ऐसा जन्मदिवस मनाना परम कल्याणकारी है !
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ऐसा जन्मदिवस मनाना परम कल्याणकारी है !

- पूज्य बापूजी

(पूज्य बापूजी का 83वाँ अवतरण दिवस : 25 अप्रैल)

जन्मदिवस बधाई हो ! पृथ्वी सुखदायी हो, जल सुखदायी हो, तेज सुखदायी हो, वायु सुखदायी हो, आकाश सुखदायी हो... जन्मदिवस बधाई हो... इस प्रकार जन्मदिवस जो लोग मनाते-मनवाते हैं, बहुत अच्छा है, ठीक है लेकिन उससे थोड़ा और भी आगे जाने की नितांत आवश्यकता है ।

जन्मोत्सव मनायें लेकिन विवेकपूर्ण मनाने से बहुत फायदा होता है । विवेक में अगर वैराग्य मिला दिया जाय तो और विशेष फायदा होता है । विवेक-वैराग्य के साथ यदि भगवान के जन्म-कर्म को जाननेवाली गति-मति हो जाय तो परम कल्याण समझो ।

कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ।। (गीता : 13.21)

ऊँच और नीच योनियों में जीवात्मा के जन्म लेने का कारण है गुणों का संग । हम जीवन में कई बार जन्मते रहते हैं । शिशु जन्मा, शिशु की मौत हुई तो बालकपन आया । बालक मरा तो किशोर का जन्म हुआ । किशोर मरा तो युवक का जन्म हुआ ।... ‘मैं सुखी हूँ...’ ऐसा माना तो आपका सुखमय जन्म हुआ, ‘मैं दुःखी हूँ’ माना तो उस समय आपका दुःखमय जन्म हुआ । तो इन गुणों के साथ संग करने से ऊँच-नीच योनियों में जीव भटकता है । स्थूल शरीर को पता नहीं कि ‘मेरा जन्म होता है’ और आत्मा का जन्म होता नहीं । बीच में है सूक्ष्म शरीर और वह जिस समय जिस भाव में होता है उसी भाव का उसका जन्म माना जाता है ।

भगवान श्रीकृष्ण इन सारे जन्मों से हटाकर हमें दिव्य जन्म की ओर ले जाना चाहते हैं । वे कहते हैं :

जन्म कर्म च मे दिव्य-

मेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म

नैति मामेति सोऽर्जुन ।। (गीता : 4.9)

भगवान में अगर जन्म और कर्म मानें तो भगवान का भगवानपना सिद्ध नहीं होता । भगवान को भी जन्म लेना पड़े और कर्म करना पड़े तो भगवान किस बात के ? अगर भगवान में जन्म और कर्म नहीं मानते हैं तो भगवान में आना-जाना, उपदेश देना, युद्ध करना, संधिदूत बनना अथवा ‘हाय सीते ! हाय लक्ष्मण !!...’ करना - ये क्रिया व दर्शन जो हो रहे हैं वे सम्भव नहीं हैं ।

वेदांत-सिद्धांत के अनुसार इसको बोलते हैं विलक्षण लक्षण । इसमें भगवान में जो लक्षण जीव के लक्षणों से मेल न खायें और ईश्वर (ब्रह्म) के लक्षणों से मेल न खायें फिर भी दोनों दिखें उनको बोलते हैं विलक्षण लक्षण, अनिर्वचनीय । भगवान का जन्म और कर्म दिव्य कैसे ? बोले अनिर्वचनीय है इसलिए दिव्य है । ईश्वर में न जन्म-कर्म है, न जीवत्व के बंधन और वासना हैं इसलिए भगवान के कर्म और जन्म दिव्य माने जाते हैं । तो भगवान के जन्म और कर्म दिव्य मानने-जानने से आपको भी लगेगा कि कर्म पंचभौतिक शरीर से होते हैं, मन की मान्यता से होते हैं, उनको जाननेवाला ज्ञान जन्म और कर्म से विलक्षण है, मैं वह ज्ञानस्वरूप हूँ ।

तो कर्म-बंधन से छूट जाओगे

शरीर को मैं मानना और शरीर की अवस्था को ‘मेरी’ मानना यह जन्म है । हाथ-पैर आदि इन्द्रियों से क्रिया होती है और उसमें कर्तृत्व मानना कर्म है लेकिन ‘कर रहे हैं हाथ-पैर और मैं इनको सत्ता देनेवाला शाश्वत चैतन्य हूँ’ - इस प्रकार जानने से अपना कर्म और जन्म दिव्य हो जाता है ।

...तो महापुरुषों का जन्मोत्सव मनाना । उससे महापुरुषों को तो कोई फायदा-नुकसान का सवाल नहीं है लेकिन मनानेवाले भक्तों-जिज्ञासुओं को फायदा होता है कि उस निमित्त उन्हें अपने जन्म-कर्म की दिव्यता को जानना और कर्म-बंधन से छूटना सरल हो जाता है ।

अष्टावक्र मुनि ने कहा :

