माँ महँगीबाजी का आज्ञापालन और ब्रह्मनिष्ठा
Ashram India

माँ महँगीबाजी का आज्ञापालन और ब्रह्मनिष्ठा

(ब्रह्मलीन मातुश्री श्री माँ महँगीबाजी का महानिर्वाण दिवस : 15 अक्टूबर)

हमारी संस्कृति में संसारी रिश्तों (शरीर के नाते-संबंधों) से बढ़कर आत्मिक रिश्तों (परमात्मा के नाते माने गये संबंधों) का आदर है, ज्ञान का आदर है । यही हमारी संस्कृति की महानता है ।

हमारे देश में ऐसे भी सौभाग्यशाली मनीषी हुए हैं जिन्होंने अपने रिश्तेदारों में किसीको ब्रह्मवेत्ता पाया तो शरीर के रिश्ते को किनारे रखते हुए उन महापुरुष का शिष्यत्व प्राप्त कर आत्मा का ज्ञान पाया । संत ज्ञानेश्वरजी ने अपने बड़े भाई योगी निवृत्तिनाथजी को गुरु मानकर पूर्णता की अनुभूति की थी । श्वेतकेतु ने अपने पिता उद्दालक ऋषि से ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य के उपदेश से ब्रह्मज्ञान पाया । इसमें भी ज्ञान के आदर की पराकाष्ठा तब देखने को मिलती है जब एक माँ अपने उन ब्रह्मवेत्ता पुत्र को, जिनका उसने बाल्यकाल में अपने हाथों लालन-पालन किया था, सद्गुरुरूप में स्वीकार कर ब्रह्मविद्या से पूर्णता को पा लेती है । इसका उदाहरण हैं माता देवहूति, जिन्होंने अपने पुत्र कपिल मुनि से ब्रह्मविद्या पायी । और ऐसी माताओं में पराकाष्ठा की भी पराकाष्ठा तब प्रकट हो जाती है जब कोई माँ, जो अपने पुत्र के बाल्यकाल में उसकी भक्तिमार्ग की गुरु भी हो, वही माँ पुत्र के ब्रह्मवेत्ता हो जाने पर ब्रह्मविद्या एवं अपने मनुष्य-जन्म का परम आदर करते हुए अपने ही पुत्र की शिष्या हो के अपनी अंतिम साँस तक उनके हर एक शब्द को गुरुआज्ञा के रूप में सिर-आँखों पर रख ब्रह्मज्ञान को उपलब्ध हो जाती है । जानते हैं ऐसी माँ कौन थीं ? ऐसी माँ थीं पूज्य बापूजी की मातुश्री ब्रह्मलीन श्री माँ महँगीबाजी ! विश्व-इतिहास में ऐसी दूसरी माँ हमारे देखने-सुनने में नहीं आयीं ।  

माँ महँगीबाजी का जीवन ईश्वरप्राप्ति के पथ पर चलनेवाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक ऐसा आदर्श चरित्र है जिसका अनुगमन कर वह आसानी से पूर्ण गुरुकृपा का अधिकारी बन सकता है । एक बार जेठानंदजी (अम्माजी के बड़े पुत्र) अम्माजी को कुछ दिनों के लिए अपने घर ले जाने के लिए आये । पहले तो अम्माजी ने साफ मना कर दिया क्योंकि बापूजी से दूर जाना अम्माजी को बिल्कुल पसंद नहीं था और आश्रम के जप-ध्यान के अनुकूल सात्त्विक, साधना-सेवामय वातावरण में अम्माजी का जीवन ढल चुका था । मगर जेठानंदजी अम्माजी को बहुत आग्रह करने लगे कि ‘‘आप तो हम दोनों की माँ हैं, आपके लिए हम दोनों एक समान हैं तो फिर मेरे घर रहने क्यों नहीं आतीं ?’’

