बचपन में ही दैवी गुण से सम्पन्न

बचपन में ही दैवी गुण से सम्पन्न

श्री लीलारामजी का बाल्यकाल सिंधु नदी के तट पर ही खिला था। वे मित्रों के साथ कई बार सिंधु नदी में नहाने जाते।

नन्हीं उम्र से ही उन्होंने अपनी निडरता एवं दृढ़ मनोबल का परिचय देना शुरु कर दिया था। जब वे नदी में नहाने जाते तब अपने साथ पके हुए आम ले जाते एवं स्नान के बाद सभी मिलकर आम खाने के लिए बैठ जाते।

उस समय श्री लीलारामजी की अदभुत प्रतिभा के दर्शन होते थे। बच्चे एक-दूसरे के साथ शर्त लगाते कि 'पानी में लंबे समय तक डुबकी कौन मार सकता है?' साथ में आये हुए सभी बच्चे हारकर पानी से बाहर निकल आते किन्तु श्री लीलारामजी पानी में ही रहकर अपने मजबूत फेफड़ों एवं हिम्मत का प्रमाण देते।

श्री लीलारामजी जब काफी देर तक पानी से बाहर न आते तब उनके साथी घबरा जाते लेकिन श्री लीलारामजी तो एकाग्रता एवं मस्ती के साथ पानी में डुबकी लगाये हुए बैठे रहते।

श्री लीलारामजी जब पानी से बाहर आते तब उनके साथी पूछतेः "लीलाराम ! तुम्हें क्या हुआ?"

श्री लीलारामजी सहजता से उत्तर देते हुए कहतेः

"मुझे कुछ भी नहीं हुआ। तुम लोगों को घर जाना हो तो जाओ। मैं तो यही बैठता हूँ।"

श्री लीलारामजी पद्मासन लगाकर स्थिर हो जाते। बाल्यकाल से श्री लीलारामजी ने चंचल मन को वश में रखने की कला को हस्तगत कर लिया था। उनके लिए एकाग्रता का अभ्यास सरल था एवं इन्द्रिय-संयम स्वाभाविक। निर्भयता एवं अंतर्मुखता के दैवी गुण उनमें बचपन से ही दृष्टिगोचर होते थे।

              क्रमशः
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✒गुरुपूर्णिमा विशेष प्रश्नोत्तरी❓

श्री लीलारामजी के बचपन मै से ही कौन से दो दैवी गुण दृष्टिगोचर होते थे ?

A.  निर्भयता एवं अंतर्मुखता    B.  निर्भयता एवं अहंकारिता   C.  एकाग्रता एवं चपलता    D.  इन्द्रिय-संयम  एवं बहिर्मुखता

 कल का उत्तर -दादी माँ

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 🔖जो भी प्रतिदिन पूछे जाने वाली प्रश्नोत्तरी का ज्यादा से ज्यादा सही जवाब देंगे उन्हें पुरस्कार दिया जाएगा। 
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