अकर्तृत्वमभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा ।... (अष्टावक्र गीता : 18.51)

जब जिज्ञासु अपने-आपको (अपने स्व-स्वरूप को) अकर्ता और अभोक्ता निश्चय कर लेता है उसी समय वह कर्म-बंधन से छूट जाता है । शुभ कर्म करे लेकिन उसका कर्ता अपने को न माने, प्रकृति ने किया और परमात्मा की सत्ता से हुआ । अशुभ कर्म से बचे और कभी गलती से हो गया तो उसके कर्तापन में न उलझे और फिर-फिर से न करे । हृदयपूर्वक उसका त्याग कर दे तो प्रायश्चित हो गया । शुभ-अशुभ में, सुख-दुःख में, पुण्य-पाप में अपने को न उलझाये, अपने ज्ञानस्वभाव में जग जाय तो उस जिज्ञासु को अपने जन्म-कर्म की दिव्यता का रहस्य समझ में आ जाता है ।

इससे जगती परम शांति की प्यास

सत्पुरुषों की जयंती मनाने से भावनाएँ शुद्ध होती हैं, विचार शुद्ध होते हैं, उमंगें सात्त्विक होती हैं और अगर आप हलकी वृत्ति से, हलके विचारों से और हलके आचरणों से समझौता नहीं करते हैं तो आपका भी जागरण हो जाता है अपने चैतन्यस्वरूप में, चित्त में अपने शुद्ध स्वरूप का प्राकट्य हो जाता है ।

जब व्यक्ति बेईमानी, भोग-संग्रह और दुर्वासनाओं को सहयोग करता है तो उसका अवतरण नहीं होता, वह साधारण जीव-कोटि में भटकता है । आत्मबल बढ़ाने में वे ही लोग सफल होते हैं जो हलकी आशाओं, इच्छाओं व हलके संग से समझौता नहीं करते हैं । ऐसे पुरुषों का आत्मबल विकसित होता है और वह आत्मबल सदाचार के रास्ते चलते-चलते चित्त में परम शांति की प्यास जगाता है ।

वैदिक संस्कृति में प्रार्थना है :

दुर्जनः सज्जनो भूयात्... दुर्वासनाओं के कारण व्यक्ति दुर्जन हो जाता है । दुर्वासनाओं व दुर्व्यवहार के साथ समझौता नहीं करे तो सज्जनता आ जायेगी । सज्जनः शान्तिमाप्नुयात् । सज्जन को शांति प्राप्त होती है, सज्जन शांति प्राप्त करे । शान्तो मुच्येत बन्धेभ्यो... शांत बंधनों से मुक्त होते हैं । मुक्तश्चान्यान् विमोचयेत् ।। मुक्त पुरुष औरों को मुक्ति के मार्ग पर ले जायें ।

शांति पाने से दुर्वासनाएँ निवृत्त होती हैं, सद्वासनाओं को बल मिलता है, ‘सत्’स्वरूप को पाने की तीव्रता जगती है । फिर पहुँच जायेंगे आत्मसाक्षात्कारी महापुरुष की शरण में... जिनके अंतःकरण में सत्य का अवतरण हुआ है उन्हें अवतारी पुरुष कहो, ब्रह्मवेत्ता कहो - ऐसे महापुरुष के सत्संग-सान्निध्य में आने से हमारा चित्त, हमारी दृष्टि, हमारे विचार पावन होने लगते हैं... उनकी कृपा से हमारी परम शांति की प्यास शांत होने लगती है और आगे चलकर मोक्ष की प्राप्ति भी हो जाती है ।

बड़ी मुश्किल से यह मनुष्य-देह मिली है तो अपनी मंजिल तय कर लो । अगर तय कर ली तो आप सत्पुरुष हैं और तय करने के रास्ते हैं तो आप साधक हैं और यदि तय नहीं कर रहे हैं तो आप देहधारी द्विपाद पशु की पंक्ति में गिने जाते हैं । जन्मोत्सव प्रेरणा देता है कि तुम पशु की पंक्ति से पार होकर सत्पुरुष की पंक्ति में चलो ।


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Such a birthday celebration is supremely auspicious!

                                (Pujya Bapuji’s 83rd Birthday: 25th April)                – Pujya Bapuji


Greetings and many congratulations on your birthday! May Earth be pleasant and bring joy to you, May water be pleasant to you, May fire be pleasant to you, May wind be pleasant to you, May sky be pleasant to you… Greetings on your birthday…


Celebrating a birthday in this manner and encouraging others to do so is very good but it is extremely necessary to go a step ahead of this.

Celebrating a birthday with discrimination (vivek) is greatly beneficial. If dispassion is added to vivek it becomes still more beneficial. If in addition to discrimination and dispassion, one develops the intellect to know the birth and actions of God, one attains supreme welfare.


कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ।।


“Contact with the Gunas (three modes of material nature) is the cause of its births in good and evil wombs.” (The Gita: 13.21)


The cause of a jiva’s birth in good and evil wombs is the contact with the Gunas. We take many births in a life. An infant is born. A child is born, when the infant dies; an adolescent is born when the child dies; a young man is born when the adolescent dies. When you believe “I am happy” you are born as a joyous person and when you believe “I am sad” you are born as a sad person. Due to coming in contact with these Gunas, the jiva wanders in lower and higher species. The physical body is unaware of its birth, and soul (Atman) is never born. In between them is the subtle body (sukshma sharir), which is believed to have taken birth according to its mental attitude at a given time.

Lord Krishna aims to release us from all these births and lead us to the divine birth instead. He says:


जन्म कर्म च मे दिव्य-

मेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म

नैति मामेति सोऽर्जुन ।।


“He who thus knows, in true light, My divine birth and action, having abandoned the body, he is not born again; he comes to Me, O Arjuna.”

(The Gita: 4.9)


If we believe in God’s birth and actions, His Godliness is not established. If even God has to take birth and act in the world, then how could He be God? On the other hand, disbelief in his birth and action makes it impossible to perceive his acts of coming and going, preaching, fighting wars, being a peacemaker or lamenting with words like “O Laxman! O Sita!!” as real.


According to the Vedanta doctrine, this is termed Vilakshan lakshan (Exceptional attribute). The traits of God, unmatched with both individual soul (jiva) and Supreme Being (Brahman) are called Vilakshan lakshan or indeterminable as either real or unreal. How are God’s birth and actions divine? They are divine because they are indescribable or inexpressible. God is not bound by the shackles of birth, action, and desire with which the jiva is bound. So believing and understanding the divine birth and actions of God will help you realise that actions are done by the body composed of five great elements and belief of the mind. The consciousness witnessing all this is distinct from birth and action. I am that consciousness.


So you will be free from the bondage of action.


Considering the body as ‘I’ and its state as ‘Mine’, is birth. Actions are performed by the sense organs like ‘hands and feet…’; believing oneself as the doer of the action is karma. But acknowledging that ‘action is being done by the hands and feet, and I am the eternal consciousness’, that lends reality to them, makes one’s birth and actions divine.


So celebrating the birthday of Saints brings no benefit or loss to the saints, but it helps the devotees and spiritual aspirants who celebrate it by providing a benefit of knowing their birth and actions as divine and thereby get released from the bondage of action easily.


Sage Ashtavakra said:

अकर्तृत्वमभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा ।... 


“All the modifications of the mind are destroyed when a man realizes that he himself is neither the doer nor the experiencer.”      (Ashtavakra Gita: 18.51)


When a spiritual aspirant realises himself (his nature) as ‘non-doer’ and ‘non-experiencer’, he gets liberated from the bondage of action.


Do good actions but do not believe yourself the doer and think that it was done by Nature with the power of the Supreme Self. Refrain from doing bad acts but if committed by mistake, do not entangle yourself in the doer-ship of that and do not repeat it. If the bad action is heartily given up, expiation is done. The spiritual aspirant who does not entangle himself in good and evil, pleasure and pain, virtue and sin, and wakes up in his consciousness-nature, unravels the mystery of the divinity of his birth and actions.


This awakens the thirst for supreme peace


Celebrating birth anniversaries of Self-realised masters purifies one’s emotions, thoughts and aspirations, and desires; and if you do not compromise with lowly tendencies, thoughts and conduct, you too get awakened into your consciousness-nature. One’s pure being gets revealed in the mind stuff.


When a person favours dishonesty, accumulation of objects of pleasures and evil desires, he is not incarnated and rather wanders in the class of an ordinary jiva. Only those people who do not compromise with lowly desires, hope and bad company become capable of increasing soul-force (Atmabal). The soul-force of such men is developed which leads them on the path of good conduct and awakens the thirst for supreme peace.


A prayer in Vedic Culture says:


दुर्जनः सज्जनो भूयात् सज्जनः शान्तिमाप्नुयात् ।

शान्तो मुच्येत बन्धेभ्यो मुक्तश्चान्यान् विमोचयेत् ।।



“May the evil minded, become virtuous. May the virtuous, attain tranquility. May the tranquil be free from bondage. May the freed, make others free.”


One becomes evil minded due to evil desires and tendencies. If one does not compromise with them one will become virtuous. The noble attains tranquility. May the virtuous, attain tranquility. The tranquil person becomes free from bondage. May the freed lead others on the path of freedom.


Tranquility eradicates evil desires and strengthens good desires. The desire to attain the ‘Sat’ (Brahman, existence absolute) gets intensified and takes one to the shelter of Self-realized saints. The company and discourses of such a Great man (in whose heart Truth is revealed), purifies our mind, vision and thoughts. Their grace satisfies our thirst for peace and eventually leads us to the attainment of liberation (Moksha).


It is with great difficulty that you have obtained a human birth, hence attain your goal. If you have attained your goal then you are a Self-realised person; and if you are on the way then you are a sadhak (a spiritual aspirant) but if you are not trying to attain it then you ought to be deemed as a two legged animal. Birthday celebrations inspire you to evolve from the class of animals to that of Self-realized ones.


[Rishi Prasad -April-2019]

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