श्रेष्ठ साधक कैसे बनें ?
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श्रेष्ठ साधक कैसे बनें ?

मनुष्य आज इतनी-इतनी परेशानियों, समस्याओं और चिंताओं के बोझ से लदा रहता है कि कहाँ सत्संग सुने ?... कब सत्संग को विचारे ?... किस तरह जीवन में उतारे ?... लेकिन बिना सत्संग, जप, अनुष्ठान, सेवा, स्मरण के जीव की सद्गति सम्भव नहीं है । आज ये विचारणीय प्रश्न हैं कि कैसे उसे सांसारिक झंझटों के बीच परमात्म-शांति की अनुभूति हो ? कैसे वह अपने नित्यकर्म में संलग्न रहकर परमात्मा की आराधना से अंतःकरण को पावन करता रहे ?

यह सत्य है कि हम संसार में रहते हैं इसलिए संसार को छोड़ पाना हमारे लिए सम्भव नहीं है किंतु यह भी तो उतना ही वजनदार सत्य है कि हमारा अमूल्य मनुष्य-जन्म संसार में उलझकर गँवाने के लिए तो कतई नहीं हुआ है । न जाने कितनी-कितनी माताओं के शरीर से, पिताओं के शरीर से गुजरकर, असहनीय यातनाओं को सह के हमने यह अनमोल मानव-शरीर पाया है । अपने सच्चे नाथ का साक्षात्कार करने का दुर्लभ अवसर पाया है । ऐसे सुखद संयोग के बाद भी हम लापरवाह रहे तो कैसे चलेगा ? जरा तो सोचिये कि परमात्मा को, गुरु को क्या मुँह दिखायेंगे ! अतः मनुष्य-जन्म की सार्थकता इसीमें है कि हम अपने सच्चे स्वरूप का साक्षात्कार करके जीते-जी मुक्त हो जायें ।

जो परम तत्त्व को उपलब्ध होना चाहते हैं, उनके लिए कुछ युक्तियों से और प्रभु की कृपा से यह सहज हो जायेगा । आप एक श्रेष्ठ, सात्त्विक साधक बननेभर का लक्ष्य बना लें । एक उन्नत, जिज्ञासु साधक बननेभर का संकल्प आपको उस अनुभूति से सम्पदावान बना देगा, जो आपकी अपनी विरासत है । एक श्रेष्ठ साधक में कौन-से गुण होने चाहिए, इस बात को गम्भीरतापूर्वक समझ लें । यदि आप एक श्रेष्ठ साधक बनने का लक्ष्य अपने जीवन में रखते हैं तो आप परम तत्त्व के अधिकारी भी बन सकते हैं क्योंकि शुद्ध, सात्त्विक, श्रद्धासम्पन्न अंतःकरण में परमात्म-माधुर्य और ज्ञान स्फुरित होता है । आप थोड़ा चलेंगे तो ईश्वरीय सत्ता आपकी मदद करेगी, बिल्कुल पक्की बात है । ज्यों-ज्यों आप साधना के पथ पर एक-एक कदम आगे बढ़ाते चलेंगे, त्यों-त्यों आपमें उस आनंदस्वरूप को जानने की उत्सुकता बढ़ती जायेगी । उत्सुकता जब तीव्र होगी, लालसा जोर पकड़ेगी तो फिर आप उस यार (परमात्मा) से कहाँ दूर रह पायेंगे !

सर्वप्रथम परमात्म-सुख पाने का लक्ष्य निर्धारित करें । प्रतिदिन का नियम निश्चित करें । एक बार संकल्प ले लें कि ‘मुझे रोज इतनी मालाएँ करनी हैं । माह में इतने दिन मौन रहना है । इतने महीने में मुझे एक अनुष्ठान करना है । प्रतिदिन इतने समय सत्संग सुनना है । सत्शास्त्रों का मनन-अध्ययन करना है । इतना समय सेवा करनी है और व्यवहारकाल में रहते हुए भी मुझे निरंतर सुमिरन करना है ।’ ऐसे आप अंतर्यामी ईश्वर के साथ अनन्यरूप से जुड़ जायेंगे । आरम्भ में 5 मिनट भगवन्नाम लेना शुरू करो । फिर 6, 7, 8, 11 मिनट का नियम ले लो । ‘मैं जैसा-तैसा हूँ, तुम्हारा हूँ । तुम मेरे अंतरात्मा हो, सर्वव्यापक हो । दूर नहीं, दुर्लभ नहीं, परे नहीं हो, पराये नहीं हो । मेरे अपने हो मेरे प्रभु ! मैं आपको नहीं जानता हूँ लेकिन आप तो मुझे जानते हो । ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ...’

