ऐसा सम्मान नहीं चाहिए जो विद्यार्थीपना ही छीन ले
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ऐसा सम्मान नहीं चाहिए जो विद्यार्थीपना ही छीन ले

आज हम जानेंगे : न्यायमूर्ति रानडे को बंगला भाषा सीखने की आवश्यकता हुई तो उन्होंने क्या किया..?


न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानडे को जब बंगाली भाषा सीखने की आवश्यकता पड़ी तो समय अभाव के कारण और अध्यापक ढूँढने की कठिनाई से बचने हेतु उन्होंने एक बंगलाभाषी नाई से हजामत बनवाने की व्यवस्था की।

जितनी देर नाई उनकी हजामत करता,उतनी देर वे उससे बंगाली भाषा सीखते थे।
      उनकी धर्मपत्नी को पता चला तो कहा : आप न्यायाधीश होकर इस प्रकार अनपढ़ नाई से पढ़ें यह आपके सम्मान के विरुद्ध बात है।"
       
रानडे हँसते हुए बोले :"ज्ञान तो किसी से भी लिया जा सकता है। अवधूत दत्तात्रेयजी ने 24 गुरु बनाए थे,जिनमें कीड़े-मकोड़े और पशु-पक्षी भी थे,फिर मुझे नाई से कुछ सीखने में संकोच क्यों होना चाहिए और मुझे ऐसा सम्मान नहीं चाहिए जो मेरा विद्यार्थीपन ही मुझसे छीन ली ।"

✍🏻वास्तव में जितना बड़ा,जितना महान ज्ञान पाना हो उतना ही अधिक अहंरहित होना आवश्यक होता है। विद्याओं में शिरोमणि व ज्ञानों में परम ज्ञान ब्रह्मज्ञान पाना हो तो तब तो पूरा ही अहं समर्पित किया जाता है।

✒महादेव रानडे को नाई से बंगला भाषा सीखने में संकोच नहीं हुआ इससे उनके किस गुण का पता चलता है ?
(निराभिमानता)

🙌🏻हम भी कभी किसी बात का अंहकार नहीं करेंगे।

📚लोक कल्याण सेतु/मार्च २०१७
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