रामराज्य की स्थापना कैसे हो ?
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रामराज्य की स्थापना कैसे हो ?

(श्रीराम नवमी : 2 अप्रैल)

- पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

रामायण का आध्यात्मिक अर्थ बतानेवाले संत कहते हैं कि दस इन्द्रियों में रमण करनेवाला जो दशरथ ‘जीव’ है, वह कहता है कि ‘‘अब इस हृदय-गादी पर जीव का नहीं, राम का राज्य होना चाहिए ।’’ गुरु बोलते हैं कि ‘‘हाँ, करो !’’ गुरु जब रामराज्य की हामी भरते हैं तो दशरथ को खुशी होती है लेकिन रामराज्य होने के पहले दशरथ कैकेयी की बातों में आ जाते हैं ।

दशरथ की 3 रानियाँ बतायी गयी हैं - कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी अर्थात् सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण । जब रजोगुण और सत्त्वगुण में से हटकर दशरथरूपी जीव तमोगुण में फँसता है, कैकेयी अर्थात् कीर्ति में, वासना में फँसता है तो रामराज्य के बदले राम-वनवास हो जाता है, तब दशरथ छटपटाता है । राम-वनवास होता है तो दशरथ भी चैन से नहीं जी सकता है । और समाज में देखो, कोई दशरथ चैन से नहीं है । ज्यादा या कम धनवाला, ज्यादा या कम पढ़ा, मोटा अथवा पतला, नेता या जनता... सब बेचैन हैं । क्यों ? कि राम-वनवास है ।

आत्माराम से मुलाकात हेतु...

रामजी के साथ सीताजी थीं । ‘राम’ माने ‘ब्रह्म’ और ‘सीता’ माने ‘वृत्ति’ । राम के करीब हैं सीता किंतु उनकी नजर स्वर्ण-मृग पर जाती है । राम को बोलती हैं : ‘‘मुझे वह मृग ला दो !’’ जब सोने के मृग पर तुम्हारी वृत्तिरूपी सीता जाती है तो उसका राम से वियोग हो जाता है । सोने के मृग अर्थात् धन-दौलत पर जब व्यक्ति का चित्त जाता है तब वह आत्माराम से विमुख हो जाता है । फिर लंका अर्थात् स्वर्ण मिलता है लेकिन शांति नहीं मिलती है । उसी वृत्ति को यदि रामजी का मिलन कराना हो तो बीच में हनुमानजी चाहिए ।

जाम्बवंत को बुलाया, इसको बुलाया, उसको बुलाया... कोई बोलता है, ‘एक योजन कूदूँगा’, कोई दो योजन कहता है... हनुमानजी 100 योजन समुद्र कूद गये । नापा जाय तो दक्षिण भारत के सागर-किनारे से लंका 100 योजन नहीं है परंतु शास्त्र की बातें गूढ़ हैं । जीवन जो 100 वर्षोंवाला है, उसके रहस्य को पाने के लिए छलाँग मारने का अभ्यास और वैराग्य हो । हनुमानजी को अभ्यास व वैराग्य का प्रतीक कहा गया है । हनुमानजी सीताजी को रामजी से मिला देंगे अर्थात् अभ्यास और वैराग्य - ये वृत्ति को ब्रह्म में विलीन कर देंगे ।

वृत्ति को मजबूत बनाने के लिए...

