जिस कर ने  झुलाया पालना

जिस कर ने झुलाया पालना

आज हम इस सत्संग-मंडप में, इतनी विशाल संख्या में भगवदज्ञान की महिमा को सुन पा रहे हैं इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है एक वृद्धा माँ जी के पास... और वे माँ जी भी कैसी? अँगूठाछाप। वे वृद्धा माँ जी थीं मेरे प्यारे गुरुदेव स्वामी श्री लीलाशाह जी महाराज की दादी माँ। 

दादी माँ बहुत वृद्ध थीं। आँखों से बराबर दिखता भी नहीं था और जर्जर शरीर के कारण घर का काम भी अच्छे से नहीं हो सकता था। इसलिए बहुओं की झिड़कियाँ हमेशा सुननी पड़ती थीं। बहुएँ कहतीं- "यह बुढ़िया कुछ करती नहीं है। सारा दिन खों-खों करती रहती है..." इस प्रकार का बहुत कुछ वे सुनाती रहतीं।

दादी माँ शरीर की जर्जरित अवस्था में करती भी क्या? फिर भी उन्होंने जो किया, उसका फल हम सब अभी चख रहे हैं। दादी माँ भले
अनपढ़ थीं परन्तु उनकी समझ सूक्ष्म थी। अपने नन्हें-से पौत्र को गोदी में लेकर बैठी होतीं अथवा उन्हें पालना झुला रही होती तो कहतीं-
 "बेटा ! ये सब जो अपमान करते हैं वे मेरा अपमान नहीं करते। वे तो इस देह का अपमान करते हैं, इस चोले का अपमान करते हैं। मैं तो इस देह से परे हूँ। मान-अपमान तो मन के खेल है। राग-द्वेष सब बुद्धि में हैं। भूख-प्यास तो प्राणों का धर्म है। मैं सदा चैतन्यस्वरूप हूँ। मैं सदा साक्षी, नित्य मुक्त आत्मा हूँ। जो मुझे नहीं पहचानते वे मेरा अपमान कैसे कर सकते हैं। बेटा ! तू भी ऐसा ज्ञान समझ लेना, पचा लेना.... तो तू भी मान-अपमान से पार हो जायेगा। तू अपने शुद्ध चैतन्य तत्त्व में स्थिर हो जाना। मान-अपमान का असर दो लोगों को नहीं होता। एक ज्ञानी को दूसरा मूढ़ को। बीच में रहने वाले सभी परेशान होते रहते हैं। बेटा ! तेरा जन्म ऐसे तुच्छ भावों में बहने के लिए नहीं हुआ। जो मुझे नहीं पहचानते वे मेरा अपमान कैसे कर सकते हैं?" 

ऐसे उच्चतम विचारों से दादी माँ बालक लीलाराम के संस्कारों को दृढ़ करती रहती थीं। आज के संसार में तो..... "मेरा बेटा डॉक्टर बनेगा.... खूब पैसे कमायेगा... बंगला बनायेगा.... और गाड़ी चलायेगा...' ऐसे भौतिक सम्पत्ति के संस्कारों से बालक का सिंचन करते हैं, पालन-पोषण करते हैं।

बालक लीलाराम पर उन वृद्धा दादी माँ के संकल्पों एवं संस्कारों ने ऐसा शक्तिशाली काम किया कि बारह वर्ष की कोमल वय में ही वे गृहत्याग करके परम तत्त्व की खोज में निकल पड़े और उन्हीं होनहार बालक के परम तत्त्व के ज्ञान का प्रसाद आज आपके और मेरे हृदय को पावन कर रहा है।

क्रमशः
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✒गुरुपूर्णिमा विशेष प्रश्नोत्तरी❓
प्रश्न ३ : बालक लीलाराम बारह वर्ष की कोमल वय में ही गृहत्याग करके परम तत्व की खोज में निकल पड़े । ये किनके संकल्पों व संस्कारों का प्रभाव था ।

A. माताजी    B. पिताजी
C. चाची माँ    D. दादी माँ
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