नियम में निष्ठा के साथ-साथ जीवन में निःस्वार्थता, पवित्रता, प्रेम, सात्त्विकता, सेवा जैसे सद्गुणों को भी विकसित होने दें । आप ध्यान रखें कि हजारों जप-तप और यज्ञों के बाद भी यदि आपमें स्वार्थ है, अपने को कुछ मानने का, स्वयं को कर्ता मानने का अभिमान है तो सब व्यर्थ है । स्वार्थ और अहंकार से हृदय मलिन होता है । स्वार्थसिद्धि की आदत आपको सच्चे सुख से वंचित रखती है । पवित्रता से मन में सद्विचारों का प्रादुर्भाव होता है । जब आपका मन विषयों का चिंतन करता है, तब वैसे ही विचारों में आप उलझे रहते हैं । विचारों के माध्यम से आप जितने उन्नत बन सकते हैं, उतने अन्य साधनों से नहीं । विचारों की उन्नति आपकी उन्नति का मूल है । शुभ, प्रेरणास्पद, प्रखर विचारों के जरिये आप उस मंजिल तक पहुँच सकते हैं, जिसे पाने के लिए आपको मनुष्य-तन मिला है ।

प्रेम यानी अपने इष्ट के प्रति श्रद्धा, समर्पण और निष्ठा की पराकाष्ठा । प्रेम संसार के संबंधों से नहीं वरन् संसार के स्वामी से करना है । संसार से तो व्यवहार करना है । इसका अर्थ यह भी नहीं कि हम अपना व्यवहार रूखा बना लें । हमें व्यवहार में भी उतना ही कुशल होना है । मधुर व्यवहार जीवन की माँग है । प्रेम तो वह परम ऊर्जा है जो प्रेमाधीश से भेंट करवा देती है । व्रज में जब ग्वाल-गोपालों के बीच क्रीड़ा होती है तो भगवान भक्तों के प्रेम को बल देने के लिए स्वयं हार के गोप सखाओं को जिता देते हैं । स्वयं हारकर भगवान वह सब करते हैं जो ग्वाल-गोपाल उनसे करवाते हैं । ग्वाल-गोपाल उनसे बाजी जीतकर भगवान के कंधों पर चढ़ के सवारी करते हैं । यह सब निःस्वार्थ प्रेम की बलिहारी नहीं तो और क्या है ! भक्तों के प्रेम के आगे अपराजित ईश्वर भी पराजित हैं । इसलिए कहा गया है :

प्रेम न खेतों ऊपजे प्रेम न हाट बिकाय ।

राजा चहो प्रजा चहो शीश दिये ले जाय ।।

  अहं दिये ले जाय ।।

साधकों को सात्त्विकता का भी खयाल रखना चाहिए । जप, स्मरण, ध्यान, कीर्तन इत्यादि से शरीर में एक विशेष आभा विकसित होती है । जहाँ-तहाँ अशुभ स्थान में रहने से, प्रदूषित वातावरण में रहने-बैठने से, विषयी लोगों से अधिक मेल-जोल रखने से, उनके स्पर्श से यह सात्त्विकता और आभा नष्ट हो जाती है, जिससे साधक ऊँचाई से गिर जाता है । सात्त्विकता का पूर्ण खयाल रखें । आहार-विहार और आचरण में, यहाँ तक कि विचारों में भी जितनी-जितनी सात्त्विकता होगी उतनी-उतनी आपकी मेहनत कम होती जायेगी और आप सत्य के रास्ते सफल होते जायेंगे ।

परोपकार और सेवा तो साधक के लिए अपने क्षुद्र अहं को मिटाने की परम औषधि है । सेवा से अंतःकरण की शुद्धि होती है और ब्रह्मज्ञान से शुद्ध अंतःकरण का सीधा संबंध है । सेवा के एवज में साधक सबमें एक अभेद सत्ता का दर्शन कर सकता है । यह सेवा ही है जो सर्वेश्वर तक पहुँचने का पथ प्रशस्त करती है । निष्काम भाव से सभीकी सेवा करने से स्वयं की सेवा का भी द्वार खुल जाता है ।

इन गुणों के अलावा साधक के जीवन में निर्भयता, निश्चिंतता, प्रसन्नता और अटूट श्रद्धा की भी आवश्यकता होती है ।      

