भक्तों की भक्ति को कैसे पुष्ट करते हैं भगवान व गुरु !
Ashram India
/ Categories: RishiPrasad, Year-2018, Sep-2018

भक्तों की भक्ति को कैसे पुष्ट करते हैं भगवान व गुरु !

- पूज्य बापूजी

भगवान रामानुजाचार्यजी के शिष्य थे अनंतालवार (अनंतालवान) । वे तिरुपति (आंध्र प्रदेश) में रहते थे । वहाँ तिरुमला की पहाड़ी पर भगवान वेंकटेश्वर का मंदिर था । डाकू-चोर के भय से लोग सूरज उगने के बाद ही वहाँ जाते थे और शाम को आ जाते थे लेकिन रामानुजाचार्यजी ने अपने शिष्य को आदेश दिया : ‘‘आलवार ! तुम पहाड़ी पर रहकर तिरुपति भगवान (भगवान वेंकटेश्वर) की पूजा करो !’’

आलवार ने वहीं छोटा-मोटा मकान बनाया और तिरुपति भगवान की पूजा करने लगे । वे और उनकी पत्नी आसपास की जमीन ठीक करते, पौधे बोते,  तुलसी बोते... ऐसा करते । एक लड़का आया, बोला : ‘‘आलवार ! मेरे को काम पर रखोगे ?’’

आलवार ने सोचा, ‘इतना सुकोमल लड़का क्या काम करेगा !’ बोले : ‘‘जाओ, तुम छोटे बच्चे हो । मुझे तुम्हारी मदद की आवश्यकता नहीं है, जाओ... अरे जाओ न !’’

उन्होंने बड़ी-बड़ी आँखें दिखायीं तो वह बच्चा चला गया ।

दूसरे दिन वह बालक आलवार की पत्नी के पास आया, बोला : ‘‘माताजी ! देखो, तुम पौधे लगाती हो न, मैं भी मदद करता हूँ । मुझे कुछ सेवा दो । मेरी सेवा जो करते हैं न, मैं उनकी सेवा करता हूँ तो मुझे अच्छा लगता है ।’’

बालक धीरे-धीरे छुप के मदद करने लगा । वह बाई खाना-पीना दे दे तो खा लेता और सेवा बड़ी तत्परता से करता था । एक दिन आलवार की नजर पड़ गयी, ‘अरे, इसको मना किया था, काहे को आया सेवा करने को ?’ यह सोचकर उस लड़के को बुलाने के लिए उन्होंने एक कंकड़ उठा के उसकी ओर फेंका तो उसके सिर में लग गया और खून बहने लगा । वह लड़का भागा और उनकी आँखों से ओझल हो गया ।

उधर मंदिर में क्या हुआ कि भगवान तिरुपति की मूर्ति से खून बहने लगा । पुजारी और भक्तों में खलबली मच गयी : ‘ओ हो ! यह क्या हो गया !... कैसे हो गया !...’ इतने में एक बालक के अंदर भगवान ने प्रेरणा की । बालक बोला : ‘‘आलवार को इधर बुलाओ और उसके घर में कपूर पड़ा है, वह भगवान की मूर्ति पर लगाओ तो खून बंद हो जायेगा ।’’

लोग दौड़-दौड़ के गये, आलवार को लाये और कपूर लाये, भगवान की मूर्ति को लगाया तो खून टपकना बंद हो गया । भक्त आलवार को अब समझने में देर न लगी कि जिस लड़के को मैंने पत्थर मारा वही तिरुपति भगवान हैं, बालक का रूप लेकर आये थे । बोले : ‘‘हे तिरुपति बालाजी ! मैंने तुमको पहचाना नहीं, मैंने तुम्हारा अपमान किया । मुझे माफ करो, माफ करो...’’ ऐसा करते-करते भावविभोर हो गये ।

भगवान बोले : ‘‘कोई बात नहीं, रोज खिलाता है तो एक दिन मार दिया तो क्या है ! प्यार में होता रहता है । आ जाओ ! तुम मेरे, मैं तुम्हारा...’’

वे भगवान के हृदय में समा गये ।

कैसी भगवान की लीला है ! भक्तों की भक्ति को कैसे पुष्ट करते हैं भगवान ! हिन्दू धर्म की महानता देखो ! भगवान की भक्ति और गुरु की कृपा के प्रभाव को देखकर तो नास्तिक को भी सुधरने का सीजन हो जाता है (सुधरने की प्रेरणा मिल जाती है) ।


------------------------------


How God and Guru develop the devotion of their devotee?

Ananta Alwar, a disciple of Bhagavan Ramanujacharyaji, lived in Tirupati (Andhra Pradesh). There was Lord Venkateshwara’s temple on the hill. Scared of thieves and bandits, people would visit the temple only after sunrise and would return before sunset. But Ramanujacharyaji ordered his disciple: “Alwar! Live on the hill and worship Lord Tirupati (Lord Venkateshwara)!”

Alwar made a small house on the hill and continued worshipping Lord Tirupati. He and his wife would plough the land and plant saplings & Tulsi plants in it. One day a young boy came and asked: “Alwar! Would you let me help you in this task?”

Alwar thought: “What work can such a delicate boy do?” He said wrathfully, “Go! You are a small boy. I don’t need your help. Go back.” The boy left.

The next day the boy came to Alwar’s wife and said: “Mother! I shall also help you in planting the saplings. Give me some work. I enjoy serving those who serve Me.”

The boy then started helping her stealthily. He ate whatever food the mother gave him and performed the service diligently. One day Alwar noticed him: “Arre! Why did he come to serve, even after being forbidden by me?” So he threw a pebble at him to call him, which mistakenly hit the boy’s head and it started bleeding. The boy ran away and vanished.

At the same time it started bleeding from Lord Tirupati’s idol in the temple. The priests and devotees were in great agitation. “Alas! What is this, how is it happening?” By God’s inspiration, a boy said: “Call Alwar and apply the camphor from his home to the Lord’s idol. His bleeding will stop.”

People rushed immediately to bring Alwar and camphor from his home and applied it on the Lord’s idol which stopped the bleeding. It took no time for the devotee Alwar to realize that the boy he hit was no one but Lord Tirupati Himself. He prayed: “O Tirupati Balaji! I did not recognize You. I insulted You. Please forgive me... forgive me.”

The Lord said: “No problem. Hitting once does not matter; you also serve me food every day. It happens in love. Come! You are Mine and I am yours….”

He became one with Lord.

Such is the play of God! This is how He increases the devotion of his beloved! See the greatness of Hindu Dharma! Even the atheist is inspired to get reformed on seeing the impact of devotion towards God and the grace of Guru.



[Rishi Prasad-September-2018]

Previous Article अलौकिक भगवद्‌रस का पान करानेवाली महापुण्यमयी रात्रि
Next Article माँ महँगीबाजी का आज्ञापालन और ब्रह्मनिष्ठा
Print
730 Rate this article:
No rating

Please login or register to post comments.

Name:
Email:
Subject:
Message:
x