महाअभिनेता तो ज्ञानवान हैं
Ashram India

महाअभिनेता तो ज्ञानवान हैं

(श्रीराम नवमी : 5 अप्रैल)

भगवान रामजी सुबह नींद से उठते ही आत्मशांति में, ध्यान में मग्न हो जाते, फिर दोनों हाथ अपने मुख (चेहरे) पर घुमाते । जिस नथुने से श्वास चलता, वही पैर धरती पर रखते थे । इससे शुभ संकल्प सफल होते हैं । फिर रामजी पवित्र वस्तुओं का दर्शन करते थे । जैसे देव-दर्शन है, काँसे के कटोरे में रखे हुए घी का दर्शन है । फिर माता, पिता व गुरुदेव को प्रणाम करते थे ।

रामजी को बाल्यकाल में दीक्षा मिली, बाद में शिक्षा के लिए गुरुकुल में गये । रामजी बोलते तो सारगर्भित, मधुर व शास्त्रसम्मत बोलते थे । दूसरे को मान देनेवाली वाणी बोलते थे और अपने से छोटों का उत्साह बढ़ाते थे । चिड़चिड़ा स्वभाव रामजी का था ही नहीं । हुकूमत से नहीं, प्रेम से समझा देते थे । राजदरबार में भी कभी वैमनस्य हो जाता तो रामजी किसी एक पक्ष को यह नहीं बोलते कि ‘तुम गलत हो, यह सही है ।’ नहीं, जो सही है उनके पक्ष में रामजी उदाहरण देते, इतिहास बताते, पूर्वजनों की बात सुनाते । जो गलत होते वे अपने-आप ही उचित को समझ जाते थे ।

रामजी आदर्श भ्राता थे, आदर्श पति थे, आदर्श मित्र थे, आदर्श शासक थे और आदर्श शिष्य भी थे क्योंकि रामजी के जीवन में सब कुछ पूर्ण विकसित है और जितना जिनका ऐसा विकास होता है, उतने वे रामजी की नाईं सम्मानित होते हैं । नहीं तो षड़्यंत्र करके, छल-कपट, दाँव-पेच करके कई लोग सम्मानित होने के लिए क्या-क्या खेल खेलते हैं । रावण दाँव खेलता रहा, कोई सम्मान नहीं मिला । हर 12 महीने में दे दीयासलाई ! प्राणबल, मनोबल तो था रावण के पास लेकिन मानवीय संवेदनाएँ, भोग से उपरामता और आत्मा-परमात्मा में विश्रांति इसकी कमी थी । रामजी में यह सब विकसित था, उनका पूर्ण जीवन था ।

जब रावण सीताजी को लंका ले जाता है या लक्ष्मण मूचि्र्छत हो जाते हैं तो भगवान रामजी विलाप करते हैं, समझ के रोते हैं । ‘‘हाय लक्ष्मण ! हाय लक्ष्मण !... हाय सीते ! हाय सीते !...’’ भीतर ज्यों-के-त्यों हैं । श्रीरामचन्द्रजी के साथ उनकी छाया बने हुए लक्ष्मणजी भी श्रीराम के अभिनय को नहीं जान पाये थे ।

बालि की मृत्यु के बाद जब सुग्रीव पुनः भोग-विलास में खोकर सीताजी को लाने की सेवा भूल-सा गया था तो श्रीरामजी ने कुपित होकर कहा : ‘‘जिस बाण से बालि को मैंने भेज दिया था, वही बाण सुग्रीव के लिए पर्याप्त रहेगा । अब सुग्रीव को मैं नहीं छोड़ूँगा, चाहे ब्रह्माजी भी आ जायें सुग्रीव के पक्ष में ! सुग्रीव कल शाम का सूर्यास्त नहीं देख सकता है...’’ और भी कुछ-का-कुछ रामजी ने कुपित होकर सुग्रीव के लिए कहा ।

लक्ष्मण के रोंगटे खड़े हो गये । लक्ष्मण ने उठाया धनुष-बाण, बोले : ‘‘आप उस सुग्रीव के लिए कल परिश्रम करें तो आपके अनुज का जीवन किस काम आयेगा ? मैं अभी जाता हूँ, उस उद्दंड सुग्रीव को मौत के घाट उतारकर जल्दी आऊँगा । और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि सुग्रीव के पक्ष में ब्रह्माजी अथवा कोई भी रहें लेकिन सुग्रीव को जीवित नहीं रखूँगा !’’

रामजी तब लक्ष्मण को धीरे-से बोलते हैं : ‘‘देख लक्ष्मण ! जा और ऐसे ही जा लेकिन उसको मारना नहीं है ।’’

लक्ष्मण के पैरों तले धरती निकल गयी कि ‘जा लेकिन उसको मारना नहीं !... अभी तो इतने कोपायमान हो रहे थे मारने के लिए !’

