How much grateful we should be towards Self-realized great men!
Ashram India

How much grateful we should be towards Self-realized great men!

ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों का तो कितना-कितना आभार मानें !

- पूज्य संत श्री आशाराम बापूजी

सब एक ही चीज चाहते हैं, चाहे हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी हों, इस देश के हों चाहे दूसरे देश के हों, इस जाति के हों या दूसरी जाति के हों । मनुष्य जाति तो क्या, देव, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, भूत, पिशाच भी वही चाहते हैं जो आप चाहते हैं । लक्ष्य सभीका एक है । प्राणिमात्र का लक्ष्य एक है, चाह एक है कि ‘सब दुःखों की निवृत्ति और परमानंद की प्राप्ति ।’ साधन भिन्न-भिन्न हैं क्योंकि गलतियाँ भिन्न-भिन्न हैं । कोई सोचता है कि ‘खाने-पीने से सुखी होऊँगा’, कोई बोलता है : ‘धन इकट्ठा करने से सुखी होऊँगा’, कोई यह सोचता है कि ‘सत्ता मिलेगी तब सुखी होऊँगा’ लेकिन आद्य शंकराचार्यजी कहते हैं :

शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं

यशश्चारु चित्रं धनं मेरुतुल्यम् ।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ।।

‘यदि शरीर रूपवान हो, पत्नी भी रूपसी हो और सत्कीर्ति चारों दिशाओं में विस्तरित हो, मेरु पर्वत के तुल्य अपार धन हो किंतु गुरु के श्रीचरणों में (उनके सत्संग, सेवा व आत्मानुभव में) यदि मन आसक्त न हो तो इन सारी उपलब्धियों से क्या लाभ ?’

संत तुलसीदासजी कहते हैं :

गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई ।

जौं बिरंचि संकर सम होई ।।

ब्रह्माजी जैसा सृष्टि पैदा करने का सामर्थ्य हो जाय, शिवजी जैसा प्रलय का सामर्थ्य हो लेकिन जब तक सद्गुरु का, ब्रह्मवेत्ता गुरु का सान्निध्य न मिले तब तक यह भवनिधि, संसार-सागर तरना असम्भव है ।

लख प्याला भर-भर पिये, चढ़े न मस्ती नैन ।

एक बूँद ब्रह्मज्ञान की, मस्त करे दिन-रैन ।।

वह ब्रह्मज्ञान की मस्ती जब तक नहीं आयी तब तक अनेक-अनेक साधन जुटाते हैं दुःखों की निवृत्ति के लिए, अनेक-अनेक साधन जुटाते हैं सुखों को थामने के लिए लेकिन लक्ष्य की खबर नहीं । उद्देश्य तो सबका एक है, लक्ष्य तो सबका एक है लेकिन लक्ष्य के साधन की खबर नहीं । लक्ष्य के साधन की जिनको खबर है उनको सद्गुरु कहते हैं ।

जीव कीड़ी से लेकर कुंजर (हाथी) तक की योनियों में, मनुष्य से लेकर देव, गंधर्व, यक्ष आदि तक की योनियों में भटका किंतु उसे अपने लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हुई, अपने उद्देश्य की पूर्ति नहीं हुई ।

ऐसे समस्त प्राणियों को उद्देश्य की पूर्ति का ज्ञान दिलाने की जिन्होंने व्यवस्था की ऐसे भगवान व्यासजी के नाम से यह आषाढ़ी पूनम व्यासपूर्णिमा के नाम से मनायी जाती है । ज्ञान कुल-परम्परा से एक से दूसरे की ओर बढ़ाया जाता है । पिता पुत्र को अपनी कुल-परम्परा का ज्ञान देता है, शिक्षक विद्यार्थी को शिक्षा देता है और सद्गुरु सत्शिष्य को अपना ब्रह्मज्ञान, ब्रह्मरस देते हैं । ऐसा ब्रह्मसुख का मार्ग देना और उस मार्ग की विघ्न-बाधाओं को दूर करने की युक्तियाँ देना और बल भरना यह कोई साधारण व्यक्ति का काम नहीं है, ब्रह्मज्ञानी आचार्य का काम है । भगवान वेदव्यास ज्ञान के समुद्र होने के साथ-साथ भक्ति के आचार्य हैं और विद्वत्ता की पराकाष्ठा हैं । ज्ञान तो ब्रह्मज्ञान...

