Ashram India

दिव्यता की ओर ले जानेवाला पर्व : अवतरण दिवस

पूज्य बापूजी का 81वाँ अवतरण दिवस : 17 अप्रैल

वह वर्षगाँठ नहीं है...

स्थूल शरीर व सूक्ष्म शरीर के मेल को जन्म बोलते हैं और इनके वियोग को मृत्यु बोलते हैं । तो स्थूल-सूक्ष्म शरीरों का संयोग होकर जन्म ले के जीव इस पृथ्वी पर आया तो उसका है जन्मदिन । वह तिथि, तारीख, दिन, घड़ियाँ, मिनट, सेकंड देखकर कुंडली बनायी जाती है और उसके मुताबिक कहा जाता है कि आज 20वीं वर्षगाँठ है, 25वीं है, 50वीं है... फलाना आदमी 70 वर्ष का हो गया, 70 वर्ष जिया... लेकिन हकीकत में उनका वह जीना जीना नहीं है, उनकी वह वर्षगाँठ वर्षगाँठ नहीं है जो देह के जन्म को मेरा जन्म मानते हैं । जो देह को ‘मैं’ मानकर जी रहे हैं वे तो मर रहे हैं ! ऐसे लोगों के लिए तो संतों ने कहा कि उन्हें हर वर्षगाँठ को, हर जन्मदिन को रोना चाहिए कि ‘अरे, 22 साल मर गये, 23वाँ साल मरने को शुरू हुआ है । हर रोज एक-एक मिनट मर रहे हैं ।’

‘मेरा जन्मदिवस है, मिठाई बाँटता हूँ...’ नहीं, रोओ कि ‘अभी तक अपने प्यारे को नहीं देखा । अभी तक ज्ञान नहीं हुआ कि मेरा कभी जन्म ही नहीं, मैं अजर-अमर आत्मा हूँ । अभी तक दिल में छुपे हुए दिलबर का ज्ञान नहीं हुआ, आत्मसाक्षात्कार नहीं हुआ ।’ जिस दिन ज्ञान हो जाय उस दिन तुम्हें पता चलेगा कि

जन्म मृत्यु मेरा धर्म नहीं है,

पाप पुण्य कछु कर्म नहीं है ।

मैं अज निर्लेपी रूप, कोई कोई जाने रे ।।

तुम्हें जब परमात्मा का साक्षात्कार हो जायेगा तब लोग तुम्हारा नाम लेकर अथवा तुम्हारा जन्मदिन मना के आनंद ले लेंगे, मजा ले लेंगे, पुण्यकर्म करेंगे । तुमको रोना नहीं आयेगा, तुम भी मजा लोगे । उनका जन्म सार्थक हो गया जिन्होंने अजन्मा परमात्मा को जान लिया । उनको देह के जन्मों का फल मिल गया जिन्होंने अपने अजन्मा स्वरूप को जान लिया और जिन्होंने जान लिया, जिनका काम बन गया वे तो खुश रहते ही हैं । ऐसे मनुष्य-जन्म का काम बन गया कि परमात्मा में विश्रांति मिल गयी तो फिर रोना बंद हो जाता है ।

अपना जन्म दिव्यता की तरफ ले चलो

जो जन्मदिवस मनाते हैं उन्हें यह श्लोक सुना दो :

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः 

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ।।(गीता : 4.9)

हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं, इस प्रकार मेरे जन्म और कर्म को जो मनुष्य तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर का त्याग करने के बाद पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, भगवद्-तत्त्व को प्राप्त हो जाता है ।

