वास्तु नियमों का सारांश

पूर्व व उत्तर में अधिक खुली जगह।
पश्चिम व दक्षिण में कम खुली जगह।
पूर्व व उत्तर में ढाल।
ईशान में जल तत्त्व।
अग्नि कोण में रसोई घर व अग्नि तत्त्व।
पश्चिम व दक्षिण में रहने व सोने के कमरे।
नैऋत्य में मुख्य व्यक्ति का निवास।
कमरे से जुड़े शौचालय-अग्नि व वायव्य में बनाये जा सकते हैं परन्तु इससे पूरे कमरे में कोई अमंगलकारी घटाव या बढ़ाव नहीं होना चाहिए।
सीढ़ी-अग्नि या वायव्य में।
ईशान से मुख्य प्रवेश।
अन्य द्वार-मंगलकारी स्थल में।
छत का ढाल पूर्व व उत्तर में।
पूरे भूखण्ड में वजन बटा हुआ परन्तु पश्चिम एवं दक्षिण का हिस्सा पूर्व व उत्तर के हिस्से से भारी व ऊँचा, कमरे में संयुक्त जुड़ा हुआ लेट्रिन बाथरूम होना हितकर नहीं है।
 
Previous Article वास्तु सूत्र
Next Article वास्तु संबंधित सामान्य प्रश्न व निराकरण
Print
4846 Rate this article:
4.0
Please login or register to post comments.