तो वैसे भी साधक के लिए विष है लेकिन जन्माष्टमी के दिन तो चटोरापन, चाय, नाश्ता या इधर-उधर का कचरा अपने मुख में न डालें । इस दिन तो उपवास का आत्मिक अमृत पान करें । अन्न, जल तो रोज खाते-पीते रहते हैं, अब परमात्मा का रस ही पियें । अपने अहं को खाकर समाप्त कर दें ।


 


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Jap Significance

On the holy eve of Janmastami, Sri Krishna himself incarnated on Night at 12. Janmastami Night , is one of the Mahaaraatris when doing Japa, Dhyan is uncountable times beneficial than on a normal day. Keeping fast on Janmastami is more than thousand times beneficial than Ekadashi fast. A person, who, on this day, worships Lord Krishna washes away his sins, either great or small, or performed in childhood, youth, or maturity, in seven births.
 

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* एक जन्माष्टमी का व्रत एक हजार एकादशी के बराबर है ।

* भारतवर्ष में रहनेवाला जो प्राणी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत करता है, वह सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण)

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