सेवक व साधक को सुंदर सीख
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सेवक व साधक को सुंदर सीख

A-nice-teaching-to-the-servant-and-the-Sadhak

(श्री हनुमान जयंती : 1011 अप्रैल)

जब सीताजी की खोज हेतु हनुमानजी सागर-तीर पर खड़े थे और सभी वानर वीर उस पार जाने का विचार कर रहे थे तब जाम्बवानजी ने हनुमानजी को उत्साहित करने के लिए कहा : ‘‘हे हनुमान ! तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो । तुम बुद्धि, विवेक और विज्ञान की खान हो । जगत में ऐसा कौन-सा काम है जो तुमसे न हो सके ! श्रीरामजी के कार्य के लिए ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है ।’’

जाम्बवानजी के वचन हनुमानजी के हृदय को बहुत अच्छे लगे । क्यों ? क्योंकि रामकाज को उत्साहित करने के लिए बोल रहे थे । जो कोई आपके उत्साह को तोड़ने की बात कहे, समझना कि ‘यह हमारा हितैषी नहीं है ।’ पर आपका वह कार्य शास्त्र और संत सम्मत भी होना चाहिए । बात तो ऐसी करनी चाहिए कि जिससे सामनेवाले व्यक्ति के मन में साधन-भजन हेतु व अपने कर्तव्य को पूरा करने में और उत्साह बढ़े ।

संत तुलसीदासजी कहते हैं :

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा ।

चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ।।

छोटे-छोटे बंदरों को भी हनुमानजी ने प्रणाम किया क्योंकि हनुमानजी में मान की इच्छा नहीं है । मान का हनन किया तभी तो वे ‘हनुमान’ हैं । हमको वे सुंदर सीख देते हैं कि सेवक को कैसे मान-मत्सर (द्वेष, क्रोध) से रहित होना चाहिए । केवल मानरहित रहेगा तो हृदय में अभिमान आ जायेगा । अतः आगे तुरंत लिख दिया कि हृदय में अपने स्वामी श्रीरामजी को धारण करके प्रसन्न होकर चले । सेवक के मन में प्रसन्नता होनी चाहिए कि ‘मैं मेरे स्वामी का सेवाकार्य कर रहा हूँ या करने जा रहा हूँ ।’ अगर समर्पण, अहोभाव एवं प्रसन्नता नहीं रखेगा तो मन में फल की इच्छा या परिणाम का भय आ जायेगा ।

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर ।

कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ।।

वहीं सागर के किनारे एक बड़ा सुंदर पर्वत था, जिस पर जाम्बवानजी के वचनों से उत्साहित हुए हनुमानजी खेल में (अनायास ही) कूदकर ऊपर चढ़ गये और उस पर से बड़े वेग से उछलकर श्रीरामजी के अमोघ बाण की तरह चले अर्थात् साधक को अपनी साधना में तीर की तरह सीधा लक्ष्य की तरफ बढ़ना चाहिए, न दायें देखे न बायें । जैसे अमोघ बाण अपने लक्ष्य को बेधकर ही रुकता है, ऐसे ही स्वामी की सेवा में सेवक को भी हमेशा सावधान और सफल होने के लिए कृतनिश्चय (निश्चय करनेवाला) होना चाहिए । ‘किसी भी कारण चूकना नहीं है’ ऐसा निश्चय मन में रखना चाहिए ।

समुद्र ने देखा कि रामजी के दूत हनुमानजी आये हैं तो विचार करके मैनाक पर्वत को कहा : ‘‘तुम श्रमहारी बन जाओ, इनको थोड़ा विश्राम दो ।’’ ऐसे ही सेवक जब सेवा करता है तो मान-सम्मान, यश मिलता है, लोग आदर-सत्कार करते हैं पर सेवक को उसमें फँसना नहीं है, रुकना नहीं चाहिए । तब क्या करना चाहिए ? हनुमानजी उदाहरण प्रस्तुत करते हैं :

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम ।

हनुमानजी ने उसका बिल्कुल तिरस्कार नहीं किया, हाथ से छुआ अर्थात् अनादर नहीं किया ।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ।

अर्थात् रामजी का कार्य पूर्ण किये बिना मेरे लिए विश्राम कहाँ !

