शव-देह से शिव-तत्त्व की ओर...
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शव-देह से शिव-तत्त्व की ओर...

महाशिवरात्रि : 13 फरवरी

सत्यं ज्ञानं अनन्तस्य चिदानन्दं उदारतः ।

निर्गुणोरूपाधिश्च निरंजनोऽव्यय तथा ।।

शास्त्र भगवान शिव के तत्त्व का बयान करते हुए कहते हैं कि शिव का अर्थ है जो मंगलमय हो, जो सत्य हो, जो ज्ञानस्वरूप हो, जिसका कभी अंत न होता हो । जिसका आदि और अंत है, जो बदलनेवाला है वह शिव नहीं, अशिव है । जो अनंत है, अविनाशी है वह शिव है ।

संत भोले बाबा कहते हैं :

शव देह में आसक्त होना, है तुझे ना सोहता ।

हमारी वृत्ति रात को निद्राग्रस्त हो जाती है तो हमारे शरीर में और शव में कोई खास फर्क नहीं रहता । साँप आकर चला जाय हमारे शरीर पर से तो कोई पता नहीं चलेगा, कोई संत पुरुष आ जायें तो स्वागत करने का कोई पता नहीं... तो हमारी यह देह शव-देह है । शिव-तत्त्व की तरफ यदि थोड़ा-सा भी आते हो तो देह की आसक्तियाँ, बंधन कम होने लगते हैं । हजारों-हजारों बार हमने अपनी देहों को सँभाला लेकिन वे अंत में तो जीर्ण-शीर्ण होकर मर गयीं । शरीर मर जाय, देह जीर्ण-शीर्ण हो जाय उसके पहले यदि हम अपने अहंकार को, अपनी मान्यताओं-कल्पनाओं को परमात्मशांति में, शिव-तत्त्व में डुबा दें... तो श्रीमद् राजचन्द्र कहते हैं :

देह छतां जेनी दशा वर्ते देहातीत ।

ते ज्ञानीना चरणमां हो वंदन अगणीत ।।

देह होते हुए भी उससे पर जाने का सौभाग्य मिल जाय यह मनुष्य-जन्म के फल की पराकाष्ठा है ।

अपने देश में आयें

महाशिवरात्रि हमें संदेश देती है कि मनुष्य-जन्म अपने देश (अंतरात्मा) में आने के लिए है । जो दिख रहा है यह पर-देश है । बाहर कितना भी घूमो, रात को थक के अपने देश आते हो (सुषुप्ति में) तो सुबह ताजे हो जाते हो... लेकिन अनजाने में आते हो ।

पंचामृत से स्नान कराने का आशय

मन-ही-मन तुम भगवान शंकर को जलराशि से, दूध से, दही से, घृत से फिर मधु से स्नान कराओ और प्रार्थना करो : ‘हे भोलेनाथ ! आपको जरा-से दही, घी, शहद की क्या जरूरत है लेकिन आप हमें संकेत देते हैं कि प्रारम्भ में तो पानी जैसा बहता हुआ हमारा जीवन फिर धर्म-कर्म से दूध जैसा कुछ सुहावना हो जाता है । ध्यान के द्वारा दूध जैसी धार्मिकता जब जम जाती है तो जैसे दही से मक्खन और फिर घी हो जाता है वैसे ही साधना का बल और ओज हमारे जीवन में आता है ।’ जैसे घी पुष्टिदायक, बलदायक है ऐसे ही साधक का संकल्प बलदायक होता है । साधक के चित्त की वृत्ति दुर्बल नहीं होती, पानी जैसी चंचल नहीं होती बल्कि एकाग्र होती है, बलवान होती है, सत्यसंकल्प हुआ करती है और सत्यसंकल्प होने पर भी वह कटु नहीं होती, मधुर होती है इसलिए मधुस्नानं समर्पयामि । साधक का जीवन शहद जैसा मधुर होता जाता है । इस प्रकार पंचामृत का स्नान कराओ । तुम्हारा मन देह की वृत्ति से हटकर अंतर्मुख वृत्ति में आ जायेगा ।