आप जिसका जन्मदिवस मनाने को जाते हैं अथवा जो अपना जन्मदिवस मनाते हैं, उन्हें इस बात का स्मरण रखना चाहिए कि वास्तव में उस दिन उनका जन्म नहीं हुआ, उनके साधन का जन्म हुआ है । उस साधन को 50 साल गुजर गये, उसका सदुपयोग कर लो । बाकी के जो कुछ दिन बचे हैं उनमें ‘सत्’ के लिए उस साधन का उपयोग कर लो । करने की शक्ति का आप सदुपयोग कर लो, ‘सत्’ को, रब, अकाल पुरुष को जानने के उद्देश्य से सत्कर्म करने में इसका उपयोग कर लो । आपमें मानने की शक्ति है तो अपनी अमरता को मान लो । जानने की शक्ति है तो आप अपने ज्योतिस्वरूप को जान लो । सूर्य और चन्द्र एक ज्योति हैं लेकिन उनको देखने के लिए नेत्रज्योति चाहिए । नेत्रज्योति ठीक देखती है कि नहीं इसको देखने के लिए मनःज्योति चाहिए । मन हमारा ठीक है कि नहीं है इसे देखने के लिए मतिरूपी ज्योति चाहिए और हमारी मति गड़बड़ है कि ठीक है इसको देखने के लिए जीवरूपी ज्योति चाहिए । हमारे जीव को चैन है कि बेचैनी है, मेरा जी घबरा रहा है कि संतुष्ट है, इसको देखने के लिए आत्मज्योति, अकाल पुरुष की ज्योति चाहिए ।

मन तू ज्योतिस्वरूप, अपना मूल पिछान ।

साध जना मिल हर जस गाइये ।

उन संतों के साथ मिलकर हरि का यश गाइये और अपने जन्मदिवस को जरा समझ पाइये तो आपका जन्म दिव्य हो जायेगा, आपका कर्म दिव्य हो जायेगा । जब शरीर को ‘मैं’ मानते हैं और संसार की वस्तुओं को ‘मेरा’ मानते हैं तो आपका जन्म और कर्म तुच्छ हो जाते हैं । जब आप अपने आत्मा को अमर व अपने इस ज्योतिस्वरूप को ‘मैं’ मानते हैं और ‘शरीर अपना साधन है और वस्तु तथा शरीर संसार का है । संसार की वस्तु और शरीर संसार के स्वामी की प्रसन्नता के लिए उपयोग करनेभर को ही मिले हैं ।’ ऐसा मानते हैं तो आपका कर्म दिव्य हो जाता है, आपका जन्म दिव्यता की तरफ यात्रा करने लगता है ।

...तो ईश्वरप्राप्ति पक्की बात है !

श्रीकृष्ण का कैसा दिव्य जन्म है ! कैसे दिव्य कर्म हैं ! ऐसे ही रामजी का जन्म-कर्म, भगवत्पाद लीलाशाहजी बापू का, संत एकनाथजी, संत तुकाराम महाराज, संत कबीरजी आदि और भी नामी-अनामी संतों के जन्म-कर्म दिव्य हो गये श्रीकृष्ण की नाईं । तो जब वे महापुरुष जैसे आप पैदा हुए ऐसे ही पैदा हुए तो जो उन्होंने पाया वह आप क्यों नहीं पा सकते ? उधर नजर नहीं जाती । नश्वर की तरफ इतना आकर्षण है कि शाश्वत में विश्रांति में जो खजाना है वह पता ही नहीं चलता । स्वार्थ में माहौल इतना अंधा हो गया कि निःस्वार्थ कर्म करने से बदले में भगवान मिलते हैं इस बात को मानने की भी योग्यता चली गयी । सचमुच, निष्काम कर्म करो तो ईश्वरप्राप्ति पक्की बात है । ईश्वर के लिए तड़प हो तो ईश्वरप्राप्ति पक्की बात है । ईश्वरप्राप्त महापुरुष को प्रसन्न कर लिया तो ईश्वरप्राप्ति पक्की बात है । जिनको परमात्मा मिले हैं उनको प्रसन्न कर लिया... देखो बस ! मस्का मार के प्रसन्न करने से वह प्रसन्नता नहीं रहती । वे जिस ज्ञान से, जिस भाव से प्रसन्न रहें ऐसा आचरण करो बस !

डूब जाओ, तड़पो तो प्रकट हो जायेगा !

