कैसे छोटे-से बालक ने जप और ध्यान करके अपनी मुत्यु को टाल दिया
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कैसे छोटे-से बालक ने जप और ध्यान करके अपनी मुत्यु को टाल दिया

आज हम जानेंगे : कैसे छोटे-से बालक ने जप और ध्यान करके अपनी मुत्यु को टाल दिया ?

सौ यज्ञों से भी अधिक पुण्य पंचाक्षर मंत्र का जप करते हुए शिवमूर्ति-पूजन करने से होता है लेकिन शिवलिंग का ॐकार मंत्र से पूजन उससे भी अधिक पुण्यदायी है और अंतरात्मा शिव का एकांत में चिंतन करके ध्यानमग्न होना तो जीव को ऐसी ऊँची दशा देता है कि परम  आनंदस्वरूप आत्मा में उसकी स्थिति होने लगती है । 

गृहपति नामक एक बालक, जिसकी उम्र 9 साल थी,उसकी माता शुचिष्मती और पिता मुनि विश्वानर थे । देवर्षि नारदजी ने हस्तरेखा देखकर चिंता व्यक्त की कि ‘‘12वें वर्ष में इसके ऊपर बिजली अथवा अग्नि द्वारा विघ्न आयेगा । ज्यों लड़का दस साल का हुआ त्यों माँ-बाप चिंतित होने लगे । 

बुद्धिमान बालक गृहपति ने कहा : ‘‘मैं अपने पिता और माता को चिंतित देखूँ यह मुझे अच्छा नहीं लगता । आपको ऐसा कौन-सा दुःख है जो आप दुःखी हो रहे हो ? क्या देवर्षि नारदजी की वार्ता आपको याद है ? लेकिन हे सर्वतीर्थयी माता ! तुम्हारी चरणरज और हे सर्वदेवमय पिताश्री ! आपका आशीर्वाद मेरे साथ है तो मृत्यु मेरा क्या बिगड़ेगी ! मैं मृत्यु से पहले ही महामृत्युंजय शिवजी को प्रसन्न कर लूँगा । 

11वाँ वर्ष शुरू हुआ तो माता-पिता का आशीर्वाद लेकर वह काशीपुरी के लिए चल पड़ा । वहाँ ‘ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जप करता और ध्यान करता । वैखरी का जप मध्यमा में, मध्यमा का जप पश्यंती में और पश्यंती
iसे परा में पहुँचा हुआ जप परम सामर्थ्य,परम सुख-सिद्धि का मूल है। प्रकृति के नियमों से पार करने में समर्थ है । केवल मंत्र जपने से सामान्य लाभ होता है । 12वाँ वर्ष शुरू हुआ । अब मौत की घड़ियाँ आनेवाली हैं । 

तभी एकाएक वज्रधारी इन्द्र प्रकट हुए और बोले : ‘‘विप्रवर ! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ । कुछ वरदान माँग लो । 

बालक :‘‘मेरे तो इष्टदेव शिव हैं,मैं उन्हीं से माँगूँगा । 

इन्द्र : ‘‘आत्मा तो एक ही है । जब मैं देता हूँ तो फिर ‘शिवजी से माँगूँगा..ऐसा हठ क्यों करता है ? हठ छोड़,माँग ले । 

‘‘नहीं, निष्ठा एक में ही होनी चाहिए ।

 ‘‘तू बच्चा है, अक्ल का कच्चा है।वरदान माँग ले।"

 ‘‘तुम्हारे वरदान से मुझे क्या मिलेगा ? तुम तो सती अहिल्या का सतीत्व तोड़ने वाले पर्वत-शत्रु हो,यह मैंने कथाओं में सुना है । तुम्हारे वरदान में और शिवजी के वरदान में काफी फासला है । इन्द्र ने अपना उग्र रूप दिखाया,मानो अंगारे उड़ेल रही हैं उनकी आँखें और वज्र से भी आग की ज्वालाएँ निकलने लगीं । बालक गृहपति डरकर बेहोश हो गया । बेहोश तो हो गया लेकिन होश और बेहोशी को जाननेवाले अंतरात्मा शिव में वह शांत हुआ । 

थोड़ी देर में भगवान शिवजी प्रकट हुए । सिर पर हाथ रखकर बोले : ‘‘गृहपति ! बेटा !! तू इन्द्र के क्रुद्ध रूप को देखकर डर गया । तू डर मत । तेरी परीक्षा लेने को मैं ही इन्द्र बनकर आया था । अब काल तेरा क्या बिगड़ेगा ! तू तो आदरणीय हो जायेगा,पूजनीय हो जायेगा । शिवरात्रि का व्रत करनेवाले,शिवस्वरूप आत्मा में विश्रांति पानेवाले और माता-पिता व गुरु का आदर करनेवाले को कौन-सा काल मार सकता है ! जो कभी न मरे उस अकाल आत्मा में तेरी स्थिति हो,ऐसा मैं तुम्हें वरदान देता हूँ ।

शिवजी को समाधि में क्या आनंद आता है ! वे आत्मशिव में ही स्थित रहते हैं । तुम भी इस आत्मशिव में आ जाओ । शिवजी बहुत प्रसन्न होते हैं ।  

 ✍🏻सीख : हमें किसी भी परिस्थिति से दुःखी नहीं होना चाहिए । गुरु और भगवान पर निष्ठा ही हमें हर परिस्थिति से लड़ने की शक्ति देती है । हर परिस्थिति में सहारा देनेवाले गुरु के मार्गदर्शन पर चलके अपने ऊँचे लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए ।

📚बाल संस्कार पाठ्यक्रम मार्च - २०१९
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