जीवन में पग-पग पर चिंता, भय और परेशानी के स्थान पर निर्भयता का स्थान हो । ऐसा जीवन किस काम का जो डर, कमजोरी और चिंताओं के बोझ तले दबा हो ? जीवन तो एक गुलाब की तरह खिला हुआ होना चाहिए । मनुष्य-जन्म पाकर भी भयभीत, चिंतित रहे तो बड़े शर्म की बात है ! निश्चिंतता से सूझबूझ बढ़िया रहती है । चिंता के स्थान पर चिंतन हो । आप संसार की परेशानियों से जितना-जितना हटकर परमात्मा में स्थिर होते जायेंगे, उतनी-उतनी आपकी चिंताएँ स्वतः समाप्त होती जायेंगी । मनुष्य-जन्म में यदि परेशानियाँ नहीं होंगी तो आपका विकास कैसे हो पायेगा ? सत्संग और सद्गुरुओं का सान्निध्य विघ्न-बाधाओं के बीच मुस्कराकर जीना सिखाता है । अपने मुख को कभी भी मलिन मत करो । निराशावादी विचारों को उखाड़ फेंको । सदा मुस्कराते रहो । दुःखी और शोकवान तो वे रहें जो अनाथ हैं । विश्व के नाथ परमात्मा, सद्गुरु तो आपके साथ हैं । पलभर में मीठी मुस्कान से पीड़ाओं को हरनेवाले हैं । फिर मुख-मालिन्य किस बात का ? सूझबूझ व ईमानदारी के साथ किये गये पुरुषार्थ का परिणाम निश्चित ही मंगलमय होता है । शांत और सम रहो । इस बात को हृदय में बिठा के साधक प्रसन्न रहना आरम्भ कर दे कि

मेरो चिंत्यो होत नहिं, हरि को चिंत्यो होय ।

हरि को चिंत्यो हरि करे, मैं रहूँ निश्चिंत ।।

इन तमाम संकल्पों, नियमों के अलावा आप यह निश्चित कर लें कि ‘मुझे दिनभर में इतना समय सत्संग का श्रवण करना ही है ।’ अगर आप नियमित रूप से सत्संग व सत्शास्त्र सुनेंगे तो आपका मन फालतू विचारों में नहीं बहेगा, मनोराज से बचोगे और सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि आप जो सत्संग सुनेंगे उसीके विचारों में आपका मन लगा रहेगा । मन सहज रूप से उन्हीं विचारों को विचारता रहेगा । सत्संग के वचनों के बार-बार मनन से आपमें विवेक-वैराग्य स्वतः ही जागृत होगा, आपका मन हलकी कामनाओं और तुच्छ आकर्षणों से बचकर सत्संग-सुधा के पान में संलग्न रहेगा और यही हो गयी आपकी सहज बंदगी । सत्संग के विचारों का बार-बार मनन न केवल आपके गिरते हुए मन-बुद्धि को सँभाल लेगा वरन् उन्हें बुद्धिदाता में प्रतिष्ठित होने का मौका भी प्रदान करेगा । ज्यों-ज्यों आप सत्संग सुनते जायेंगे और मनन करते जायेंगे, त्यों-त्यों अपने जीवत्व के स्वभाव से ऊपर उठकर सच्चिदानंद-स्वरूप की ओर बढ़ते जायेंगे । ठीक ही कहा है कि सत्संग से वंचित होना महान पापों का फल है । यदि कोई व्यक्ति साधक नहीं है और सत्संग बार-बार सुने-विचारे तो वह सद्गुरु की प्राप्ति करके श्रेष्ठ साधक बन सकता है, श्रेष्ठ-में-श्रेष्ठ परमात्म-तत्त्व का साक्षात्कार कर सकता है । सत्संग, सेवा और साधन-भजन का यह परम फल है कि ईश्वर का रस आने लग जाय, ध्यान का, गुरुकृपा का प्रसाद उभरने लग जाय ।

दुनिया में सत्संग एक अद्वितीय रत्न है, कोहिनूर है, पारसमणि है... ये सब तो पत्थर हैं जबकि सत्संग तो मुक्ति की जीती-जागती ज्योति है । इसलिए साधक को प्रतिदिन नियमित रूप से सत्संग-श्रवण करना ही चाहिए ।

साधकों को चाहिए कि ‘दिव्य प्रेरणा-प्रकाश’ (युवाधन सुरक्षा) एवं ‘ईश्वर की ओर’ पुस्तकों को बार-बार पढ़ें-विचारें । (आश्रम के ग्रंथ ‘पंचामृत’ में इन पुस्तकों का संकलन है ।) इससे साधन-भजन में रुचि पैदा होती है । साथ ही ‘श्री योगवासिष्ठ महारामायण’ तो नित्य पढ़ें और उसके ज्ञान में डूबते जायें ।

इस प्रकार एक श्रेष्ठ साधक बनने के लिए उक्त सद्गुणों को गम्भीरतापूर्वक जीवन में उतारें । यदि आप इतना करने के लिए तत्पर हो जायें तो परमात्मा प्रकट हुए बिना नहीं रह पायेगा । तो फिर देरी कैसी ?        

 

*Rishi Prasad - 274-275 & 276 - 2015             

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