सूर्यदेव की विशेष प्रसन्नता हेतु मंत्र
ब्रम्हज्ञान सबसे पहले भगवान सूर्य को मिला था | उनके बाद रजा मनु को, यमराज को…. ऐसी परम्परा चली | भास्कर आत्मज्ञानी हैं, पक्के ब्रम्ह्वेत्ता हैं | बड़े निष्कलंक व निष्काम हैं | कर्तव्यनिष्ठ होने में और निष्कामता में भगवान सूर्य की बराबरी कौन कर सकता है ! कुछ भी लेना नहीं, न किसीसे राग है न द्वेष हैं | अपनी सत्ता-समानता में प्रकाश बरसाते रहते हैं, देते रहते हैं |
‘पद्म पुराण’ में सूर्यदेवता का मूल मंत्र है : 

" ॐ ह्रां ह्रीं सः सूर्याय नमः "

Om hraam hreem saha suryaay namah !!

One should pray Surya God on this day to eliminate personal evils/shortcomings and to preserve brahmacharya.

अगर इस सूर्य मंत्र का ‘आत्मप्रीति व आत्मानंद की प्राप्ति हो’ – इस हेतु से भगवान भास्कर का प्रीतिपूर्वक चिंतन करते हुए जप करते हैं तो खूब प्रभु-प्यार बढेगा, आनंद बढेगा |

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तुम्हारा जीवन-रथ उत्तर की ओर प्रयाण करे - पूज्य बापू जी

