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Ten factors that build your nature
Ashram India

Ten factors that build your nature

दशहरे के दस विजयसूत्र 

श्रीमद् भागवत’ के ग्यारहवें स्कंध के तेरहवें अध्याय के चौथे श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण उद्धवजी को बोलते हैं:

आगमोऽपः प्रजा देशः कालः कर्म च जन्म च ।

ध्यानं मन्त्रोऽथ संस्कारो दशैते गुणहेतवः ।।

‘शास्त्र, जल, प्रजाजन, देश, समय, कर्म, जन्म, ध्यान, मंत्र और संस्कार - ये दस वस्तुएँ यदि सात्त्विक हों तो सत्त्वगुण की, राजसिक हों तो रजोगुण की और तामसिक हों तो तमोगुण की वृद्धि करती हैं ।’

अपना जीवन अगर महान बनाना है तो इन 10 बातों का ध्यान रखो :

(1) शास्त्र : आप क्या पढ़ते हैं ? शारीरिक सुखसंबंधी ज्ञान देनेवाला साहित्य, उपन्यास या विकारोत्तेजक कहानियाँ पढ़कर अपनी कमनसीबी बढ़ाते हैं कि जीवन में उदारता, सहिष्णुता, प्राणिमात्र के प्रति सद्भाव, ब्रह्मचर्य, निर्लोभता आदि दैवी सद्गुणों को अपनाने की प्रेरणा देनेवाले गीता, रामायण, वेदांत शास्त्र पढ़ते हैं ? ऐसा ही पठन करना चाहिए जिससे आपमें संयम-सदाचार, स्नेह, पवित्रता, निरभिमानिता आदि दैवी गुणों का विकास हो, संत और भगवंत के प्रति आदर-मान की भावना जगे ।

(2) जल : आप क्या खाते-पीते हो ? कहीं आप ऐसी चीज तो नहीं खाते-पीते हो जिससे बुद्धि विनष्ट हो जाय और आपको उन्माद-प्रमाद में घसीट ले जाय ? इस बात पर भी ध्यान रखें कि जिस जल से स्नान करते हो वह पवित्र तो है न !

खान-पान का ध्यान रखने से आपमें स्वाभाविक ही सत्त्वगुण का उदय हो जायेगा । आप दुर्गुणों से मुक्त होकर सरलता और शीघ्रता से दैवी सम्पदा की वृद्धि कर पाओगे ।

(3) प्रजाजन : आपका संग कैसा है ? मनुष्य जैसे लोगों के बीच में उठता-बैठता है, मन में जैसा बनने की इच्छा रखता है, उसीके अनुरूप उसके जीवन का निर्माण होता है । जिसे भगवद्-तत्त्व का साक्षात्कार करना हो उसे तत्त्वज्ञानी महापुरुषों का संग करना चाहिए ।

(4) देश : आप कैसे स्थान में रहते हो ? पवित्र, उन्नत स्थान में रहोगे तो आपके आचार-विचार शुद्ध और उन्नत बनेंगे । मलिन, आसुरी स्थानों में रहोगे तो आसुरी विचार और विकार आपको पकड़े रहेंगे । देहाध्यास (देह को ‘मैं’ मानना)

के कूड़े-कचरे पर बैठोगे तो मान-अपमान,निंदा-स्तुति, सुख-दुःख आदि द्वन्द्व आप पर प्रभाव डालते रहेंगे और भगवत्स्मरण, ब्रह्मभाव के विचारों में रहोगे तो शांति-लाभ और दिव्य आनंद पाओगे ।

(5) समय : आप अपना समय कैसे व्यतीत करते हो ? कहीं जुआ-शराबघर में, सिनेमा-टीवी देखने में या विषय-विलास के चिंतन में तो नहीं ? अखबारों में ज्यादा समय तो नष्ट नहीं करते ? बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता । अतः जीवन का एक-एक क्षण भगवत्प्राप्ति में लगाओ, प्रमाद मत करो ।

(6) कर्म : आप किस प्रकार के कर्म करते हैं ? गंदे संस्कार भरकर कर्मबंधन बनानेवाले और नरकों में ले जानेवाले कर्म करते हैं कि अच्छे संस्कार भर के कर्मबंधन काटकर भगवान में विश्रांति दें ऐसे कर्म करते हैं ?

