लोक कल्याणकारी वास्तु-विज्ञान

आधुनिक भवन-निर्माण तकनीक मुख्यतः भौतिक सुख-सुविधा का ध्यान रखती है परंतु आंतरिक सुख शान्ति का विचार नहीं करती। प्राचीन भवन-निर्माण तकनीक अथवा वास्तु विज्ञान मस्तिष्क, शरीर व आत्मा के स्थायित्व को ध्यान में रखकर स्वस्थ वातावरण के निर्माण पर जोर देता है। यदि निर्माण वास्तु सिद्धान्तों के अनुकूल न हो तो वहाँ के निवासी और वहाँ कार्यरत लोगों के विचार व कार्य असम्यक व अविवेकपूर्ण होते हैं, जिससे वे अस्वस्थता व अशान्ति को प्राप्त होते हैं। वास्तु विज्ञान में समाहित प्रकृति के नियमों का भली भाँति पालन करने से प्रकृति वहाँ के निवासियों एवं कार्यरत लोगों को संबल प्रदान करती है। अतः आंतरिक सुख-शांति के लिए लोग वास्तुशास्त्र की शैली व सिद्धान्तों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
आजकल नगर व शहरी क्षेत्रों के असीमित विकास, बढ़ती जनसंख्या व आवश्यकताओं के कारण भवनों का निर्माण एक जरूरत हो गया है। अतः इन बहुमंजिला भवनों के निर्माण में आत्मीयता व शांति के सुरम्य वातावरण को उत्पन्न करने एवं बनाये रखने के लिए उचित तकनीक की आवश्यकता है। इसको अनदेखा नहीं किया जा सकता। वर्तमान में की गयी लापरवाही अनचाहे कष्टों, रोगों एवं अर्थहानि का कारण तथा भावी विकास में बाधक हो सकती है, ऐसा अनेक उदाहरणों से सिद्ध हुआ है। किसी गलती को भविष्य में सुधारने की अपेक्षा वर्तमान में ही उसे न करना बुद्धिमानी है। वास्तु नियमों के पालन से प्रकृति हमें संबल प्रदान कर हमारे लक्ष्यों को सरल, व अल्प प्रयास से शीघ्र पूरा कर देती है। आधुनिक आर्किटैक्ट एक वैभवपूर्ण मकान बना सकते हैं परंतु उस मकान में रहने वालों के सुखद जीवन की गारंटी नहीं दे सकते जबकि वास्तु-विज्ञान वास्तु अनुरूप बने मकान के रहवासियों व मालिक के शांति पूर्ण, समृद्धिशाली एवं विकासपूर्ण जीवन की गारंटी देता है।
 
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