अम्माजी बापूजी से पूछे बिना कभी कोई भी फैसला नहीं लेती थीं । अतः जेठानंदजी को उत्तर देने से पहले अम्माजी पूज्यश्री के पास जाकर बोलीं : ‘‘साँईं ! जेठानंद मुझे अपने घर कुछ दिनों के लिए ले जाना चाहता है ।’’

बापूजी ने पूछा : ‘‘क्या आप जाना चाहती हैं ?’’

अम्माजी : ‘‘वैसे तो मैं बिल्कुल नहीं जाना चाहती लेकिन दुनियादारी के हिसाब से जाना उचित रहेगा ।’’

संसारी मोह में फिसलते उनके मन को देखकर बापूजी ने कहा : ‘‘अम्मा ! क्या रखा है इस मोह-ममता में ? आप तो ईश्वर में मन लगाओ ।’’

कुछ रुककर गुरुदेव बोले : ‘‘देखो ! मेरे पास रहोगी, साधना में रत रहोगी तो जिम्मेदारी मेरी रहेगी ।’’

निर्मल एवं सूक्ष्म आध्यात्मिक मतिसम्पन्न अम्माजी ‘जिम्मेदारी’ शब्द से बापूजी के वचनों का इशारा तुरंत ही समझ गयीं और उन्होंने उसी समय जेठानंदजी को मना कर दिया । मोह का रिश्ता, जो स्वयं व अपने नाते-रिश्तेदारों को भी सच्चे सुख से विमुख कर मोह में फँसा देता है, उसे आदर्श साधिका अम्माजी ने ईश्वरप्राप्ति के लक्ष्य के आगे गौण कर दिया और परम हितकारी, सर्वमांगल्यकारी ईश्वरीय रिश्ते को सर्वाधिक महत्त्व दिया, शिरोधार्य किया और उसके बाद जीवनभर कभी गुरुद्वार छोड़ने का सोचा तक नहीं । (इसका फल उन्हें क्या मिला, पढ़ें इस लेख के अंत में)

कितनी पराकाष्ठा का आज्ञापालन था अम्माजी का ! परमात्मप्राप्ति के प्रति दृढ़ लक्ष्यनिष्ठ अम्माजी ने ‘अग्या सम न सुसाहिब सेवा’ इस शास्त्र-वचन को अपने जीवन में पूर्ण चरितार्थ कर दिखाया । इसीका सुपरिणाम था कि अम्माजी के जीवन में ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ इस परमोच्च वेदांत-ज्ञान के प्रति निष्ठा के फूल खिले ।

‘जगत है ही नहीं...’

पूज्य बापूजी अम्माजी को याद करते हुए उनका एक संस्मरण बताते हैं :

एक बार मैंने पूछा : ‘‘अम्मा ! क्या हाल है ?’’

अम्मा : ‘‘हाल क्या ! जगत है ही नहीं, जगत बना ही नहीं, यह सब सपना है ।’’

‘‘यह कैसे ? तुम्हारा बड़ा बेटा पैदा हुआ, उसके बच्चे हुए, वह अस्वस्थ हुआ, उसने शरीर छोड़ा... फिर जगत क्यों नहीं है ? बड़ी ब्रह्मज्ञान की बात करती हो !’’

‘‘जैसे हुआ वैसे ‘नहीं हुआ’ हो गया । अब तो केवल बोलते हैं, अभी है तो नहीं । कहाँ आया, कहाँ जिया, कहाँ समाप्त हो गया, सब ऐसे ही तो है ! केवल एक आत्मा है, जगत है ही नहीं ।’’

मैंने कहा, ‘वाह !’

