संन्यास एवं गुरुदेव के सान्निध्य में

संन्यास एवं गुरुदेव के सान्निध्य में

जब कुलगुरु श्री रतन भगत ने नश्वर देह का त्याग कर दिया तब उनकी गद्दी पर उनके शिष्य टौंरमल को बैठाया गया। थोड़े समय के पश्चात् वे भी संसार से अलविदा हो गये तब शिष्यों ने लीलारामजी को गद्दी पर बिठाया।

नन्हें-से लीलारामजी गद्दी पर तो बैठे किन्तु उनका मन वहाँ नहीं लगता था। उनके भीतर तो निरंतर यही विचारधारा चलती थी कि 'दान देने के कारण कम हुई वस्तुओं की भरपाई करने वाला वह कौन है, जो मेरी लाज रखता था?' उन्होंने निर्णय किया कि 'जिसने मेरी लाज रखी, जिसने खाली गोदाम को भरा, मैं उस परमात्मा का साक्षात्कार करके ही रहूँगा। नहीं तो मेरा जीवन व्यर्थ है।' उनकी अन्तरात्मा जागृत हो उठी। 

संसार के नश्वर पद एवं संबंधों को त्यागने का दृढ़ निश्चय करके वे अपनी चाची के पास आकर कहने लगेः
"माँ मैं परमात्मा की खोज करके उन्हें पाना चाहता हूँ। मुझे आज्ञा दीजिए।"

चाची को यह बात सुनकर बड़ा आघात लगा। घर में एक ही कुलदीपक है और वह भी साधु बनना चाहता है ! उन्होंने बात टालने का काफी प्रयास किया किंतु श्री लीलारामजी तो दृढ़निश्चयी थे। उनके मन पर चाची के रोने-गिड़गिड़ाने का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। 

आखिरकार चाची ने एक वचन लिया कि 'अंत समय में मेरी अर्थी को कंधा जरूर देना।' कंधा देने का वचन देकर श्री लीलारामजी तो अपना परम लक्ष्य पाने के लिए घर छोड़कर निकल पड़े। जिसके हृदय में तीव्र वैराग्य हिलोरें मारता हो उसे जगत में कौन सकता है?

श्री लीलारामजी ने जब देखा कि उनके संबंधी उन्हें दुनिया के नश्वर बंधन  में बाँधना चाहते हैं तब उन्होंने अपने बहनोई के आगे स्पष्ट शब्दों में कह दियाः
 "मैं पूरी जिंदगी ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करूँगा एवं संन्यासी बन कर ही रहूँगा।"

श्री लीलारामजी का वैराग्य सीमा लाँघ गया। उन्होंने लोकलाज छोड़कर संसारियों का साधारण वेश उतार दिया एवं पाँच-छः आने वाला खादी का कपड़ा लेकर, उसमें से चोगा बनवाकर, उसे पहनकर संन्यास ग्रहण कर लिया। उस समय श्री लीलारामजी की उम्र मात्र 12 वर्ष की थी।

फिर श्री लीलारामजी टंडोमुहमदखान छोड़कर टंडोजानमुहमदखान में आ गये। यहीं वेदान्ती, ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मश्रोत्रिय संत श्री केशवानंद जी रहते थे। सिंध के कई जिज्ञासु ज्ञान पाने के लिए उनके पास आते थे।

श्री लीलारामजी जब छोटे थे तब टंडेबाग में स्वामी श्री केशवानंद जी के दर्शन करके खूब प्रभावित हुए थे। अतः अपनी आध्यात्मिक भूख मिटाने के लिए सदगुरुदेव स्वामी श्री केशवानंद जी के श्री चरणों में श्री लीलारामजी खूब श्रद्धापूर्वक समर्पित हो गये।
  
क्रमशः
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 ✒गुरुपूर्णिमा विशेष प्रश्नोत्तरी❓ 
 प्रश्न ५)  श्री लीलारामजी ने कितने वर्ष की उम्र में सन्यास लिया और उनके सद्गुरुदेव का नाम क्या था ?

A. 14 वर्ष व स्वामी दयानंद
B. 12 वर्ष व स्वामी अखण्डानन्द
C. 12 वर्ष व स्वामी केशवानन्द
D. 14 वर्ष व स्वामी परमानंद

 कल का उत्तर - उपरोक्त सभी सही हैं।
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