एक होता है जाया, दूसरा होता है जनक । एक होता है पैदा हुआ और दूसरा होता है पैदा करनेवाला । तो पैदा होनेवाला पैदा करनेवाले को जान नहीं सकता । मान सकते हैं कि ‘यह मेरी माँ है, यह मेरे पिता हैं ।’

तो सृष्टि की चीजों से या मन-बुद्धि से हम ईश्वर को जान नहीं सकते, मान लेते हैं । और मानेंगे तो महाराज ! ईश्वर व ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु की बात भी मानेंगे और उनकी बात मानेंगे तो वे प्रसन्न होकर स्वयं अपना अनुभव करा देंगे ।

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई ।

जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई ।।

(श्री रामचरित. अयो.कां. : 126.2)

बापू का 81वाँ जन्मदिवस है तो शरीर के जन्म के पहले हम (पूज्यश्री) नहीं थे क्या ? और इस शरीर के बाद हम नहीं रहेंगे क्या ?

तो मानना पड़ेगा कि ‘शरीर का जन्मदिवस है, मेरा नहीं है ।’ ऐसा मान के फिर आप लोग अपना जन्मदिवस मनाते हो तो मेरी मना नहीं है लेकिन ‘शरीर का जन्म मेरा जन्म है ।’ ऐसा मानने की गलती मत करना । ‘शरीर की बीमारी मेरी बीमारी है, शरीर का बुढ़ापा मेरा बुढ़ापा है, शरीर का गोरापन-कालापन मेरा गोरा-कालापन है...’ यह मानने की गलती मत करना ।

मनोबुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहं...

शरीर भी मैं नहीं हूँ और मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त भी मैं नहीं हूँ । तो फिर क्या हूँ ? बस डूब जाओ, तड़पो तो प्रकट हो जायेगा ! असली जन्मदिवस तो तब है जब -

देखा अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया 

न छेड़ो मुझे यारों मैं खुद पे मस्ताना हो गया ।।

तभी तो जन्मदिवस का फल है । मरनेवाले शरीर का जन्मदिवस... जन्मदिवस तो मनाओ पर उसी निमित्त मनाओ जिससे सत्कर्म हो जायें, सद्बुद्धि का विकास हो जाय, अपने सत्स्वभाव को जानने की ललक जग जाय...

ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः । अपने आत्मदेव को जाननेवाला शोक, भय, जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि - सब बंधनों से मुक्त होता है ।

मुझ चिदाकाश को ये सब छू नहीं सकते, प्रतीतिमात्र हैं, वास्तव में हैं नहीं । जैसे स्वप्न व उसकी वस्तुएँ, दुःख, शोक प्रतीतिमात्र हैं । प्रभुजी = साधकजी ! आप भी वही हैं । ये सब गड़बड़ें मरने-मिटनेवाले तन-मन में प्रतीत होती हैं । आप न मरते हैं न जन्मते हैं, न सुखी-दुःखी होते हैं । आप  इन सबको  जाननेवाले हैं, नित्य-शुद्ध-बुद्ध, विभु-व्यापक चिदानंद चैतन्य हैं ।

चांदणा कुल जहान का तू,

तेरे आसरे होय व्यवहार सारा ।

तू सब दी आँख में चमकदा है,

हाय चांदणा तुझे सूझता अँधियारा ।।

जागना सोना नित ख्वाब तीनों,

होवे तेरे आगे कई बारा ।

बुल्लाशाह प्रकाश स्वरूप है,

इक तेरा घट वध न होवे यारा ।।

तुम ज्योतियों-की-ज्योति हो, प्रकाशकों-के-प्रकाशक हो । द्रष्टा हो मन-बुद्धि के और ब्रह्मांडों के अधिष्ठान हो ॐ आनंद... ॐ अद्वैतं ब्रह्मास्मि । द्वितीयाद्वै भयं भवति । द्वैत की प्रतीति है, लीला है । अद्वैत ब्रह्म सत्य... ।

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Avatarana DivasA Birth Day that inspires to Divinity


 

(Pujya Bapuji’s 81st Avatarana Divas: 17th April)