ज्ञान मिड़ई1 ज्ञानड़ी2, ज्ञान तो ब्रह्मज्ञान ।

जैसे गोला तोप का, सोलह सौ मैदान ।।

दुनिया के तमाम ज्ञान ब्रह्मज्ञान के आगे नन्हे हो जाते हैं । पेटपालू हैं अन्य सारे ज्ञान; वे नश्वर शरीर के हैं एवं उसे जिलानेमात्र के हैं लेकिन शाश्वत ज्ञान क्या नश्वर शरीर को मार देगा ? नहीं । शाश्वत ज्ञान का मार्ग नश्वर शरीर को भी स्वस्थ, सुखी और सम्पन्न रखेगा क्योंकि शाश्वत ज्ञान सुमति का तो भंडार है ।

व्यासपूर्णिमा मनाने के दो पहलू

व्यासपूर्णिमा भगवान व्यासजी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का हमें स्मरण कराती है । जो तुच्छ संसार की चीजें देते हैं उनका भी अगर आभार नहीं मानते हैं तो कृतघ्नता का दोष लगता है तो ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों का तो कितना-कितना हम आभार मानें ! जितना भी मानें उतना कम है । व्यासपूर्णिमा मनाने के दो पहलू हैं, दो दृष्टिकोण हैं । एक तो ऐहिक, स्थूल दृष्टि से देखा जाय कि जिन्होंने हमारे लिए खून-पसीना एक किया, दिन-रात एक करके जिस परमात्मा को पाया, परमात्म-तत्त्व में जगे, उस परमात्म-तत्त्व की समाधि, ज्ञान, माधुर्य का परमानंद छोड़कर जन-जन के लिए न जाने कितने-कितने शास्त्रों, कितने-कितने उपायों एवं दृष्टांतों का सार निकाल के और कितना कुछ करके हमको इतना उन्नत किया, हम उनके प्रति कृतघ्नता के दोष से दब न मरें इसलिए हम कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए यह महापर्व मनाते हैं ।

दूसरा आंतरिक रूप है कि वर्षभर में जो साधन-भजन हमने किये हैं, जो नश्वर के आकर्षण से बचकर शाश्वत की प्रीति की यात्रा की, उसमें जो कुछ उपलब्धियाँ हुईं उनसे आगे अब नया पाठ... जैसे विद्यार्थी हर साल कक्षा में आगे बढ़ता है ऐसे ही साधक को साधना में आगे बढ़ने के कुछ संकेत, कुछ शुभ संकल्प, शुभ भाव, शुभ उपाय, कुछ बढ़िया साधन मिल जायें । जैसा संग होगा ऐसा अंतःकरण को रंग लगेगा । तो बार-बार उन सत्पुरुषों का संग करना चाहिए ।

इस गुरुपूनम का संदेश है कि गुरु के ज्ञान में चित्त को शांत करने का अभ्यास कीजिये । अग्नि में प्रवेश कर लिया तब भी वह काम नहीं होगा । स्वर्ग में प्रवेश कर लो चाहे प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति अथवा विश्वपति - किसी भी पद पर पहुँच जाओ फिर भी दुःख की अँधेरी रात नहीं मिटेगी, मृत्यु का भय नहीं जायेगा । जब तक आप गुरु-तत्त्व में स्थिर होने का अभ्यास नहीं करोगे तब तक आपके जीवन में साम्य विद्या3 नहीं आयेगी और ‘सब दुःखों की सदा के लिए निवृत्ति और परमानंद की प्राप्ति’ - यह जीवन की माँग पूरी नहीं होगी ।

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1. सभी 2. नन्हे ज्ञान 3. सदा समत्व में रहने की कला सिखानेवाली विद्या

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How much grateful we should be towards Self-realized great men!         

– Pujya Bapuji

Everyone wants one thing, irrespective of being a Hindu, a Muslim, a Christian, a Zoroastrian or a Jew; a citizen of this nation or the other; a person belonging to this race or the other. Not just humans but Yakshas, Gandharvas, Kinnaras, Bhutas, Pishachas also want the same thing that you want. Everybody has the same goal. Every living being has the same goal, the same desire that is the removal of all kinds of pain and the attainment of Supreme Bliss. They seek it through different means because mistakes are different. Someone thinks that he or she would be happy by eating and drinking. Someone says, ‘I would be happy by accumulating wealth.’ Someone thinks, ‘I shall be happy when I get political power’, But Adi Shankaracharya says:

शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं

यशश्चारु चित्रं धनं मेरुतुल्यम् ।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ।।

“One may have a handsome form, a fair wife, vast fame and wealth as immense as mount Meru. But what purpose do all these serve if one’s mind is not attached to the Lotus-Feet of the Guru?”

