त्रिबंध प्राणायाम के लाभ
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त्रिबंध प्राणायाम के लाभ

स्वास्थ्य-लाभ के साथ मिले दीर्घायुष्य

प्राणायाम से आध्यात्मिक लाभ तो होते ही हैं, साथ ही ये शरीर को स्वस्थ रखते हुए दीर्घायुष्य भी प्रदान करते हैं । पूज्य बापूजी कहते हैं : ‘‘प्राणायाम से प्राणों का ताल अगर ठीक हो जाय तो शरीर के वात-पित्त-कफ नियंत्रित हो जाते हैं । फिर बाहर की दवाइयों और ‘मेग्नेट थेरेपी’ आदि की जरूरत नहीं पड़ती है । इंजेक्शन की सूइयाँ भोंकवाने की भी जरूरत नहीं पड़ती है । केवल अपने प्राणों की गति को ठीक से समझ लो तो काफी झंझटों से छुट्टी हो जायेगी ।

मन, प्राण और शरीर - इन तीनों की आपस में एकतानता है । प्राण चंचल होते हैं तो मन चंचल बनता है । मन चंचल होता है तो तन भी चंचल रहता है । तन चंचल बनने से मन और प्राण भी चंचल हो जाते हैं । इन तीनों में से एक में भी गड़बड़ होती है तो बाकी दोनों में भी गड़बड़ हो जाती है ।

बच्चे के प्राण तालबद्ध चलते हैं व मन में कोई आकांक्षा, वासना, चिंता, तनाव नहीं हैं इसलिए खुशहाल रहता है । जब बड़ा होता है, इच्छा-वासना पनपती है तो अशांत-सा हो जाता है ।

अब हमें करना क्या है ? प्राणायाम आदि से अथवा प्राण को निहारने के अभ्यास आदि साधनों से अपने शरीर में विद्युत-तत्त्व बढ़ाना है ताकि शरीर निरोग रहे । प्राणों को तालबद्ध करने से मन एकाग्र बनता है । एकाग्र मन समाधि का प्रसाद पाता है । पुराने जमाने में 80-80 हजार वर्ष तक समाधि में रहनेवाले लोग थे ऐसा वर्णन शास्त्रों में पाया जाता है । लेकिन 80 हजार वर्ष कोई नींद में नहीं रह सकता ।

मन व प्राणों को थोड़ा नियंत्रित करें तो हम समाधि के जगत में प्रवेश कर सकते हैं । हमारे प्राण नियंत्रित होंगे तो शरीर में विद्युतशक्ति बनी रहेगी ।

त्रिबंध प्राणायाम के लाभ

त्रिबंध करके प्राणायाम करने से विकारी जीवन सहज भाव से निर्विकारिता में प्रवेश करने लगता है । मूलबंध से विकारों पर विजय पाने का सामर्थ्य आता है । उड्डीयान बंध से व्यक्ति उन्नति में विलक्षण उड़ान ले सकता है । जालंधर बंध से बुद्धि विकसित होती है । कोई व्यक्ति योगविद्या के अनुभवी महापुरुष के सान्निध्य में त्रिबंध के साथ प्रतिदिन 12 प्राणायाम करे तो प्रत्याहार सिद्ध होने लगेगा । 12 प्रत्याहार सिद्ध होने से धारणा सिद्ध होने लगेगी । धारणाशक्ति बढ़ते ही प्रकृति के रहस्य खुलने लगेंगे, स्वभाव की मिठास, बुद्धि की विलक्षणता, स्वास्थ्य का सौरभ आने लगेगा । 12 धारणा सिद्ध होने पर ध्यान लगेगा । 12 गुना ध्यान सिद्ध होने पर सविकल्प समाधि होने लगेगी । सविकल्प समाधि का 12 गुना समय पकने पर निर्विकल्प समाधि लगेगी ।

इस प्रकार 6 महीने अभ्यास करनेवाला साधक सिद्धयोगी बन सकता है । ऋद्धि-सिद्धियाँ उसके आगे हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं । यक्ष, गंधर्व, किन्नर उसकी सेवा के लिए उत्सुक होते हैं । उस पवित्र पुरुष के निकट संसारी लोग मनौती मानकर अपनी मनोकामना पूर्ण कर सकते हैं ।