(7) जन्म : जन्मों-जन्मों के आपके संस्कार और शिक्षा-दीक्षा कैसी है ? उससे भी स्वभाव बनता है ।

(8) ध्यान : आप अपने चित्त में चिंतन-ध्यान किसका करते हैं ? यदि काम का चिंतन करोगे तो दूसरे जन्म में वेश्या के घर पहुँच जाओगे, मांसाहार का चिंतन करोगे तो गिद्ध या शेर आदि मांसाहारी प्राणियों की योनि में पहुँच जाओगे, किसीसे बदला लेने का चिंतन करोगे या ज्यादा द्वेष रखोगे तो साँप, बिच्छू, ततैया आदि योनियों में पहुँच जाओगे । अतः सावधान होकर अपने चिंतन-ध्यान को भगवन्मय बनाओ ।

अपने दोषों और दुर्गुणों पर, अपने मन में चलनेवाली पाप-चिंतन की धारा पर कभी दया नहीं करनी चाहिए । अपने दोषों को क्षमा न करके प्रायश्चित रूप में अपने-आपको कुछ दंड अवश्य देना चाहिए । दुबारा उस दोष को न दुहराना सबसे बड़ा दंड और प्रायश्चित है । प्रतिदिन रात्रि को सोने से पहले हिसाब लगाना चाहिए कि अशुभ चिंतन कितना कम हुआ और शुभ चिंतन कितना बढ़ा । सुबह उठते ही, जहाँ से उठे उस शुद्ध, बुद्ध, द्रष्टा, साक्षी, आनंदघन में कुछ समय डूबे रहो । ॐ आनंद... ॐ शांति... ॐ... यह सुबह की कुछ मिनटों की परमात्म-विश्रांति, घंटोंभर की दिन की साधना जितना आनंद-लाभ दे देगी । फिर परमात्मा या सद्गुरुदेव का चिंतन-ध्यान करके दिनभर के लिए शुद्ध संकल्प करना चाहिए कि ‘आज नम्रता, प्रेम, परगुण-दर्शन आदि दैवी गुणों के विकास के साथ प्रभु के नाम-गुण का ही चिंतन करूँगा ।’

  (9) मंत्र : मंत्र देनेवाले आपके गुरु कैसे हैं और मंत्र कैसा है ? टोने-टोटके का मंत्र है कि वैदिक मंत्र है और मंत्र देनेवाले गुरु परमात्मप्रीतिवाले हैं कि ऐसे-वैसे हैं ? समर्थ सद्गुरु से मंत्र लेना चाहिए ।

(10) संस्कार : आपके संस्कार कैसे हैं ? अच्छे संस्कार धारण करने का व्रत ले लो । किसीमें हजार बुराइयाँ हों, फिर भी उसमें से भी गुण ले लो एवं ‘गुणों के आधार, गुणनिधान प्रभु मेरे हैं, मैं भगवान का हूँ’- ऐसा चिंतन करने से आप उस नित्य ज्ञान में टिकने में तत्पर हो जायेंगे, आपका मंगल हो जायेगा !

यदि आपके जीवन में ये दस बातें आ गयीं तो आप अपने जीवन संग्राम में आनेवाले हर रावण को नष्ट कर देंगे, प्रत्येक दिन दशहरा होगा और परमात्म-ज्ञान की प्राप्ति सहज, सुलभ हो जायेगी ।

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Ten factors that build your nature   

In the verse four, chapter thirteen, and section eleven of ‘Srimad Bhagvat’ Lord Krishna relates to Uddhavaji:     

आगमोऽपः प्रजा देशः कालः कर्म च जन्म च ।

ध्यानं मन्त्रोऽथ संस्कारो दशैते गुणहेतवः ।।

“According to the quality of the religious scriptures, water, the people one associates with, the particular place, the time, activities, birth, meditation, chanting of mantras and purificatory rites the modes of nature become differently prominent.” When these ten things are Sattvik, Rajasik or Tamasik the individual becomes Sattvik, Rajasik or Tamasik in nature.