शिव शांत में लग जायेगा, आनंद अद्भुत आयेगा ।।

यह लाख-लाख चौरासियों का फल देनेवाली महाशिवरात्रि हो सकती है । हजार-हजार कर्मों का फल जहाँ न पहुँचाये वहाँ महाशिवरात्रि की घड़ियाँ पहुँचा सकती हैं ।

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From the dead ‘body’ to Shiva Tattva  – Pujya Bapuji

(Mahashivaratri: 13th February)


सत्यं ज्ञानं अनन्तस्य चिदानन्दं उदारतः ।

निर्गुणोरूपाधिश्च निरंजनोऽव्यय तथा ।।

“He (Shiva) is Truth, Knowledge, Infinity, Consciousness, Bliss, Nirguna (without attributes), formless, free from adjuncts, stainless and imperishable.”

The scriptures, describing the Shiva Tattva state, Shiva means one who is auspicious, Truth, and Knowledge personified, and without end. One that has a beginning and an end, and is prone to change, is not Shiva but Ashiva (inauspicious). One that is infinite and imperishable is Shiva.

Saint Bhole Baba Says:

शव देह में आसक्त होना, है तुझे ना सोहता ।

“It behoves you not to get attached to the corpse, the body.”

When our mind sleeps at night, there is not much difference between our body and a corpse. We wouldn’t know if a snake came and passed over our body. If a saint came, we wouldn’t even know to welcome him. So, our body is a dead ‘body’. If we come a little towards Shiva-Consciousness, then our physical attachments and bondage will reduce. We took care of our body, thousands and thousands of times (in various births), but in the end, it became worn out and died. Before the body dies, before it becomes worn out, if we submerge our ego, beliefs, imaginations in supreme peace, Shiva consciousness, we will be fortunate to transcend the body, even while being embodied. Shrimad Rajchandra says:

देह छतां जेनी दशा वर्ते देहातीत ।

ते ज्ञानीना चरणमां हो वंदन अगणीत ।।

“Countless prostrations unto the Lotus-Feet of the Jnani (Self-Realized one) whose consciousness has transcended the body even though being embodied.” To get blessed with a chance to transcend the body while being embodied is the highest fruit of human birth.

Come into your Kingdom

Mahashivaratri, gives the message that the birth as a human being is for coming back to our Kingdom (inner-self). What is seen is a foreign country. However much you roam outside, you become tired at night and come back to your kingdom (in deep sleep), then you become fresh in the morning. But you come unknowingly.

The reason behind giving bath with Panchamrita

Within the mind, you bathe Lord Shiva with water, milk, curd, ghee, and finally with honey and pray: “Oh, Bholenath! You don’t need this little curd, ghee and honey, but with this you give a symbolic message to us that initially our life was like flowing water, then with the practice of religious rites and acts it improved and became like sweet milk. With the practice of meditation, the milk of piousness curdles and develops the power and vigour of sadhana in our life like the curd turning into butter and ghee. Just as ghee is nutritious and energising, similarly the will of a sadhak is strength-giving. A sadhak’s mental tendency is not weak or restless like water; instead it is one-pointed, strong and Sat-Sankalpa (whatever he desires, it there and then materialises). Despite being Sat-Sankalpa it is not bitter (unpleasant) but sweet (pleasant). Hence he says while Bathing Lord Shiva, मधुस्नानं समर्पयामि “O Lord! I will bathe Thee with honey.” The life of a sadhak becomes sweet like honey. In this way, bathe the Lord with Panchamrita. Your mind will turn away from body consciousness and become introverted. It will become absorbed in auspicious peace. You will get wonderful joy. This Mahashivaratri can bestow the merits of lakhs and lakhs of various forms of life. What the fruit of thousands of meritorious deeds cannot give you, moments of Mahashivaratri can give.   

[Rishi Prasad Issue-301]


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