महाविजेता होने की कुंजी

प्राणस्पंदननिरोधश्च - प्राणों के स्पंदन का निरोध करना । हमारी दस इन्द्रियाँ हैं । उनका स्वामी मन है और मन का स्वामी प्राण है । प्राणायाम में बड़ी शक्ति है । अगर प्रतिदिन नियमित प्राणायाम किये जायें तो आदमी को जल्दी से रोग नहीं होगा । संसार के सब कार्य करते समय, संसार की सब सुविधाएँ भोगने पर भी जो लाभ नहीं हुआ है, प्राणायाम की सिद्धि से उससे अनंत गुना लाभ हो सकता है ।

प्राणों का निरोध करने से मनोजय होता है, चित्त के प्रसाद की प्राप्ति होती है । जितना जिसका प्राण निरुद्ध है, जितना जिसने प्राण को रोका है या प्राण-निरोध की विधि को जानता है उतना वह समय के अनुसार बाजी मार लेगा । निद्रा में आपके शरीर को आराम मिलता है और प्राणायाम करके जब आप समाधि में जाते हैं तो आपको स्वयं को आराम मिलता है । आप राम के वास्तविक तत्त्व में पहुँच जाते हैं तो फिर विकारों का वहाँ प्रभाव नहीं जमता । तो प्राणायाम तुम्हारे जीवन में बहुत-बहुत योग्यता बढ़ाता है ।

प्राणायाम आदि से चित्त निरुद्ध होता है । फिर देव की पूजा बाहर करने का परिश्रम नहीं पड़ता और देव को खोजने की भी जरूरत नहीं पड़ती है ।’’

बुद्धिबल बढ़ाने का अचूक उपाय

बुद्धि बढ़ाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते, क्या-क्या दवाइयाँ व टॉनिक नहीं खाते परंतु लाभ नहीं होता । पूज्य बापूजी सनातन संस्कृति के अनमोल खजाने से अचूक युक्ति बता रहे हैं : ‘‘बुद्धिबल बढ़ाने के लिए ‘यजुर्वेद’ (32.14) में एक मंत्र आता है :

यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते ।

तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा।।

‘हे मेधावी परमात्मा ! जिस मेधा-बुद्धि की प्रार्थना, उपासना और याचना हमारे देवगण, ऋषिगण तथा पितृगण सर्वदा से करते चले आये हैं, वही मेधा, वही बुद्धि हमें प्रदान कीजिये ।’

ऐसी प्रार्थना कर पहली उँगली (तर्जनी) अँगूठे के नीचे और तीन उँगलियाँ सीधी करके पालथी मारकर बैठ जाओ । ॐकार का गुंजन करो । ललाट पर तिलक करने की जगह पर थोड़ी देर अनामिका उँगली घिसो । वहाँ ॐकार या भगवान को निहारने की भावना करो । बायें नथुने से गहरा श्वास लो, भीतर रोककर भगवन्नाम का सुमिरन करो और दायें नथुने से श्वास छोड़ दो । अब दायें से गहरा श्वास लो, थोड़ा रोके रखो और जप करो : हरि ॐ... हरि ॐ... शांति... ‘जो पाप-ताप हर ले वह मेरा हरि है । ॐ’ मतलब अखिल ब्रह्मांड का समर्थ प्रभु ! उसमें मेरी बुद्धि शांत होकर सर्वगुण-सम्पन्न होगी । हे प्रभु ! हमारी बुद्धि ऋषि, मुनि, पितर, देव जैसा चाहते हैं वैसी बने । हरि ॐ... हरि ॐ... हरि ॐ...’ मन में ऐसा चिंतन करो । बायें नथुने से श्वास बाहर निकाल दो । ऐसे एक-दो प्राणायाम और करो । फिर थोड़ा समय शांत बैठे रहो ।’’   

 

*Ref: RP289-JAN2017

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