...और हरि पंडित का गर्व चूर-चूर हो गया !
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...और हरि पंडित का गर्व चूर-चूर हो गया !

(संत एकनाथ षष्ठी : 18 मार्च)


संत एकनाथजी के पुत्र हरि पंडित बड़े विद्वान और बुद्धिमान थे । कम उम्र में ही उन्होंने छहों शास्त्रों का अध्ययन पूरा कर लिया था । संस्कृत भाषा के ज्ञान के अभिमान के कारण वे एकनाथजी के मराठी ग्रंथ, कीर्तन और प्रवचन को पसंद नहीं करते थे ।
संत एकनाथजी ने गुरुकृपा से अपने स्वरूप के ज्ञान का अपरोक्ष अनुभव किया था । वे अपने पुत्र को समझाते कि ‘‘बेटे ! संस्कृत हो या प्राकृत, भगवान के लिए दोनों समान हैं । जिस वाणी से ब्रह्मकथन होता है, वे उसीसे संतुष्ट होते हैं ।’’
एकनाथजी ने ‘एकनाथी भागवत’ (2.333) में कहा है : 


प्रेमेंवीण श्रुतिस्मृतिज्ञान । प्रेमेंवीण ध्यानपूजन । 
प्रेमेंवीण श्रवण कीर्तन । वृथा जाण नृपनाथा ।।


‘परमात्म-प्रेम के बिना श्रुति, स्मृति, ज्ञान, ध्यान, पूजन, श्रवण, कीर्तन सब व्यर्थ है ।’
हरि पंडित पिता के विचारों से सहमत न होने के कारण अपनी धर्मपत्नी एवं दो पुत्रों के साथ काशी चले गये । काशी में वे विद्वानों में सर्वमान्य होकर रहने लगे । चार वर्ष बीतने पर हरि पंडित को समझाने के लिए एकनाथजी स्वयं काशी पधारे ।
हरि पंडित ने उनका बड़ा आदर किया । ‘एकनाथजी महाराज महाराष्ट— के गं्रथों पर प्रवचन न करें और दूसरों का अन्न ग्रहण न करें ।’ - इन दो शर्तों पर हरि पंडित ने पैठण चलना स्वीकार किया ।
पैठण में अब एकनाथजी के बदले हरि पंडित के प्रवचन होने लगे । एकनाथजी श्रोताओं में बैठ जाते थे । हरि पंडित विद्वान तो बहुत बड़े थे पर एकनाथजी के प्रवचन में जहाँ श्रोताओं की इतनी भीड़ होती थी कि तिल धरने की जगह न मिलती, वहाँ अब कुछ शास्त्री-पंडित ही दिखाई देते थे । हरि पंडित का हृदय अब कुछ नरम होने लगा ।  एकनाथजी यह ताड़ गये और उन्होंने सोचा कि ‘अब इसे अहंकार के ब्रह्मपिशाच से छुड़ाना चाहिए ।’
पैठण में एक स्त्री ने हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने का संकल्प किया था । कालगति से उसका पति मर गया, घर में जो कुछ सम्पत्ति थी वह भी नष्ट हो गयी और ऐसा समय आया कि उसे पेट भरने के लिए लोगों के यहाँ पानी भरने का काम करना पड़ा । पर इस हालत में भी उसकी यह इच्छा थी कि ‘सहस्र ब्राह्मण-भोजन का जो संकल्प किया है वह पूरा हो ।’
एक सुज्ञ पंडित ने उसे सलाह दी : ‘‘एक ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण को भोजन करा दो, इससे सहस्र ब्राह्मणों को भोजन कराने का पुण्य-लाभ होगा । पैठण में ऐसे ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण संत एकनाथजी के सिवाय और कौन हो सकते हैं !’’
उसने संत एकनाथजी को भोजन के लिए विनती की । उसका शुद्ध संकल्प, विनय और आग्रह देखकर तथा हरि पंडित का अभिमान चूर करने का सुअवसर जान के उन्होंने भोजन का निमंत्रण स्वीकार किया और रसोई बनाने के लिए स्वयं हरि पंडित को उसके घर भेजा । हरि पंडित ने रसोई बनायी और एकनाथजी महाराज को स्वयं परोसकर भोजन कराया । घर लौटते समय एकनाथजी हरि पंडित से बोले कि ‘‘जूठी पत्तल भी तुम्हीं उठाकर फेंक दो ।’’
हरि पंडित पत्तल उठाने लगे तो एक पत्तल के नीचे दूसरी पत्तल, दूसरी के नीचे तीसरी... इस तरह एक हजार पत्तलें निकलीं । एक सहस्र ब्राह्मणों को भोजन कराने का संकल्प इस तरह पूरा हुआ देखकर उस स्त्री के आनंद की कोई सीमा न रही और हरि पंडित का गर्व चूर-चूर हो गया ।
हरि पंडित अब समझ चुके थे कि वाक्-चातुर्य का विलास नहीं लोक-मांगल्य की सुवास महकाने में जीवन की सार्थकता है । पांडित्य नहीं परमात्म-प्रेम की जीवन में जरूरत है । लोक-प्रतिष्ठा नहीं ब्रह्मनिष्ठा मानव-जीवन की सारभूत, सच्ची उपलब्धि है ।
हरि पंडित तथा अन्य लोगों ने एकनाथजी से सत्संग के लिए प्रार्थना की । तब पैठण में पुनः संत एकनाथजी के श्रीमुख से निकली ब्रह्म-अनुभव की सरिता में लोगों के हृदय पावन होने लगे । 