ऐसा नहीं कि केवल शब्द हों, नहीं, दबंग होकर बोलती थीं । जो उपदेश मुझे देना चाहिए वह मेरी माँ मुझे सुना रही हैं । पीड़ा होती तो बोलतीं : ‘‘यह तो शरीर को होती है । मैं तो मुक्तात्मा हूँ, ब्रह्म हूँ । जगत है ही नहीं । ॐ... ॐ... आनंद... आनंद...’’ अम्मा का व्यवहार देख के मुझे बहुत प्रसन्नता होती थी ।

एक बार मैंने कहा : ‘‘अम्मा ! चलो मोटेरा । वहाँ सब माइयाँ याद करती होंगी तुमको ।’’

‘‘मुझे नहीं, शरीर को याद करेंगी । उधर रहती हूँ तो सारा दिन ‘अम्मा ! ऐसा हुआ, अम्मा ! ऐसा हुआ...’ करती रहती हैं । मेरे शरीर के आगे ‘अम्मा ! अम्मा !...’ करती रहती हैं । अरे, क्या अम्मा ! अम्मा !... जगत है ही नहीं ।’’

हमको तो सुनकर बहुत अच्छा लगा ।

...ऐसी कभी फरियाद नहीं की

पूज्य बापूजी यह भी बताते हैं कि ‘‘जब मैं घर छोड़कर चला गया था तो मेरी माँ ने ऐसा नहीं कहा कि ‘हाय-रे-हाय ! जीवनभर जिसके लिए इतना सब कुछ किया, उस बेटे ने मुझे सुख नहीं दिया... मेरा क्या होगा !’ ऐसी कभी फरियाद नहीं की । हाँ, एक बात कहती थीं कि ‘मेरा बेटा क्या खाता होगा ? नाश्ता उसको मिलता होगा कि नहीं ?’ ऐसा चिंतन करके कभी-कभार थोड़ा-सा दुःखाभास होता था । हम जब गुरुकृपा पाकर 7 वर्ष की साधना के बाद गुरुआज्ञा से घर आये तो उनका रुख फरियाद का नहीं था ।

जो मंजिल चलते हैं वे शिकवा नहीं किया करते 

जो शिकवा किया करते हैं वे मंजिल नहीं पहुँचा करते ।।

तब से माँ का मेरे प्रति आदरभाव हो गया । वे मुझे पुत्र के रूप में नहीं देखती थीं वरन् जैसे कपिल मुनि की माँ उनको भगवान के रूप में, गुरु के रूप में मानती थीं, वैसे ही मेरी माँ मुझे मानती थीं ।

अम्माजी ने अमरता को पा लिया

जब शरीर छोड़ने का समय आया तो आखिरी 3 दिन अम्मा ने न तो अन्न-जल लिया, न किसीसे मेलजोल, न कोई बातचीत की । सबसे उपराम होकर केवल भगवान के चिंतन, भगवान की गहराई में डूबी रहीं ।’’

जब अम्माजी का शरीर छोड़ने का समय आया तब उन्होंने पूज्यश्री को उस बात का स्मरण दिलाया कि ‘‘साँईं ! आपने कहा था कि ‘मेरे पास रहोगी, साधना में रत रहोगी तो आपकी जिम्मेदारी मेरी ।’ देखा, उसके बाद मैं कभी नहीं गयी, जेठा ही मुझसे मिलने आता था ।’’ अम्माजी के ये वचन सुनकर बापूजी ने करुणार्द्र हो प्रसन्नताभरी मंद मुस्कान के साथ हामी भरी । अम्माजी ‘गुरुआज्ञापालन योग’, ‘गुरु-वचन पालन योग’ द्वारा ‘गुरुभक्तियोग’, ‘गुरुकृपायोग’ के पूर्ण फल को पाकर कृतकृत्य, आत्मनिष्ठ हो गयीं ।

पूज्यश्री : ‘‘और माँ ने अंत में शरीर का त्याग करके अपनी अमरता को पाया । माँ ने दिल्ली के एकांत आश्रम में सुबह के समय शरीर छोड़ा ।’’

अम्माजी गुरुआज्ञा-पालन में तत्पर रहीं और बाहरी बड़प्पन से बचीं तो ऐसी ऊँचाई पर पहुँच गयीं जो बड़े-बड़े योगियों को भी दुर्लभ है ! उनका पावन, पुण्यमय स्मरण करके हम भी धनभागी हो रहे हैं ।

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Obedience and Brahmanishtha of Ma Mahengibaji

(Mahanirvana Day of Brahmalina Matushri Shri Ma Mahengibaji: 15th October)

In our culture, relationships established for the attainment of the Supreme Self are held in higher esteem than familial relationships. It is due to respect of knowledge. This verily is the greatness of our culture.