That is not an anniversary…

The union of physical and subtle bodies is called birth and their separation is called death. By the fusion of physical and subtle bodies, the jiva (individual soul) takes birth and comes on this earth, so he has a birthday. Seeing the tithi (Lunar day), date, day, ghari, minute, second at the time of birth, his horoscope is prepared and based on that it is said that today is his 20th  anniversary, 25th , 50th …So and so person has turned 70 today. He has lived for 70 years…but in reality that
living is not living, that anniversary is not an anniversary of the person who considers the birth of the physical body as his birth. Those who live believing the body as ‘I’, they are actually dying. For such people, saints say that they should lament on every birthday ‘Oh I have died 22 years, 23
rd year of death has started. Every day we are dying every single minute.’

‘It is my birthday…I shall distribute sweets…’ No, instead weep that ‘till now I have not seen my Beloved (God). Till now I have not realized that ‘I’ never take birth, that I am ageless-immortal Self. Till now I have not realized my Beloved immanent in my heart. I have not attained Self-realization.’ The day you attain Knowledge, you will experience-

जन्म मृत्यु मेरा धर्म नहीं है,

पाप पुण्य कछु कर्म नहीं है ।

मैं अज निर्लेपी रूप, कोई कोई जाने रे ।।

“Birth and death are not my attributes.

Acts of sin and virtue are not mine.

I am unborn Consciousness of the form of untainted Sat-Chit-Ananda; some rare souls know this.”

After you attain realization of Supreme Self, people will enjoy and take delight in sloganizing your name or celebrating your birthday. They will do meritorious acts. It will not bring tears in your eyes; you will also enjoy it. For those who have realized unborn Supreme Self; their birth is fruitful. He, who has realized his unborn true nature, has obtained the fruit of births of the physical body (in many lives); and one who has realized Self, who has accomplished his goal remains always happy. Such a man who has accomplished the goal of human birth stops weeping forever.

Make your birth divine

Read out this shloka to those who celebrate birthdays:

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः 

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ।।(गीता : 4.9)

‘He who truly knows the divine births and actions of Mine, does not get rebirth after casting off the body, He attains me, O Arjuna.’

One whose birthday you are going to celebrate or those who celebrate their birthdays should remember that in reality, it is not the day of their birth; it is the day of birth of their instrument. That instrument has completed 50 years. Make the best use of it. Utilize the remaining days of the instrument in attaining Truth absolute. Make proper use of your power to do in performing righteous actions with the intention of realizing Truth, God, Akaala Purusha. If you have the power to believe; believe in your immortality. If you have the power to know, know your true nature, the Light of all lights, the light that is the Self. The Sun and Moon are luminaries but to know them we need the light of eyesight. To know whether the eyesight is functioning properly or not, we need the light of mind. Light of intellect is needed to know whether our mind is good or not. To see whether our intellect is confused or not, we need the light of jiva (individual soul). And to see if our jiva is disturbed or peaceful, to know whether “I feel nervous or contented”, we need Atamjyoti (the Light that is the Self).

मन तू ज्योतिस्वरूप, अपना मूल पिछान ।

साध जना मिल हर जस गाइये ।

“O my mind, you are the embodiment of the divine light – recognize your own origin.”

“Meeting the holy saint, sing the Praises of the Lord.”

Sing the glory of God with those saints and try to understand your birthday (in its true sense), then your birth will become divine, your actions will become divine. When you consider the body as ‘I’ and worldly materials as ‘Mine’ your birth and actions become petty. When you consider your Atman to be immortal, the embodiment of the divine Light as your Self, your body as your instrument and that the material objects and body belong to the universe and have been conferred just to make the best use, to please the Lord of universe, then your acts become divine and your birth starts making its journey towards divinity.