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and thus Hari Pandit’s pride was humbled

(Sant Eknath Shashthi: 18th March)

Saint Eknathji’s son Hari Pandit was very intelligent and a great scholar. At a young age, he became proficient in all six shastras. Because he was proud of his proficiency in the Sanskrit language, he did not like Eknathji’s Marathi (vernacular) books, Kirtanas and discourses.

Saint Eknathji had attained the direct experience of his real Self (Self-Realisation) with his Guru’s grace. He would persuade his son: ‘Son, for God both Sanskrit and Prakrut (vernacular linguistics) are the same. He is propitiated through the enunciation of Brahman in any language.’

Eknathji stated in the ‘Eknathi Bhagavat’ (2.333):


प्रेमेंवीण श्रुतिस्मृतिज्ञान । प्रेमेंवीण ध्यानपूजन । 
प्रेमेंवीण श्रवण कीर्तन । वृथा जाण नृपनाथा ।।


“Shruti (revealed scripture in the sense of divine communication usually applied to the Vedas and Upanishads), Smriti (scriptures based on the Vedas), knowledge, meditation, worship, hearing about God, singing hymns are all useless without love for God.”

Hari Pandit did not agree with his father’s thoughts. He went to live in Kashi with his wife and two sons. In Kashi, he was deemed a highly respectable scholar and took up residence there. After 4 years, Eknathji visited Kashi to persuade Hari Pandit to return.

Hari Pandit respected him greatly. He agreed to go back with him to Paithan under two conditions. Eknathji should not deliver discourses in Maharashtrian scriptures and should not eat food prepared by others outside his home.

In Paithan, Hari Pandit’s discourses replaced Eknathji’s. Eknathji would sit within the audience. Hari Pandit was a great scholar but where Eknathji’s discourses used to attract huge crowds as no bare ground was left even to place a sesame seed, now the audience consisted of few scholars of scriptures.
Seeing this, Hari Pandit’s heart started to be humbled. Eknathji became aware of this and thought - “Now he should be ridden of the Brahmapishacha (ghost) of egotism.”

In Paithan, a woman had taken a vow to feast a thousand Brahmins. With the passage of time, her husband died, the family wealth scattered and now she would carry water pots from house to house for her subsistence. But even in these circumstances, she had a strong desire, ‘to fulfill her vow of feasting a thousand Brahmins.’

One intelligent Brahmin advised her: “If you feast a Self-realised Brahmin; you will get the same merit as feasting a thousand Brahmins. Who other than Saint Eknathji is a Self-realised Brahman in Paithan!”

She requested Saint Eknathji to dine at her place. Seeing her pure resolve, humility and insistence and also seeing an opportunity to humble Hari pandit’s pride, he accepted the invitation and sent Hari Pandit to cook the food at her house. Hari Pandit prepared and served food himself for Eknathji. When returning home, Eknathji told Hari Pandit, “Take away the leaf plates.”

As Hari Pandit started taking a leaf plate, he would see one leaf plate after another appear. He collected a thousand leaf plates. The woman’s happiness knew no bounds seeing her vow of feeding a thousand Brahmins coming true. And Hari Pandit’s pride was humbled.

Hari Pandit realised that fulfillment of life lies only in spreading the fragrance of public welfare, not in polemical proficiency. Not intelligence, but love for God is necessary. Not prestige but establishment in Brahman is the essential and true accomplishment of human life.

Hari Pandit and others then prayed to Eknathji to continue giving discourses. From then on, people’s hearts once again started becoming sanctified with holy dips in the river of the (words soaked with) experience of Brahman emanating from the auspicious mouth of Eknathji.


- Rishi Prasad Issue290


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