विवेक का फल क्या ?
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विवेक का फल क्या ?

विवेक का फल है एक निश्चय पर पहुँचना । आप सोच-विचार तो करें परंतु किसी निश्चय पर न पहुँचें तो विवेक क्या हुआ ? ‘देह असत्, अनित्य, जड़ और दुःखरूप है और इसका साक्षी मैं सत्, नित्य, चेतन और आनंदरूप हूँ’ - यह निश्चय ही विवेक है । ‘ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या है’ - यह निश्चय ही विवेक है । इस विवेक का पर्यवसान (अंत) इस निश्चय-ज्ञान में होता है कि ‘जो वस्तु बाहर से हमारे भीतर आयेगी वह निकल जायेगी । जो अभी नहीं है वह पैदा होगी और मर जायेगी । जो मैं नहीं होऊँगा वह मिलने पर बिछुड़ जायेगा । देश से पकड़कर लायी गयी वस्तु भाग जायेगी । काल में उत्पन्न वस्तु मर जायेगी ।’ अपने से अन्य वस्तु के संयोग का वियोग अवश्यम्भावी है । अतः कर्म से प्राप्त अथवा उत्पन्न प्रत्येक वस्तु के संयोग का वियोग अवश्यम्भावी है । कर्म से प्राप्त अथवा उत्पन्न प्रत्येक वस्तु, देश या काल नश्वर होगा । यह ब्रह्म के जिज्ञासु में कर्म से उत्पन्न होनेवाली सभी इहलौकिक-पारलौकिक वस्तुओं और परिस्थितियों से निर्वेद अर्थात् वैराग्य उत्पन्न करेगा । विवेक का फल वैराग्य है ।


वैराग्य माने राग-द्वेष की शिथिलता1 - न किसीसे दोस्ती और न किसीसे दुश्मनी । लेकिन वैराग्य माने क्रोध और घृणा नहीं होता । हमारे जीवन में राग-द्वेष बहुत कमजोर होने चाहिए; प्रबलता आत्मशक्ति की होनी चाहिए, राग-द्वेष की नहीं । यह होता है विवेक-निष्ठा से । देह से विविक्त (पृथक्) आत्मा और जगत से विविक्त परमेश्वर  के प्रति  निष्ठा होने से वैराग्य होता है ।


वैराग्य माने नंगा रहना, पेड़ के नीचे रहना इत्यादि नहीं होता । आपके मन में जब शांति आने लगे, तब समझना कि वैराग्य आ गया । इन्द्रियों में चंचलता कम हो जाय, मन में संशय, विपर्यय (हेर-फेर) कम हो जायें, कर्माधिक्य में रुचि कम हो जाय, जीवन में सहनशीलता बढ़ जाय, गुरु, शास्त्र, ईश्वर पर श्रद्धा, प्रीति बढ़ जाय, तब समझना कि वैराग्य का उदय हुआ है ।


अपने आत्मा के अतिरिक्त किसी भी अन्य वस्तु पर आस्था होना वैराग्य के विपरीत है । आत्मा के सिवाय ब्रह्मा-विष्णु-महेश पर भी अनास्था उत्पन्न कर अभ्यासजन्य समाधि और स्वर्ग-वैकुंठ पर भी अनास्था उत्पन्न कर देना - यह वेदांत केे वैराग्य का लक्षण है, जिससे मनुष्य आत्मनिष्ठ हो जाता है । आत्मनिष्ठ होने के लिए अन्यनिष्ठता का परित्याग करना पड़ता है ।


धर्म में, अधर्म से वैराग्य और धर्म से राग होता है । भक्ति में, ईश्वरातिरिक्त से वैराग्य और ईश्वर से राग होता है । योग में त्रिगुण के कार्यों से वैराग्य होता है । वेदांत में आत्मा के सिवाय सबसे वैराग्य होता है ।


सबके अधिष्ठान में, सबके सार में आत्म-ब्रह्म एकत्व का लाभ... जिस लाभ से बढ़कर कोई लाभ नहीं - आत्मलाभात् परं लाभं न विद्यते । जिस ज्ञान से बढ़कर कोई ज्ञान नहीं - आत्मज्ञानात् परं ज्ञानं न विद्यते । जिस सुख से बढ़कर कोई सुख नहीं - आत्मसुखात् परं सुखं न विद्यते ।

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1. किं नाम वैराग्यम् ? अदृढरागद्वेषवत्वम् ।

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What is the Fruit of Viveka?

Viveka or discrimination (between the real and the unreal) helps you to reach a conclusion. If you fail to arrive at a conclusion even after deliberating extensively, how can you call viveka? ‘The body is unreal, transient, insentient, and pain giving; while I, the witness thereof, am real, eternal, consciousness and bliss personified.’ –this conviction itself is viveka. ‘Brahman is real and the universe is mithya (it cannot be categorized as either real or unreal).’ –this conviction alone is viveka. This viveka culminates into the decision or determination that ‘Things that would come into us from outside will eventually go out. That which does not exist at present will be born and then die. If I attain anything other than myself it will get separated from me after attaining. Anything brought from ‘space’ will flee while anything born in ‘time’ will die.’ Union with anything other than oneself is bound to get severed (disconnected). Thus, union with anything attained or created by action is bound to be disconnected. Every object, space and time attained or created by action will be perishable. From this (discrimination) dispassion towards all objects and conditions of this world and the other produced by action will be born in the aspirants of Brahman. The fruit of viveka is dispassion.


Dispassion means mildness of attachment and aversion – neither friendship nor enmity with anybody. However, dispassion doesn’t mean anger or disgust as such. Attachment and hatred should be very weak in our life. We should be strong in Self-force, not attachment and aversion. This is achieved through devotion to viveka. Devotion to Atman not identified with the body and devotion to God not identified with the universe gives rise to dispassion.


Dispassion doesn’t mean asceticism marked by wearing no clothes, or living under a tree etc. When your mind starts getting peace, be sure of having attained dispassion. When restlessness of your senses is diminished, when your mind becomes almost free from doubts and misconceptions, when your interest in increasing desire oriented actions is reduced, when you develop forbearance in your life, when your faith in Guru, Shastra and Ishwara keeps increasing, be sure of having attained of dispassion.


Having faith in anything other than one’s own Self is contrary to dispassion. Dispassion of Vedanta is characterized by disbelieving all except one’s Self including even Brahma, Vishnu and Shiva and Samadhi attained by practice of Yoga and heaven, Vaikuntha (the abode of Vishnu) etc. which makes the man established in the Self. In order to develop Atmanishtha one has to renounce fixity or steadiness in others.


With the practice of Dharma, one develops dispassion towards Adharma (unrighteousness) and attachment towards righteousness. With the practice of devotion, one develops dispassion towards everything other than God, and love for Him alone. With the practice of Yoga one develops dispassion towards all effects caused by the three Gunas (Sattwa, Rajas & Tamas). With the practice of Vedanta one becomes dispassionate towards everything except Atman.


One attains the highest gain of the identity of Atman and Brahman in the substratum of all, the essence of all. There is no gain greater than that of Atman.  आत्मलाभात् परं लाभं न विद्यते । There is no knowledge higher than that of Atman. - आत्मज्ञानात् परं ज्ञानं न विद्यते । There is no bliss superior to that of Atman. - आत्मसुखात् परं सुखं न विद्यते ।

ऋषि प्रसाद अंक-290

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