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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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Admin

जगत है ही नहीँ, उसका अनुभव आत्मा को होता है या अहंकार को होता है ?

साधक :जगत है ही नहीँ, उसका अनुभव आत्मा को होता है या अहंकार को होता है ?
    
    पूज्य बापूजी : जगत है भी, जैसे सपना दिख रहा है उस समय सपना है ; ये जगत नहीँ है ऐसा नहीँ लगता । जब सपने में से उठते हैं तब लगता है कि सपने की जगत नहीँ हैं । ऐसे ही अपने आत्मदेव में ठीक से जगते हैं तो ,फिर जगत की सत्यता नहीँ दिखती ; तो बोले जगत नहीँ हैं । तो जगत नहीँ हैं,ऐसे बोलने से तो कोई     गरम चिमटा लगा दे  ,उस समय तो दुःख होगा,लेकिन दुःख होता है तो जो,जिसको दुःख होता है वो भी वास्तव में नहीँ हैं, सदा नहीँ हैं । तो जो सदा हैं उसमें स्थिति करके समझाने के लिए बोला जाता है जगत नहीँ हैं ।
    
   तो वह  एक होती है व्यावहारिक सत्ता ,दुशरी होती  है प्रातिभासिक सत्ता और तीसरी होती है वास्तविक सत्ता । जैसे आप-हम अभी बैठे हैं ये व्यावहारिक सत्ता है  । अब जगत नहीँ हैं तो बापूजी क्यों बोलते हो ! सत्संग में क्या सार है ,नहीँ कैसे हैं ? तो वास्तविक सत्ता में जगत है । दुशरा प्रातिभासिक ; जैसे सपने में दिखा तो उस समय सच्चा लगा लेकिन आँख खुली तो, और तीसरा है वास्तविक सत्ता । इस समय भी वास्तविक सत्ता चैतन्य आत्मा की है । सपने में भी वास्तविक सत्ता चैतन्य आत्मा की है और ये दोनों नहीँ हैं ,फिर भी जो वास्तविक सत्ता है,उसमे टिक्के बोलो तो जगत है नहीँ  । न सपना है,न जागृत है ,न गहरी नींद है ; तीनों आ आ के चले जाते हैं ,फिर भी जो रहता है वह  सचिदानंद है, जगत है ही नहीँ । तो अपनी अपनी नजरियां से वह  नही हैं और अपनी अपनी नजरिया  से वह  है । ठीक है !!
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