इसी तरह अपने साध्य को पाये बिना साधक को विराम वर्जित है । राही को अपनी मंजिल पाये बिना रुकना नहीं चाहिए । साधना को बीच में रोका तो साधक कैसा और सेवक ने स्वामी का कार्य पूरा हुए बिना विश्राम किया तो वह सेवक ही कैसा ! सेवक तो अथक रूप से अनवरत सेवा करता है, यही उसकी साधना है । जो अपने कर्तव्य का प्रेमी होता है वह विश्राम नहीं करता । संत ने सीख दी है कि आराम किया तो राम छूट जायेगा । यहाँ आराम का तात्पर्य लौकिक या शारीरिक तौर पर है । मानसिक रूप से आराम करना अथवा मन के संकल्प-विकल्प को कम करके शांत व अंतर्मुख होना, आत्मा में विश्राम पाना यह तो कार्य-साफल्य की सर्वोत्तम कुंजी है । हनुमानजी भी आत्मविश्रांति पाते थे, प्रतिदिन ध्यान करते थे । ध्यान में विश्राम पाना यह तो जीवन में परम आवश्यक है । दुनियावी सुख की चाह की तो साधना छूट जायेगी । आराम करना है तो अपने-आपमें आराम करो । दूत, सेवक और साधक कैसा होना चाहिए यह बात हनुमानजी के चरित्र से प्रकट होती है । तुलसीदासजी ने सुंदरकांड में जो सुंदर सीख दी है वह सबके लिए सुखकर है ।

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A nice teaching to the servant and the Sadhak

(Shri Hanuman Jayanti: 10th & 11th April)

When Hanumanji was standing on the seashore in search of Sitaji and all the brave monkeys were thinking how to cross the ocean, Jambavan encouraged Hanumanji saying, “O Hanuman, a son of the Wind-god, you are as strong as your father and are a storehouse of intelligence, discretion and spiritual wisdom. Which task in this world is difficult for you to accomplish? It is for the service of Shri Rama that you have incarnated upon earth.”

Hanuman’s heart was greatly delighted to hear these words of Jambavan. Why? Only because Jambavan was speaking to encourage him for the service of Shri Rama. If anybody speaks to dishearten you, be sure that he is not your well-wisher. However, your action should also be in accordance with the ordinance of the scriptures and saints. One should speak to raise a person’s spirit towards pursuing Sadhana, devotional practices and accomplishing his duty. Sant Tulsidasji says:

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा ।

चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ।।

“So saying and after bowing his head to them he set out full of joy with an image of Shri Rama enshrined in his heart.”

Hanumanji bowed his head even to younger monkeys because he had no desire for honour. He is called Hanuman because he has annihilated Maan (conceit). He teaches us that the servant should be humble and free from jealousy. However, his heart would feel proud if he remains only humble. Hence, he (Tulsidasji) added at the same time: “He set out full of joy with an image of his master Shri Rama enshrined in his heart.” (One should always have the image of the master in one’s heart.) The servant’s mind should be full of joy that -I am doing or going to do the service of my master. If the servant does not keep the spirit of surrender, reverence and joy in his mind, it will develop desire for fruit (of his action) or fear of the result.

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर ।

कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ।।

“There was a beautiful hill on the sea-coast; he easily sprang onto its top.”

There was a very beautiful hill on the sea-coast. Hanumanji, encouraged by Jambavan, effortlessly sprang onto it, and from there he took a leap and sped forth in the same way as the unerring arrow of Shri Rama. This implies that the Sadhaka should advance in his Sadhana right like an arrow, straight towards his goal without looking left or right. Just as the unerring arrow stops only after piercing its target, the Sadhaka should be always vigilant and determined to succeed in the service of his master. He should resolve in his mind: “I will not fail due to any reason.”

Knowing him to be Shri Rama’s emissary, the deity presiding over the ocean said, “Relieve him of his fatigue O mount Mainaka (by allowing him to rest on you).” In the same way, when the servant serves his Master, he gets honour and fame. People respect him, but the servant should not get ensnared therein. He should not stop. Then what should he do? Hanumanji teaches by example:

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम ।

“Hanuman simply touched the mountain with his hand and then made obeisance to it.”

Hanuman did not hate it. He touched it with his hand meaning he did not disrespect it. He said:

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ।

“There can be no rest for me till I have accomplished Shri Rama’s work.”

This means, how can I rest without accomplishing Shri Rama’s work? Thus the Sadhaka is prohibited from taking rest without attaining his goal. The wayfarer should not stop until his destination is reached. What sort of a Sadhak is he who stops his Sadhana halfway? Is he a servant who rests before accomplishing his master’s work? A worthy servant serves untiringly and ceaselessly. This verily is his Sadhana. One devoted to his duty does not rest. The saint has imparted a teaching that -You will miss your goal (Rama) if you rest. Here rest means physical or worldly rest. To take rest on the mental plane or to get repose in Atman, to become calm and introverted by decreasing the Sankalpas and Vikalpas (thoughts and counter-thoughts) of the mind is the master key to success. Hanumanji too took repose in Atman. He practiced meditation every day. It is most necessary in life to be relaxed in meditation. If you desire worldly pleasures, you will miss out on Sadhana. If you want to relax, take rest in your Self. Hanumanji’s character depicts what an ideal emissary, a servant and a Sadhak should be like. The nice teaching imparted by Tulsidasji in the Sundara Kanda is the giver of happiness to one and all.

Rishi Prasad Issue-291


 

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