In our country, there have also been fortunate wise people who, on seeing any of their relatives, a Knower of Brahman (Self-realized), attained Self-Knowledge by becoming a disciple of that great man, leaving behind the bodily relationship. Saint Jnaneshwarji, by regarding his elder brother Yogi Nivrittinathji as (his) Guru, attained Direct Realization of Absolute Brahman. Shvetaketu attained realization of Brahman by hearing the instruction on the Great Saying ‘Thou Art That’ from his father Uddalaka Rishi. Even amongst the aforementioned, the height of respect for Knowledge (of the Self) is seen in the case wherein a mother attains Self-knowledge from her Self-realized son, who was brought up personally by her in childhood, by accepting Him as her Guru. One of such examples is – Mother Devahuti, who attained the Knowledge of the Self from her son – sage Kapila. And the height of the heights amongst such mothers is seen when a mother, who, during the childhood of her son, has been his Guru of Bhakti Marga (the path of devotion); on her son’s attaining Self-Realization, becomes his disciple by respecting the science of Brahman and human birth, attains Self-Realization by accepting every single word of the latter as Guru’s behest till her last breath. Do you know who was such a mother? She was none other than Pujya Bapuji’s revered mother – Brahmalina Matushri Shri Ma Mahengibaji! Another such mother hasn’t so far been found in world history.

The life of Pujya Bapuji’s Matushri – Shri Ma Mahengibaji is such an ideal character for every individual treading the path of God-Realization, that by following in her footsteps, one can easily become eligible for receiving the Complete Grace of the Guru. One fine day, Jethanandji (Ammaji’s eldest son) arrived at the ashram to take her home for few days. Initially Ammaji refused bluntly, as she did not like to be away from Bapuji at all, and secondly, her life was already adapted to the ashram’s sattvik (i.e. pure) environment charged with the vibrations of sadhana and selfless-
service. But Jethanandji started insisting to Ammaji saying – “You are mother to both of us; and when we both are coequal to you, why won’t you come along to my place?”

Ammaji would never take any decision without asking Bapujii. Hence, before giving a reply to Jethanandaji, she went to Bapuji and said: “Sai! Jethanand wants to take me home for a few days.”

Bapuji asked: “Do you want to go?”

Ammaji: “Actually, I don’t want to go at all, but for worldly dealings it would be appropriate to go for a few days.”

Noticing her mind was becoming enticed by worldly attachment, Bapuji said: “Amma! What’s so valuable in this attachment and sense of ‘mine’? Better you set your mind on God instead.”

After a short pause, Gurudev said: “Look! If you live close to me, and engage yourself in sadhana, it will be my responsibility.”

In no time, Ammaji, endowed with pure and subtle spiritual insight, figured out the message that Bapuji intended to convey via the word ‘responsibility’, and refused Jethanandji’s proposal. Thus, an ideal aspirant, Ammaji gave the utmost importance to the most benedictory and salutary relation, i.e. that with the God; and preferred it over a worldly relationship which deprives one, along with one’s relatives from real happiness and entangles them in delusion. She didn’t even think of leaving Guru’s place thereafter. (The benefit that she reaped from this is mentioned at the end of this article).

Such was the height of Ammaji’s obedience to the commands of her Guru! Firmly determined towards the goal of Self-realization, Ammaji perfectly exemplified the words of the scriptures:  Aagya sama na susahib sewa (there is no service comparable to that of following Guru’s commands) in her life. As a good outcome of this very fact, Ammaji’s life blossomed with the flowers of steadfastness in the highest knowledge of Vedanta– Brahma satyam; jagan mithya’, i.e. ‘Brahman is real. The universe is unreal.’

