सूर्यदेव की विशेष प्रसन्नता हेतु मंत्र
ब्रम्हज्ञान सबसे पहले भगवान सूर्य को मिला था | उनके बाद रजा मनु को, यमराज को…. ऐसी परम्परा चली | भास्कर आत्मज्ञानी हैं, पक्के ब्रम्ह्वेत्ता हैं | बड़े निष्कलंक व निष्काम हैं | कर्तव्यनिष्ठ होने में और निष्कामता में भगवान सूर्य की बराबरी कौन कर सकता है ! कुछ भी लेना नहीं, न किसीसे राग है न द्वेष हैं | अपनी सत्ता-समानता में प्रकाश बरसाते रहते हैं, देते रहते हैं |
‘पद्म पुराण’ में सूर्यदेवता का मूल मंत्र है : 

" ॐ ह्रां ह्रीं सः सूर्याय नमः "

Om hraam hreem saha suryaay namah !!

One should pray Surya God on this day to eliminate personal evils/shortcomings and to preserve brahmacharya.

अगर इस सूर्य मंत्र का ‘आत्मप्रीति व आत्मानंद की प्राप्ति हो’ – इस हेतु से भगवान भास्कर का प्रीतिपूर्वक चिंतन करते हुए जप करते हैं तो खूब प्रभु-प्यार बढेगा, आनंद बढेगा |

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सूर्य की आराधना-उपासना का पर्व मकर सक्रान्ति