छः महीने सूर्य का रथ दक्षिणायण को और छः महीने बीतते हैं तब देवताओं की एक रात होती है एवं मनुष्यों के छः महीने बीतते हैं तो देवताओं का एक दिन होता है। उत्तरायण के दिन देवता लोग भी जागते हैं। हम पर उन देवताओं की कृपा बरसे, इस भाव से भी यह पर्व मनाया जाता है। कहते हैं कि इस दिन यज्ञ में दिये गये द्रव्य को ग्रहण करने के लिए वसुंधरा पर देवता अवतरित होते हैं। इसी प्रकाशमय मार्ग से पुण्यात्मा पुरुष शरीर छोड़कर स्वर्गादिक लोकों में प्रवेश करते हैं। इसलिए यह आलोक का अवसर माना गया है। इस उत्तरायण पर्व का इंतजार करने वाले भीष्म पितामह ने उत्तरायण शुरू होने के बाद ही अपनी देह त्यागना पसंद किया था। विश्व का कोई योद्धा शर-शय्या पर अट्ठावन दिन तो क्या अट्ठावन घंटे भी संकल्प के बल से जी के नहीं दिखा पाया। वह काम भारत के भीष्म पितामह ने करके दिखाया।
धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन दान-पुण्य, जप तथा धार्मिक अनुष्ठानों का अत्यंत महत्त्व है। इस अवसर पर दिया हुआ दान पुनर्जन्म होने पर सौ गुना प्राप्त होता है।
यह प्राकृतिक उत्सव है, प्रकृति से तालमेल कराने वाला उत्सव है। दक्षिण भारत में तमिल वर्ष की शुरूआत इसी दिन से होती है। वहाँ यह पर्व 'थई पोंगल' के नाम से जाना जाता है। सिंधी लोग इस पर्व को 'तिरमौरी' कहते हैं, हिन्दी लोग 'मकर सक्रान्ति'कहते हैं एवं गुजरात में यह पर्व 'उत्तरायण' के नाम से जाना जाता है।
यह दिवस विशेष पुण्य अर्जित करने का दिवस है। इस दिन शिवजी ने अपने साधकों पर, ऋषियों पर विशेष कृपा की थी।
इस दिन भगवान सूर्यनारायण का ध्यान करना चाहिए और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि 'हमें क्रोध से, काम-विकार से, चिंताओँ से मुक्त करके आत्मशांति पाने में, गुरू की कृपा पचाने में मदद करें।' इस दिन सूर्यनारायण के नामों का जप, उन्हें अर्घ्य-अर्पण और विशिष्ट मंत्र के द्वारा उनका स्तवन किया जाय तो सारे अनिष्ट नष्ट हो जायेंगे और वर्ष भर के पुण्यलाभ प्राप्त होंगे।
ॐ ह्रां ह्रीं सः सूर्याय नमः।  इस मंत्र से सूर्यनारायण की वंदना कर लेना, उनका चिंतन करके प्रणाम कर लेना। इससे सूर्यनारायण प्रसन्न होंगे, निरोगता देंगे और अनिष्ट से भी रक्षा करेंगे।
उत्तरायण के दिन भगवान सूर्यनारायण के इन नामों का जप विशेष हितकारी हैः ॐ मित्राय नमः। ॐ रवये नमः। ॐ सूर्याय नमः। ॐ भानवे नमः। ॐ खगाय नमः। ॐ पूष्णे नमः। ॐ हिरण्येगर्भाय नमः। ॐ मरीचये नमः। ॐ आदित्याय नमः। ॐ सवित्रे नमः। ॐ अर्काय नमः। ॐ भास्कराय नमः। ॐ सवितृ सूर्यनारायणाय नमः।
ब्रह्मचर्य से बुद्धिबल बहुत बढ़ता है। जिनको ब्रह्मचर्य रखना हो, संयमी जीवन जीना हो, वे उत्तरायण के दिन भगवान सूर्यनारायण का सुमिरन करें, प्रार्थना करें जिससे ब्रह्मचर्य-व्रत में सफल हों और बुद्धि में बल बढ़े।
ॐ सूर्याय नमः...... ॐ शंकराय नमः..... ॐ गणपतये नमः..... ॐ हनुमते नमः..... ॐ भीष्माय नमः..... ॐ अर्यमायै नमः....
इस दिन किये गये सत्कर्म विशेष फल देते हैं। इस दिन भगवान शिव को तिल-चावल अर्पण करने का अथवा तिल-चावल से अर्घ्य देने का भी विधान । इस पर्व पर तिल का विशेष महत्त्व माना गया है। तिल का उबटन, तिलमिश्रित जल से स्नान, तिलमिश्रित जल का पान, तिल-हवन, तिल-मिश्रित भोजन व तिल-दान, ये सभी पापनाशक प्रयोग हैं। इसलिये इस दिन तिल, गुड़क तथा चीनी मिले लड्डू खाने तथा दान देने का अपार महत्त्व है। तिल के लड्डू खाने से मधुरता एवं स्निग्धता प्राप्त होती है एवं शरीर पुष्ट होता है। शीतकाल में इसका सेवन लाभप्रद है।
यह तो हुआ लौकिक रूप से उत्तरायण अथवा संक्रान्ति मनाना किंतु मकर सक्रांति का आध्यात्मिक तात्पर्य है – जीवन में सम्यक क्रांति। अपने चित्त को विषय-विकारों से हटाकर निर्विकारी नारायण में लगाने का, सम्यक क्रान्ति का संकल्प करने का यह दिन है। अपने जीवन को परमात्म-ध्यान, परमात्म-ज्ञान एवं परमात्मप्राप्ति की ओर ले जाने का संकल्प करने का बढ़िया से बढ़िया जो दिन है वह मकर सक्रान्ति का दिन है।
मानव सदा सुख का प्यासा रहा है। उसे सम्यक् सुख नहीं मिलता तो अपने को असम्यक् सुख में खपा-खपाकर चौरासी लाख योनियों में भटकता रहता है। अतः अपने जीवन में सम्यक् सुख, वास्तविक सुख पाने के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए।
आत्मसुखात् न परं विद्यते।
आत्मज्ञानात् न परं विद्यते।
आत्मलाभात् न परं विद्यते।
वास्तविक सुख क्या है ? आत्मसुख। अतः आत्मसुख पाने के लिए कटिबद्ध होने का दिवस ही है मकर सक्रान्ति। यह पर्व सिखाता है कि हमारे जीवन में भी सम्यक् क्रान्ति आये। हमारा जीवन निर्भयता व प्रेम से परिपूर्ण हो। तिल-गुड़ का आदान-प्रदान परस्पर प्रेमवृद्धि का ही द्योतक है।
सक्रान्ति के दिन दान का विशेष महत्त्व। अतः जितना सम्भव हो सके उतना किसी गरीब को अन्नदान करें। तिल के लड्डू भी दान किये जाते हैं। आज के दिन लोगों में सत्साहित्यक के दान का भी सुअवसर प्राप्त किया जा सकता है। तुम यह न कर सको तो भी कोई हर्ज नहीं किंतु हरिनाम का रस तो जरूर पीना-पिलाना। अच्छे में अच्छा तो परमात्मा है, उसका नाम लेते-लेते यदि अपने अहं को सदगुरु के चरणों में, संतों के चरणों में अर्पित कर दो तो फायदा ही फायदा है और अहंदान से बढ़कर तो कोई दान नहीं। लौकिक दान के साथ अगर अपना आपा ही संतों के चरणों में, सदगुरू के चरणों में दान कर दिया जाय तो फिर चौरासी का चक्कर सदा के लिए मिट जाय।
सक्रांति के दिन सूर्य का रथ उत्तर की ओर प्रयाण करता है। वैसे ही तुम भी इस मकर सक्रान्ति के पर्व पर संकल्प कर लो कि अब हम अपने जीवन को उत्तर की ओर अर्थात् उत्थान की ओर ले जायेंगे। अपने विचारों को उत्थान की तरफ मोड़ेंगे। यदि ऐसा कर सको तो यह दिन तुम्हारे लिए परम मांगलिक दिन हो जायेगा। पहले के जमाने में लोग इस दिन अपने तुच्छ जीवन को बदलकर महान बनने का संकल्प करते थे।
हे साधक ! तू भी संकल्प कर कि 'अपने जीवन में सम्यक् क्रांति – सक्रान्ति लाऊँगा। अपनी तुच्छ, गंदी आदतों को कुचल दूँगा और दिव्य जीवन बिताऊँगा। प्रतिदिन जप-ध्यान करूँगा, स्वाध्याय करूँगा और अपने जीवन को महान बनाकर ही रहूँगा। त्रिबंधसहित ॐकार का गुंजन करते हुए दृढ़ संकल्प और प्रार्थना फलित होती है। प्राणिमात्र के जो परम हितैषी हैं उन परमात्मा की लीला में प्रसन्न रहूँगा। चाहे मान हो चाहे अपमान, चाहे सुख मिले चाहे दुःख किंतु सबके पीछे देने वाले करूणामय हाथों को ही देखूँगा। प्रत्येक परिस्थिति में सम रहकर अपने जीवन को तेजस्वी-ओजस्वी एवं दिव्य बनाने का प्रयास अवश्य करूँगा।'
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2011, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 217
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उत्तरायण के दिन जपने योग्य मन्त्र