The world doesn’t exist at all…

Reminiscing Ammaji, Pujya Bapuji narrates one of her incidents below:

Enquiring about her well-being, I once asked: “Amma! How are you doing?”

Amma: “What well-being! The world doesn’t exist at all, it hasn’t ever come into existence; it’s all a dream.”

(Bapuji): “How come? Your eldest son was born; he then fathered children, fell sick and then left his physical body; then how come you say that the world doesn’t exist? You are bragging about Brahma Jnana!”

Ammaji: “The way it appeared (to have occurred), it has disappeared (become ‘non-existent’). We are now just talking about him. Does he exist now? His coming, living and dying are nowhere to be found. All is like this! There is only Atman (the Self) that exists; the world doesn’t exist at all.”

(Bapuji): I said: ‘Wow!’

It’s not that these were mere words, she was speaking boldly. She was in fact telling me what I was supposed to instruct her in. While in pain, she’d say: “It’s the body that suffers. I am ever free, Atman, I am Brahman. The world doesn’t exist at all. Aum… Aum… Bliss… Bliss….” I used to be very pleased with Amma’s behaviour.

One fine day, I said: “Amma! Let’s go to Motera. All mothers there must be remembering you.”

Amma: “It’s not me, but this body that they will remember. While I am there, they will nag me, saying – ‘Amma! This happened; Amma! That happened….’ But it’s only to my body (i.e. my physical being) that they address– ‘Amma! Amma!...’. Who is Amma?...’ the world doesn’t exist.”

I was quite pleased hearing this.

Never complained…

Pujya Bapuji also shares (about Himself): “When I left home (in search of God), my mother never complained ‘Oh my God! The very same son, for whom I’ve done so much all through my life, hasn’t brought (any) happiness to me… what will happen to me!’ Though she would ask – ‘What would my son be eating? Would he be getting breakfast?’ Thinking about this, she would get a bit worried at times. But when I came back home on Guru’s behest, having completed
7 years of sadhana (intense spiritual discipline) after receiving Guru’s grace, she didn’t complain at all.

जो मंजिल चलते हैं वे शिकवा नहीं किया करते ।

जो शिकवा किया करते हैं वे मंजिल नहीं पहुँचा करते ।।

“Those who walk towards the goal, never complain; And those, who complain, never achieve the goal.”

Since then my mother started showing respectful attitude towards me. She wouldn’t consider me as her son; instead, she’d consider me the way Kapil Muni’s mother would consider him, as God, or the Guru.”

Ammaji attained Immortality

When Ammaji was counting the last 3 days of her life, she didn’t take any food or water, nor did she meet or speak to anyone. Being detached from everyone, she did nothing but remain immersed in contemplation of God, in the depth of divine consciousness.

And when Ammaji was about to leave her body, she reminded Pujyashri of the event (when I had stopped her from leaving), saying – “Sai! You told me– ‘If you live close to me, and engage yourself in sadhana, I will bear your responsibility.’ Look, ever since I didn’t leave, it was Jetha who used to come to see me.” Hearing these words of Ammaji, Bapuji, overcome by compassion, acknowledged with a cheerful mild smile. Thus, Ammaji, by means of the yoga of ‘Obedience to the commands of Guru’, reaped full benefit of ‘Guru-Bhakti Yoga’ and ‘Yoga of Guru’s Grace’ and thus became accomplished in the supreme goal, and got established in the Self.

Pujyashri: “Mother attained Immortality after leaving her body. She left her body during the early hours, in Delhi’s secluded ashram.”

Ammaji always obeyed Guru’s commands promptly and diligently. And by saving herself from outward greatness she attained such a lofty height that is difficult for even great Yogis to attain. And even we are feeling blessed by her sacred remembrance.

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