(मकर सक्रान्ति, उत्तरायणः 14 व 15 जनवरी)
भारतीय संस्कृति में दैनिक सूर्य-पूजा का नियम प्राचीन काल से चला आ रहा है। श्रीरामजी द्वारा नित्य सूर्य पूजा का उल्लेख रामकथा में आता है। श्रीरामजी सूर्यवंशी थे।
सूर्यदेव मकर सक्रान्ति को प्रतिवर्ष धनु राशि का भ्रमण पूर्ण कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस दिन से देवों का ब्राह्ममुहूर्त एवं उपासना का पुण्यकाल प्रारम्भ हो जाता है। इस काल को ही परा-अपरा विद्या की प्राप्ति का काल कहा जाता है। इसे साधना का सिद्धिकाल भी कहा गया है। मकर सक्रान्ति का आध्यात्मिक तात्पर्य है जीवन में सम्यक क्रान्ति। इस दिन अपने चित्त को विषय विकारों से हटाकर निर्विकारी नारायण में लगाने का शुभ संकल्प करना चाहिए। देह को 'मैं' और संसार को मेरा मानने की गल्ती छोड़कर आत्मा को 'मैं' और ब्रह्माण्डव्यापी परमात्मा को अपना मानने की सम्यक क्रान्ति करनी चाहिए। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि विकारों के संग से अपने-आपको बचाने के लिए आर्तभाव से भगवान को प्रार्थना करें और प्रेमभाव से भगवान का चिंतन करें। विकारों में सत्यबुद्धि न करें। फिसल गये हों तो भी सत्युबुद्धि नहीं और बच गये हो तो भी सत्यबुद्धि नहीं करें। अपने सत्यस्वरूप में, साक्षी चैतन्य स्वभाव में सत्यबुद्धि करें। इसके लिए सत्संग और जीवन्मुक्त महापुरुषों का संग बहुत ही आवश्यक है। जीवन्मुक्त महापुरुष ही हमारी क्रांति को सही दिशा तथा उचित मार्गदर्शन दे सकते हैं।
मकर-सक्रान्ति के दिन ही कपिल मुनि के आश्रम पर माँ-गंगा का पदार्पण हुआ था। भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही माघ शुक्ल अष्टमी के दिन स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था। उनका श्राद्ध भी सूर्य की उत्तरायण गति में हुआ था।
मकर सक्रान्ति के दिन दान का विशेष माहात्म्य है। 'पद्म पुराण' के अनुसार 'अयन-परिवर्तन (उत्तरायण-दक्षिणायन) के दिन, विषुव नामक योग आने पर, चन्द्र और सूर्य के ग्रहण में तथा सक्रान्ति के अवसरों पर दिया हुआ दान अक्षय होता है।' इस दिन गरीबों को यथायोग्य अन्नदान करें। सत्साहित्य का दान भी कर सकते हैं और कुछ नहीं तो भगवन्नाम-जप का प्याऊ लगाकर वातावरण को पावन जरूर करना चाहिए। और इन सबसे अच्छा है कि काम – क्रोधादि अपने सब विकारों तथा अपने अहं को भगवान के, सदगुरू के श्रीचरणों में अर्पित कर दिया तो फिर उनका मार्गदर्शन, शक्ति-सम्प्रेषण व परम हितकारी अनुशासन आपको जन्म-मरण के चक्कर से छुटकारा दिला देगा।
सहस्रांशु की सहस्र किरणों के पृथक-पृथक प्रभाव हैं। सूर्य की पहली किरण जहाँ आसुरी सम्पत्तिमूलक भौतिकी उन्नति की विधेयक है, वहीं सूर्य की सातवीं किरण भारतवर्ष में दैवी सम्पत्तिमूलक आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा देने वाली है। सातवीं किरण का प्रभाव भारत में गंगा-यमुना के मध्य अधिक समय तक रहता है। इस भौगोलिक स्थिति के कारण ही हरिद्वार और प्रयाग में माघ मेला अर्थात् मकर सक्रान्ति का विशेष उत्सव आयोजित होता है। तत्त्वदर्शी महर्षियों ने पर्व व व्रत-विज्ञान की विशेष महिमा बतायी है। उनके अनुसार व्रतों के प्रभाव से प्राणी का अंतःकरण शुद्ध होता है, संकल्पशक्ति बढ़ती है तथा ज्ञानतंतु विकसित होते हैं। अंतस्तल में सच्चिदानंद परमात्मा के प्रति श्रद्धा एवं भक्तिभाव का संचार होता है। मकर सक्रान्ति आत्मचेतना को विकसित करने वाला व्रत-पर्व है।
व्रत की विधिः प्रातः काल तिल का उबटन लगाकर तिलमिश्रित जल से स्नान करें। स्नान के पश्चात अपने आराध्य-देव की पूजा-अर्चना करें। ताँबे के लोटे में रक्तचंदन कुमकुम, लाल रंग के फूल तथा जल डालकर पूर्वाभिमुख होकर सूर्य-गायत्री मंत्र सके तीन बार सूर्य भगवान को जल दें और सात बार अपने ही स्थान पर परिक्रमा करें। सूर्य गायत्री –
ॐ आदित्याय विदमहे भास्कराय धीमहि।
तन्नो भानुः प्रचोदयात्।
फिर गायत्री मंत्र तथा 'आदित्यहृदय स्तोत्र' का पाठ करें। पक्षियों को अनाज व गाय को घास, तिल, गुड़ आदि खिलायें।
'पद्म पुराण' के अनुसार 'जो मनुष्य पवित्र होकर भगवान सूर्य के आदित्य, भास्कर, सूर्य, अर्क, भानु, दिवाकर, सुवर्णरेता, मित्र, पूषा, त्वष्टा, स्वयम्भू और तिमिराश – इन 12 नामों का पाठ करता है, वह सब पापों और रोगों से मुक्त होकर परम गति को पाता है।'
आज से तिल-तिल दिन बढ़ने लगते हैं, अतः इसे 'तिल सक्रान्ति' के रूप में भी मनाया जाता है। 'विष्णु धर्मसूत्र' कहा गया है कि पितरों के आत्मा की शांति, स्वयं के स्वास्थ्यवर्धन व सर्वकल्याण के लिए तिल के छः प्रयोग पुण्यदायक एवं फलदायक होते हैं – तिल जल स्नान, तिल दान, तिल भोजन, तिल जल अर्पण, तिल-आहुति तथा तिल-उबटन मर्दन। किंतु ध्यान रखें कि सूर्यास्त के बाद तिल व तिल के तेल से बनी वस्तुएँ खाना वर्जित है।
यह पावन पर्व पारस्परिक स्नेह और मधुरता की वृद्धि का महोत्सव है, इसलिए इस दिन लोग एक-दूसरे को स्नेह के प्रतीक तिल और मधुरता का प्रतीक गुड़ देते हैं।
इस मकर सक्रान्ति पर्व पर हम यह संकल्प लें कि 'आज से हम आपसी मतभेद व वैमनस्य को भुलाकर सत्शास्त्रों व सदगुरूओं के ज्ञान को आत्मसात् करेंगे और उनके बताये हुए मार्ग पर चलकर शाश्वत सुख, शाश्वत आनंद को पायेंगे।'
स्रोतः लोक कल्याण सेतु, दिसम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 3,4,5 अंक 162
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शिशिर ऋतु में विशेष लाभदायीः तिल