आदित्यहृदय स्तोत्र

Aditya Hriday Stotra ka 3 baar paath karne se Vighna-badha karne walon ko, aarop lagane walon ko safalta nahin milti
-Pujya Bapuji's Message 11th DEC '09

संक्रांति के दिन यदि रविवार हो तो उसका नाम ह्रदयवार होता है | वह आदित्य के ह्रदय को अत्यंत प्रिय है | उस दिन नक्तव्रत करके मंदिर में सूर्यनारायण के अभिमुख एक सौ आठ वार आदित्यहृदय का पाठ करना चाहिये अथवा सायंकाल तक भगवान् सूर्य का ह्रदय में ध्यान करना चाहिये | सूर्यास्त होने के पश्च्यात घर आकर यथाशक्ति ब्राह्मण को भोजन कराये तथा मौनपूर्वक स्वयं भी खीर का भोजन करके सूर्यदेव का स्मरण करते हुए भूमिपर ही शयन करे | इसप्रकार जो इस दिन व्रत रहकर श्रद्धा-भक्तिसे सूर्यनारायण की पूजा करता है, उसके समस्त अभीष्ट सिद्ध हो जाते है और वह भगवान् सूर्य के समान ही तेज-कान्ति तथा यश को प्राप्त करता है |
- भविष्य पुराण, ब्राह्म पर्व

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Pujya Bapuji's Message 11th DEC '09 -  Aditya Hriday Stotra ka 3 baar paath karne se Vighna-badha karne walon ko, aarop lagane walon ko safalta nahin milti
Pujya Bapuji's Message 11th DEC '09 -  Aditya Hriday Stotra ka 3 baar paath karne se Vighna-badha karne walon ko, aarop lagane walon ko safalta nahin milti

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Pujya Bapuji's Message 11th DEC '09 -  Aditya Hriday Stotra ka 3 baar paath karne se Vighna-badha karne walon ko, aarop lagane walon ko safalta nahin milti

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