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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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Admin
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कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

पूज्य श्री - सुरेशानंदजी प्रश्नोत्तरी

पूज्य बापूजी - ये सब कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा
अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है।   

श्री सुरेशानंदजी - 1 अनुभव नहीं, कई प्रकार के अनुभव साधकों को होते है ।  सांसारिक इच्छायें जो पहले इतना
सताती थी, आकर्षित करती थी, वो नहीं होती है। समता बढ़ रही है ।  गीता में जो बताया – नेहाभिक्रम नाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥ —श्रीमद्भगवद्गीता २/४० समता रूपी धर्म का थोड़ा सा भी पालन किया जाये, स्वल्पमप्यस्य भगवान कहते हैं, तो त्रायते महतो भयात, तो
महान भय से रक्षा हो जाती है।  साधकों के दिल में वो भी समता का सद्गुण भी बढ़ रहा है, विकार कम हो रहे है,
नाम जप में रस आता है,अच्छा लगता है और आँखों से प्रेम भक्ति के आंसू बहते है, वो तो जब बापूजी पधारे और
जब बापूजी ने हम सब साधकों के लिए दिल का जो भाव , बापूजी ने कहा न हम शब्दों में नहीं वर्णन कर सकते, तब
मैं तो नीचे बैठा था, पर मेरा दिल कहता है की यहाँ बैठे हजारों सत्संगियों की आँखे गीली हो गयी थी।  हृदय भाव से
भर आया था । 
पूज्य बापूजी - चलो ये बात तो ठीक है हम खंडन नही करते, शास्त्रीय बात है। लेकिन हम अब ठीक जगे है, ईश्वर के
रस्ते ठीक चल रहे है, उसका प्रमाण है - 
जाने जीव तब जागा, हरी पद रूचि विषय विलास विरागा । 
तो ये आपका उत्तर और शास्त्र बिलकुल मेल की बात ।  
आप अपना हृदय के साक्षी हो।  विषय विलास विकार में जो पहले रस आता था वो अगर उससे जायदा आता है या
वैसा ही आता है तो आप अध्यात्मिकता में  आगे नहीं हो। विकारी सुख फिक्का पड़ रहा है।  सत्संग, सेव, साधन का
सुख हृदय में जगमगाने लगा है तो समझो आप ऊँचाई के रस्ते पर हो ।
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