(शिशिर ऋतुः )
शिशिर ऋतु में वातावरण में शीतलता व रूक्षता बढ़ जाती है। आगे आने वाली वसंत व ग्रीष्म ऋतुओं में यह रूक्षता क्रमशः तीव्र व तीव्रतम हो जाती है। यह सूर्य के उत्तरायण का काल है इसमें शरीर का बल धीरे धीरे घटता जाता है।
तिल अपनी स्निग्धता से शरीर के सभी अवयवों को मुलायम रखता है, शरीर को गर्मी  बल प्रदान करता है। अतः भारतीय संस्कृति में उत्तरायण के पर्व पर तिल के सेवन का विधान है।
तिल सभी अंग-प्रत्यंगों विशेषतः अस्थि, संधि, त्वचा, केश व दाँतों को मजबूत बनाता है। यह मेध्य अर्थात बुद्धिवर्धक भी है। सफेद, लाल  काले तिल इन तीन प्रकार के तिलों में काले तिल वीर्यवर्धक व सर्वोत्तम हैं। सभी प्रकार के तेलों में काले तिल का तेल श्रेष्ठ है। यह उत्तम वायुशामक है। इससे की गयी मालिश मजबूती व स्फूर्ति लाती है। शिशिर ऋतु में मालिश विशेष लाभदायी है।
तिल में कैल्शियम व विटामिन 'ए' प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। बादाम की अपेक्षा तिल में छः गुना से भी अधिक कैल्शियम है। यह हड्डियों को मजबूत बनाता है। तिल के छिलकों में निहित ऑक्जेलिक एसिड इस कैल्शियम के अवशोषण (absorption) में बाधा उत्पन्न करता है। अतः छिलके हटाकर तिल का उपयोग करने से लाभ अधिक होते हैं। तिल को रात भर दूध में भिगोकर सुबह रगड़ने से छिलके उतर जाते हैं। फिर धोकर छाया में सुखाकर रखें। इसे आयुर्वेद ने 'लुंचित तिल' कहा है। लुंचित तिल पचने में हलके होते हैं, अधिक गर्मी भी नहीं करते।
श्रेष्ठ आयुर्वेदाचार्यों श्री चरक, वाग्भट, चक्रदत्त आदि के द्वारा निर्दिष्ट तिल के प्रयोगः
काले तिल चबाकर खाने व शीतल जल पीने से शरीर की पर्याप्त पुष्टि हो जाती है। दाँत मृत्युपर्यन्त दृढ़ बने रहते हैं।
एक भाग सोंठ चूर्ण में दस भाग तिल का चूर्ण मिलाकर 5 से 10 ग्राम मिश्रण सुबह शाम लेने से जोड़ों के दर्द में राहत मिलती है।
तिल का तेल पीने से अति स्थूल (मोटे) व्यक्तियों का वजन घटने लगता है व कृश (पतले) व्यक्तियों का वजन बढ़ने लगता है। यह कार्य तेल के द्वारा सप्तधातुओं के प्राकृत निर्माण से होता है।
तैलपान विधिः सुबह 20 से 50 मि.ली. गुनगुना तेल पीकर,गुनगुना पानी पियें। बाद में जब तक खुलकर भूख न लगे तब तक कुछ न खायें।
अत्यन्त प्यास लगती हो तो तिल की खली को सिरके में पीसकर समग्र शरीर पर लेप करें।
वार्धक्यजन्य हड्डियों की कमजोरी  उससे होने वाले दर्द में दर्दवाले स्थान पर 15 मिनट तक तिल के तेल की धारा करें।
पैर में फटने या सूई चुभने जैसी पीड़ा हो तो तिल के तेल से मालिश कर रात को गर्म पानी से सेंक करें।
पेट मे वायु के कारण दर्द हो रहा हो तो तिल को पीसकर, गोला बनाकर पेट पर घुमायें।
वातजनित रोगों में तिल में पुराना गुड़ मिलाकर खायें।
एक भाग गोखरू चूर्ण में दस भाग तिल का चूर्ण मिलाके 5 से 10 ग्राम मिश्रण बकरी के दूध में उबाल कर, मिश्री मिला के पीने से षढंता∕नपुंसकता (Impotency) नष्ट होती है।
काले तिल के चूर्ण में मक्खन मिलाकर खाने से रक्तार्श (खूनी बवासीर) नष्ट हो जाती है।
तिल की मात्राः 10 से 25 ग्राम।
विशेषः देश, काल, ऋतु, प्रकृति, आयु आदि के अनुसार मात्रा बदलती है। उष्ण प्रकृति के व्यक्ति, गर्भिणी स्त्रियाँ तिल का सेवन अल्प मात्रा में करें। अधिक मासिक-स्राव में तिल न खायें।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2011, पृष्ठ संख्या 29, अंक 217
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उत्तरायण के दिन जपने योग्य मन्त्र

आदित्यहृदय स्तोत्र

Aditya Hriday Stotra ka 3 baar paath karne se Vighna-badha karne walon ko, aarop lagane walon ko safalta nahin milti
-Pujya Bapuji's Message 11th DEC '09

संक्रांति के दिन यदि रविवार हो तो उसका नाम ह्रदयवार होता है | वह आदित्य के ह्रदय को अत्यंत प्रिय है | उस दिन नक्तव्रत करके मंदिर में सूर्यनारायण के अभिमुख एक सौ आठ वार आदित्यहृदय का पाठ करना चाहिये अथवा सायंकाल तक भगवान् सूर्य का ह्रदय में ध्यान करना चाहिये | सूर्यास्त होने के पश्च्यात घर आकर यथाशक्ति ब्राह्मण को भोजन कराये तथा मौनपूर्वक स्वयं भी खीर का भोजन करके सूर्यदेव का स्मरण करते हुए भूमिपर ही शयन करे | इसप्रकार जो इस दिन व्रत रहकर श्रद्धा-भक्तिसे सूर्यनारायण की पूजा करता है, उसके समस्त अभीष्ट सिद्ध हो जाते है और वह भगवान् सूर्य के समान ही तेज-कान्ति तथा यश को प्राप्त करता है |
- भविष्य पुराण, ब्राह्म पर्व

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Pujya Bapuji's Message 11th DEC '09 -  Aditya Hriday Stotra ka 3 baar paath karne se Vighna-badha karne walon ko, aarop lagane walon ko safalta nahin milti
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