Pay attention to these ten things if you want to be great.

(1) Religious scriptures: What do you read? Do you add to invite your misfortune by reading the books on physical pleasures, erotic novels and racy stories or the religious scriptures like Gita, Ramayana, and books on Vedanta which inspire to cultivate virtues like generosity, forbearance, compassion towards all creatures, celibacy, non-covetousness, etc. in your life? You should read only such books that help you cultivate divine virtues like self-restraint, righteous conduct, love, purity, modesty, etc. and increase your veneration and respect for saints and God.

(2) Water: What do you eat and drink? Do you eat anything which may corrupt your intelligence and drag you to intoxication and negligence? Try and look out that even water used for taking bath should be pure and unsullied. A little care & concern towards the intake of food will naturally make Sattva Guna prominent in your nature. You will become free from vices and increase the qualities of divine nature easily and quickly in your life.

(3) Association: How is your company? A man moulds his life according to the type of his companions and the desire he cherishes to become. He who wants to attain Truth-
realization should live in company of Self-realized, Tattva-jnani great men.

(4) Place: How is your dwelling place? If you reside in a pious and spiritually elevated place, your thoughts as well as your conduct will become pure and sublime. And if you reside in dirty and ominous place your mind will remain preoccupied with demonic thoughts and passions. If you will sit upon the garbage of ‘I am the body’ idea, you will be influenced by pairs of opposites like honor and insult, praise and censure, pleasure and pain; and if you will remember God being preoccupied with “I am Brahman’ idea you will get peace and divine bliss.

(5) Time: How do you spend your time? Is your time spent in a bar or a casino, in watching TV shows and movies or in sexual fancies and carnal thoughts? Do you waste much time in reading News papers? Time and tide stops for none. So make use of every moment of your life for the
pursuit of attaining God. Don’t be negligent.

(6) Activities: What are your activities? Do you indulge in wicked activities that increase your bondage by filling your mind with evil tendencies which pave your way to hells? Are your engaged in activities that fill your mind with good traits which cut your bondage and lead you to repose in God?

(7) Birth: Mode of your nature is also determined by the traits inherited by you from learning and mantra initiation in previous lives.

(8) Meditation: What is the object of your meditation and reflection? If you will think of lust you will become a prostitute in the next life; if you will think of meat eating, then you will become a carnivorous bird like vulture or animal like lion. If you will think of seeking to revenge or bear
hostility to someone you will become a snake, a scorpion or a wasp in the next life. So always and ever be vigilant and make your meditation and reflection divine.

One should never be lenient to or compromise with one’s vices and evil tendencies. Instead of forgiving one’s mistakes one should inflict some punishment to oneself as an act of atonement. Not to repeat a mistake is the highest form of atonement and punishment. Before going to sleep one should take an account of how much good thinking was increased and the evil thinking lessened today. When you get up in the morning get absorbed in the source from which the ego arises. That is Pure, Consciousness, witness, Seer, dense Bliss. Om Bliss, Om Peace, Om. Get absorbed for some time. This repose in Supreme Self for a few minutes will give more rewards and bliss than sadhana done for hours in the day. Then reflect and meditate on Sadgurudev or Supreme Self. Then make a pure resolve, “Today I will think of divine name and qualities of God, and cultivate divine virtues like humility, affection, seeing virtues of others etc.

(9) Mantra: What type of Mantra you have received from what type of Guru? Is it a Vedic mantra or a mantra of black magic? Whether the ‘Guru’ is absolutely devoted to Supreme Self or any ordinary mystic? One should receive mantra from a Self-realized Sadguru.

(10) Purificatory rites: How are your purificatory rites that determine your Samskaras? Take a vow to inculcate noble Samskaras. Learn virtues even from a person having a thousand vices. And the source of all virtues is my Lord. God is mine and I am God’s. Such sublime thinking will make you intent on getting stabilized in the Eternal Knowledge and get blessed.

If you’re able to cultivate these ten things in your life you’ll be able to annihilate every ‘Ravana’ who may attack you in the battle of your life. Every day will become a Dussehra Day and you will
attain the Supreme Knowledge easily and spontaneously.

 

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