Saint Tulsidas says:

गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई ।

जौं बिरंचि संकर सम होई ।।

“Without a Guru, none can cross the ocean of Transmigration though he may be the equal of Brahma (the Creator) or Lord Shiva.”

As long as one does not have the proximity of a SatGuru, a Self-realized one, it is impossible for him to cross the ocean of Samsara (Transmigration) though one may obtain the power to create the universe, like Brahmaji or the power to destroy the world like Lord Shiva.

लख प्याला भर-भर पिये, चढ़े न मस्ती नैन ।

एक बूँद ब्रह्मज्ञान की, मस्त करे दिन-रैन ।।

“The kind of ecstasy one gets from just one drop of Brahma Jnana cannot be matched, even with limitless drinks put together.”

Until and unless people attain that intoxication of Brahma Jnana, they accumulate many means to remove pains; they accumulate many things to perpetuate joy, but they have no idea about their goal. Everyone has the same objective, everyone has the same goal, but no one knows the path or means to attain that goal. One who knows the path to that goal is called SatGuru.

The jiva wanders from the species of an ant to an elephant, from man to that of deva, Gandharvas, Yakshas but it doesn’t achieve its goal, it can’t accomplish the objective.

The Purnima (full moon day) that falls in the month of Aashadha, is celebrated as Vyasa Purnima which is named after Bhagavan Vyasaji, who made an arrangement for imparting the knowledge to all living beings about the accomplishment of their objective. Knowledge is handed down from one generation to another, through the Kula Parampara (lineage). A father gives the knowledge of his family tradition to his son, a teacher imparts education to his student and a SatGuru imparts his knowledge of Brahman, bliss of Brahman to his true disciple. To show the path of Brahmic bliss and the techniques to overcome obstacles on the way and to infuse power, is not work of an ordinary person; only a Self-realized Acharya can do it. Lord Veda Vyasa is not just an ocean of knowledge, but also an eminent preceptor of the path of bhakti (devotion) and the pinnacle of erudition. The true knowledge is the knowledge of Brahman.

ज्ञान मिड़ई1 ज्ञानड़ी2, ज्ञान तो ब्रह्मज्ञान ।

जैसे गोला तोप का, सोलह सौ मैदान ।।

The knowledge of all subjects is petty as compared to the vast knowledge of Brahman. Knowledge about all worldly sciences becomes small in comparison to the knowledge of Brahman.

All other knowledge is for managing to live decently, it is only for the mortal body, for sustaining the life. Would eternal knowledge kill the mortal body? No. The path of eternal knowledge will keep the mortal body healthy, happy and thriving, since eternal knowledge is the repository of wisdom.

Celebrating the Vyasa Purnima from two viewpoints

Vyasa Purnima reminds us to express our gratitude towards Bhagavan Vyasaji. Even if we do not express gratitude towards people who give us petty worldly things, we incur the sin of ingratitude; so how much grateful we should be towards Self-realized great men! As much as we can, it is not enough. There are two viewpoints to celebrating Vyasa Purnima, there are two imports. First, if we look at it from a temporal viewpoint, to save ourselves from the sin of ingratitude, we celebrate this grand festival to express our gratitude to the great man who toiled ceaselessly for us. Who elevated us so much by finding so many ways and the essence of so many shastras and citations and doing so many things, for uplifting commoners, leaving the Supreme Bliss of Samadhi of the Supreme Truth, Supreme Self that he attained and got awakened into, through constant spiritual practice.

Secondly, the spiritual import of this festival is this. To get a new course for the next year beyond the attainments of spiritual discipline and devotional practices that we performed in the past year by avoiding the allurements of the perishable for doing journey for the love of the eternal. A sadhaka can grow like a student who enters the next class every year to get some clues, some auspicious resolves, good bhava, and some better means. The mind of sadhaks is affected by the mentalities of others with whom they come into contact, in whose company they are. So we should keep ourselves in the company of Self-realized men again and again.

The message for this Guru Purnima is that you should practice to steady your mind in the knowledge imparted by Guru. Even if you enter into fire (agni), it won’t help. Whether you enter heaven or become Prime Minister, President or world leader – whatever position you get, still the dark night of grief will not vanish; the fear of death will not go away. Unless and until you practice to remain steady in Guru Tattva, your life will not shine with the knowledge of equanimity; and the demand of your life, that is the removal of all kinds of pain for ever and attainment of Supreme Bliss, will not be satisfied.


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