खाना खाने और खिलाना वाला एक ही है

खाना खाने और खिलाना वाला एक ही है

श्री लीलारामजी का जन्म जिस गाँव में हुआ था, वह महराब चांडाई नामक गाँव बहुत छोटा था। उस जमाने में दुकान में बेचने के लिए सामान टंगेबाग से लाना पड़ता था। भाई लखुमल वस्तुओं की सूची एवं पैसे देकर श्री लीलारामजी को खरीदी करने के लिए भेजते थे।

एक समय की बात हैः उस वर्ष मारवाड़ एवं थर में बड़ा अकाल पड़ा था। लखुमल ने पैसे देकर श्री लीलारामजी को दुकान के लिए खरीदी करने को भेजा। श्री लीलारामजी खरीदी करके, माल-सामान की दो बैलगाड़ियाँ भरकर अपने गाँव लौट रहे थे। गाड़ियों में आटा, दाल, चावल, गुड़, घी आदि था। रास्ते में एक जगह पर गरीब, पीड़ित, अनाथ एवं भूखे लोगों ने श्री लीलाराम जी को घेर लिया। दुर्बल एवं भूख से व्याकुल लोग जब अनाज के लिए गिड़गिड़ाने लगे तब श्री लीलारामजी का हृदय पिघल उठा। वे सोचने लगे। 'इस माल को मैं भाई की दुकान पर ले जाऊँगा। वहाँ से खरीदकर भी मनुष्य ही खायेंगे न....! ये सब भी तो मनुष्य ही हैं। बाकी बची पैसे के लेन-देन की बात...  तो प्रभु के नाम पर भले ये लोग ही खा लें।'

श्री लीलारामजी ने बैलगाड़ियाँ खड़ी करवायीं और उन क्षुधापीड़ित लोगों से कहाः "यह रहा सब सामान। तुम लोग इसमें से भोजन बना कर खा लो।"
भूख से कुलबुलाते लोगों ने तो दोनों बैलगाड़ियों को तुरंत ही खाली कर दिया। श्री
लीलारामजी भय से काँपते, थरथराते गाँव में पहुँचे। खाली बोरों को गोदाम में रख दिया। कुँजियाँ लखुमल को दे दीं। 

लखुमल ने पूछाः "माल लाया?"
"हाँ।"
"कहाँ है?"
"गोदाम में।"
"अच्छा बेटा ! जा, तू थक गया होगा। सामान का हिसाब कल देख लेंगे।"

दूसरे दिन श्री लीलारामजी दुकान पर गये ही नहीं। उन्हें तो पता था कि गोदाम में क्या माल रखा है। वे घबराये, काँपने लगे। उनको काँपते हुए देखकर लखुमल ने कहाः "अरे ! तुझे बुखार आ गया? आज घर पर आराम ही कर।"

एक दिन.... दो दिन.... तीन दिन..... श्री लीलारामजी बुखार के बहाने दिन बिता रहे हैं और भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं-
"हे भगवान ! अब तो तू ही जान। मैं कुछ नहीं जानता। हे करन-करावनहार स्वामी ! तू ही सब कराता है। तूने ही भूखे लोगों को खिलाने की प्रेरणा दी। अब सब तेरे ही हाथ में है, प्रभु ! तू मेरी लाज रखना। मैं कुछ नहीं, तू ही सब कुछ है...."

एक दिन शाम को लखुमल अचानक श्री लीलारामजी के पास आये और बोलेः
''लीला.... लीला ! तू कितना अच्छा माल लेकर आया है !"
श्री लीलारामजी घबराये। काँप उठे कि 'अच्छा माल.... अच्छा माल कहकर अभी लखुमल मेरे कान पकड़कर मारेंगे। वे हाथ जोड़कर बोलेः
"मेरे से गल्ती हो गयी।"
"नहीं बेटा ! गलती नहीं हुई। मुझे लगता था कि व्यापारी तुझे कहीं ठग न लें। ज्यादा कीमत पर घटिया माल न पकड़ा दें। किन्तु सभी चीजें बढ़िया हैं। पैसे तो नहीं खूटे न?"
"नहीं, पैसे तो पूरे हो गये और माल भी पूरा हो गया।"

"माल किस तरह पूरा हो गया?"

श्री लीलाराम जी जवाब देने में घबराने लगे तो लखुमल ने कहाः "नहीं बेटा ! सब ठीक है। चल, तुझे बताऊँ।"
ऐसा कहकर लखुमल श्री लीलारामजी का हाथ पकड़कर गोदाम में ले गये। श्री लीलारामजी ने वहाँ जाकर देखा तो सभी खाली बोरे माल-सामान से भरे हुए मिले ! उनका हृदय भावविभोर हो उठा और गदगद होते हुए उन्होंने परमात्मा को धन्यवाद दियाः

'प्रभु ! तू कितना दयालु है.... कितना कृपालु है !'

श्री लीलारामजी ने तुरंत ही निश्चय कियाः 'जिस परमात्मा ने मेरी लाज रखी है.... गोदाम में बाहर से ताला होने पर भी भीतर के खाली बोरों को भर देने की जिसमें शक्ति है, अब मैं उसी परमात्मा को खोजूँगा..... उसके अस्तित्व को जानूँगा.... उसी प्यारे को अब अपने हृदय में प्रगट करूँगा।
              क्रमशः
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