तू सूर्य की नार्इं बन
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तू सूर्य की नार्इं बन

उत्तरायण अर्थात्‌ सूर्य का उत्तर दिशा की ओर प्रयाण।
जैसे मकर संक्रांति से सूर्य उत्तर दिशा की तरफ प्रयाण करता है, वैसे ही आपका
जीवन भी उन्नति की ओर अग्रसर होता जाय । ऋषि कहते हैं : ‘तुम सूर्य की नार्इं बनो।'

 कोई प्रश्न करता है कि ‘महाराज ! सूर्य तो करीब ४६० करोड़ 
 वर्ष पुराना है और पृथ्वी से करीब १५ करोड़ कि.मी. दूर रहता है । हम 
 उसके समान कैसे बन सकते हैं ? अगर बनें तो सूर्य कैसा है ? 

हाइड्रोजन और हीलियम गैसों का गोला, उसके आगे बड़े-बड़े भयानक बम भी कुछ नहीं हैं इतना गर्म है वह और ऋषि कहते हैं : सूर्य की नाईं बन !’ लेकिन ऋषि के इस वचन के पीछे बड़ा गहरा आशय छिपा हुआ है।

ऋषि के कहने का भावार्थ यह है कि ‘जैसे सूर्य अपने व्रत पर अडिग रहता है वैसे ही हे मनुष्य ! तू अपने व्रत पर अडिग रह । तू अपनी मनुष्यता बनाये रख। तू अपनी मनुष्यता से गिर मत । अगर तू मनुष्यता से ऊपर उठ जाय, योगसिद्ध हो जाय, समता के सिंहासन पर बैठ जाय तो और ऊँची बात है । लेकिन कम-से-कम मनुष्यता से कभी गिरना मत ।’
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