…then self-realization is assured

How divine is Shri Krishna’s birth! How divine are his actions! Likewise, the births and actions of Lord Rama, Bhagavatpada Shri Lilashahji Bapu, Sant Eknath, Sant Tukaram Maharaj, Sant Kabirji and many other known and unknown saints, became divine. So, when these saints were born like you were, then why can’t you attain what they attained? Our attention never goes there. The attraction towards perishable objects is so strong that one does not come to know of the treasure obtained on attaining repose in Eternal. The social environment is blinded so much by selfishness that man has lost the ability even to believe that God can be attained in return for one’s selfless acts. Really, if you do selfless acts, then attainment of God (Self-realization) is assured. Pleasing a Self-realized saint assures God-realization. Just please those who have attained Self-realization and see then! Sycophancy will not do the job; just practice the knowledge and mental attitude that please them.

Become engrossed and yearn,

He will get revealed…

One is the procreator and the other is the produced (offspring). One is born and another is the birth-giver. So, one who is procreated can never understand the procreator. We can only believe ‘she is my mother; he is my father.’

So, with worldly objects or our mind and intellect, we can’t know God, we only believe in Him. And if we believe then O Sire, we will believe teachings of Self-realized masters (SatGuru) also and if we believe them then happily they will bless us with their own experience.

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई ।

जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई ।।

(श्री रामचरित. अयो.कां. : 126.2)

“In fact, he alone can know You to whom You make Yourself known.”  (Shri Ramacharitamanas Ayodhya Kanda: 126.2)

If it is Bapuji’s 81st birthday, then did I not exist before my birth? And will I cease to exist after this body perishes?

Then we have to agree that it is the physical body’s birthday, not mine. Accepting this fact if you celebrate your birthday, then I do not prohibit this. But never commit the mistake of believing - ‘My body’s birth is my birth. Disease afflicting the body is my disease, old age of the body is my old age, fairness or blackness of the body is my fairness or blackness’- don’t commit the mistake of believing this.

मनोबुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहं...

 

“I am neither the mind, nor the intellect, nor the ego, nor the mind-stuff.”

Then who am I? Just engross yourself in that, yearn for that and It will be revealed. Your real birthday will come when you will say-

देखा अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया 

न छेड़ो मुझे यारों मैं खुद पे मस्ताना हो गया ।।

“I saw my own self and fell in love with it. Don’t mess with me friends, I am in ecstasy of self.”

Then only is this birthday successful, the birthday of the mortal body…celebrate the birthday but keeping the aim of performing good deeds and developing true wisdom behind it. And it develops yearning for awakening into Truth consciousness.

ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः । “Realizing Him, one becomes free from all fetters.” On awakening into one’s Self-God, one becomes free from fetters of grief, fear, birth, death, old age, afflictions etc.

All these cannot touch Me, the space of Consciousness. They are only apparent, not real just as the dream and all things appearing in dream -grief, sorrow are merely an appearance. Prabhuji, Sadhakaji, Thou art That. All this confusion and disorder appear in the mortal, perishable body and the mind. You undergo neither birth nor death. You become neither happy nor sad. You are the knower of them. You are eternal (Nitya), free from the stain of ignorance (Shuddha), self-luminous (Buddha), all-pervading, Consciousness, Bliss.

चांदणा कुल जहान का तू,

तेरे आसरे होय व्यवहार सारा ।

तू सब दी आँख में चमकदा है,

हाय चांदणा तुझे सूझता अँधियारा ।।

जागना सोना नित ख्वाब तीनों,

होवे तेरे आगे कई बारा ।

बुल्लाशाह प्रकाश स्वरूप है,

इक तेरा घट वध न होवे यारा ।।

“You are the Moon of the whole world. All worldly activities take place under your support. You are shining in the eyes of all beings. And O Moon, you perceive darkness? States of waking, dream and deep sleep passed many times in front of you. Says Bulleh Shah, ‘Dear friend You are the embodiment of Light, which neither decreases nor increases!’”

You are the Light of all lights; Illuminator of all illuminators. You are seer of the mind and the intellect and substratum of Universes. Bliss…! I am nondual Brahman. It is from a second entity that fear comes. There is appearance of duality. It is the lila. Nondual Brahman is the truth.

[Rishi Prasad - Issue- 291-April-2017}


 

 

 

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