रामजी कहते हैं : ‘‘उसको मारना नहीं और देख, उसमें दो बातें हैं : वह डरपोक है और भगोड़ा भी है । तो ऐसा नहीं भगाना कि हमारे से दूर भाग जाय । डराना लेकिन ऐसा डराना कि अपने पास आये । बालि सताता था तो वह अपने पास आया, बालि को मैंने मारा उसके कहने से लेकिन अब वह भोग-विलास में पड़ गया है । यह अष्टधा प्रकृति तो उसे नोच-नोच के कई योनियों में भटकायेगी इसलिए उसको यहाँ लाना है ।’’

हृदय में सुग्रीव के लिए कितना कल्याण छुपा है और बाहर से सुग्रीव के लिए कितनी कठोरता दिखाई दे रही है ! तो ये मुसीबतें, समस्याएँ और भय भी आपको भगवान की तरफ ले आते हैं । वे महापुरुष रोने का अभिनय करके, अपने सिर पर सब लेकर हमें जगाने की न जाने क्या-क्या कलाएँ, लीलाएँ करते रहते हैं ! नहीं तो यह टॉफी बाँटना, होली का रंग छिड़कना, प्रसाद लेना-बाँटना यह हमारी दुनिया के आगे बहुत-बहुत नीची बात है, छोटी बात है ।

संसार-ताप से तप्त जीवों को, मर्यादा भूलकर राग-द्वेष और ईर्ष्या की अग्नि में स्वयं को जलानेवाले मानव को मर्यादा से जीकर शीतलता पाने का संदेश देनेवाला जो अवतार है, वही मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामावतार है ।

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Self-realized men are the greatest actors –Pujya Bapuji

(Shri Rama Navami: 5th April)

When Lord Rama awoke in the morning he became engrossed in the inner peace and meditation. Then he moved his hands on his face. He stepped out of bed with the foot that corresponded to the active nostril. He placed that foot on the ground first. It fructifies good resolves. Then he had darshan of auspicious things such as darshan of idol of god, darshan of ghee in a bronze utensil. He then paid his respects to his mother, father and Guru.

Shri Rama received Diksha (Initiation) in his childhood; then he went to Gurukul for his education. When Shri Rama spoke, his words were pithy, sweet and in accordance with scriptures. His speech respected others and encouraged those younger than him. Lord Rama was not irritable in nature. He explained his points affectionately, not coercively. When there was altercation or dissension in the royal court, Shri Rama never told one side: “you are right or you are wrong.” He would cite examples, historical incidents and tales of ancestors in favour of the right side. The ones who were wrong would understand themselves what was right.

Shri Rama was an ideal brother, an ideal father, an ideal friend, an ideal king, and also an ideal disciple because he developed all the highest ideals of human life and as much as one has developed like Rama, one is respected like Him. Otherwise, in order to gain respect people play various dirty tricks resorting to conspiracy and treachery. Ravana played various tricks all along, but didn’t gain any respect.
Every twelve months his effigy is burnt! Ravana possessed great Life Force and mental strength but he lacked compassion, cessation from sense enjoyments and repose in Atman, Supreme Self. Shri Rama had developed all these to perfection in his life.

When Sitaji was abducted by Ravana or when Lakshmana became unconscious, Lord Rama was weeping but weeping with full understanding. He was crying, “Ha Lakshmana! Ha Lakshmana… Ha Sita! Ha Sita…” but internally he was as unperturbed as before. Even Lakshmana, who lived with Shri Ramachandraji like his shadow, could not understand His play.

After the death of Vali when Sugriva overindulged in the enjoyment of sensual pleasures, and almost forgot his duty of bringing Sitaji back, Shri Rama became enraged, and said: “The arrow with which I have sent Vali to the abode of death, that arrow is enough for Sugriva. Now, I will not spare Sugriva, even if Lord Brahma takes his side! Sugriva will not see tomorrow’s sunset.” Shri Rama said several such things angrily against Sugriva.

Lakshmana’s hair stood on end. Lakshmana picked up his bow and an arrow, and said: “If you have to make efforts towards Sugriva tomorrow, what is the use of my life? I will go now, and will put that unruly Sugriva to death, and return quickly. I will ensure that if Lord Brahma or anyone takes the side of Sugriva, I will kill him!”

Shri Rama gently said, “See Lakshmana! Go, but don’t kill him.”

Lakshmana was astonished. He said, “Go but don’t kill him! He was infuriated and wanted to kill him!”

Shri Rama said: “Don’t kill him. There are two things: He is a coward and an absconder. Don’t chase him so he runs away from us. Frighten him, but in such a way that he comes to us. When Vali harassed him, he came to us and I killed Vali per his request and now he is lost in sensual pleasures. The eight-fold Nature will maul him and will drag him through various life forms, that is why he needs to be brought here.”

How compassionate his heart is towards him and how stern he appears in outward behavior! So, these troubles, problems and fears also lead you towards God. Those great men enact crying, and take everything on their head and perform various plays and lilas to awaken us! Else the toffee distribution, spraying colours, reciting kirtan, receiving and distributing prasada, all these are very-very lowly and petty things in comparison to my world.

An incarnation that gives the message of attaining inner coolness by leading life with propriety of conduct to the jivas tormented by afflictions of samsara and to the man who burns in the fire of attachment, aversion and jealousy is the incarnation of Lord Rama, adept in propriety of conduct.

(Rishi Prasad Issue-291)


 

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