रामजी उत्तर में हुए और रावण दक्षिण की तरफ । उत्तर ऊँचाई है और दक्षिण निचाई है । इसका तात्त्विक अर्थ है कि मनुष्य की वृत्तियाँ शरीर के निचले हिस्से में रहती हैं । जब वह काम से घिर जाता है, क्रोध से भर जाता है तो सीता अर्थात् उसकी वृत्ति नीचे आ जाती है । सीता जब रावण के करीब होती है तो ज्यादा बेचैन होती है । वह ज्यादा समय वहाँ ठहर नहीं सकती है । काम के करीब व्यक्ति की सीतारूपी वृत्ति ज्यादा समय ठहर नहीं सकती है । चित्त में काम आ जाता है तो बेचैनी आ जाती है, जब ‘राम’ आ जाता है तो आनंद-आनंद हो जाता है । रावण की अशोक वाटिका में सीताजी नजरकैद हैं लेकिन सीता में निष्ठा है तो रावण अपना मनमाना कुछ कर नहीं पाता है । ऐसे ही वृत्ति में यदि दृढ़ता है, आत्माराम के प्रति पूर्ण आदर है तो काम व्यक्ति को नचा नहीं सकता है । जैसे सीता के संकल्प को मजबूत बनाने के लिए जप, तप, स्वाध्याय, सुमिरन चाहिए ऐसे ही इस चित्तवृत्ति को दृढ़ बनाने के लिए साधन-भजन चाहिए ।

रावण कैसे मरेगा ?

रावण मर नहीं रहा था । विभीषण से पूछा गया कि ‘‘कैसे मरेगा ?’’

बोले : ‘‘जब तक आपका बाण रावण की नाभि में नहीं लगेगा तब तक वह नहीं मरेगा ।’’ अर्थात् कामनाएँ नाभिकेन्द्र में रहती हैं । योगी जब कुंडलिनी योग करते हैं तो मूलाधार चक्र में स्पंदन होता है, फिर स्वाधिष्ठान चक्र में खिंचाव होता है । जन्म-जन्मांतरों की जो वासनाएँ, कामनाएँ हैं उनको धकेलने के लिए चित्तवृत्ति अर्थात् जो सीता माता है वह डाँटती-फटकारती है । जब डाँट-फटकार चालू होती है तो साधक के शरीर में क्रियाएँ होने लगती हैं । कभी रावण का प्रभाव दिखता है तो कभी सीता का । साधक के जीवन में कभी कामनाओं का तो कभी सद्विचारों का प्रभाव दिखता है ।

सीताजी को राम के करीब लाना है तो बंदर, रीछ - सभी साथ देते हैं । गिलहरियाँ भी साथ देने लगीं; रेती के कण उठाकर समुद्र में डालने लगीं । तुम यदि अपनी वृत्ति को परमात्मा के रास्ते लगाते हो तो प्रकृति और वातावरण तुम्हें अनुकूलता व सहयोग भी देते हैं । तुम यदि भोग की तरफ होते हो तो वातावरण तुम्हें नोच भी लेता है ।

उससे बड़ा दिन कोई नहीं !

जब तक राम नहीं आये थे तब तक अयोध्या सूनी थी । ‘रामजी आ रहे हैं’ - ऐसी सूचना जब अयोध्यावासियों ने सुनी तो नगर को सजाया है, साफ-सफाई की है । राम आने को होते हैं तो साफ-सफाई पहले हो जाती है । ऐसे ही जब परमात्म-साक्षात्कार होता है तो तुम्हारे चित्तरूपी, देहरूपी नगर के कल्मष पहले कट जाते हैं, पाप, मल1, विक्षेप2 - सब हट जाते हैं । तुम स्वच्छ, पवित्र हो जाते हो । राम जब नगर में प्रवेश करते हैं वह दिन दीपावली का दिन माना जाता है । लौकिक दिवाली व्यापारी पूजते हैं लेकिन साधक की दिवाली तो तब है जब हृदय में छुपे हुए जो आत्माराम ‘काम’ के करीब गये हैं वृत्तिरूपी सीता को छुड़ाने के लिए, वे अपने सिंहासन पर आ जायें, अपने स्वरूप में जागृत हो जायें । बड़ा दिन तो वह है जब बड़े-में-बड़े परमात्म-तत्त्व का ज्ञान हो, उससे बड़ा दिन कोई नहीं ।

1. चित्त की मलिनता, जो कि काम, क्रोध, लोभ आदि विकारों से आती है । 2. चित्त की चंचलता ।

[RP-315-March-2019]

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