सब उसीको गा रहे हैं और उसीसे गा रहे हैं
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सब उसीको गा रहे हैं और उसीसे गा रहे हैं

एक जीवन्मुक्त, ब्रह्मज्ञानी संत थे । सौभाग्यशाली कुछ साधु उनके चरणों में पहुँचे और निवेदन किया : ‘‘बाबाजी ! आप कृपा करो । बद्रीनाथ की यात्रा हम आपके साथ करना चाहते हैं । किन्हीं ब्रह्मवेत्ता महापुरुष के साथ चार कदम चलने से उन महापुरुष के हृदय में केवल भाव बन जाता है कि ‘इनका कल्याण हो’ तो भी व्यक्ति की बहुत-बहुत उन्नति होने लगती है । महाराज ! कई कर्म और पाप कट जाते हैं । महापुरुष की दृष्टि पड़ने से कई दोष दूर हो जाते हैं । हम आपसे और फायदा उठाना चाहते हैं । आप हमारे साथ बद्रीनाथ की यात्रा करने के लिए पधारें महाराज !’’


अवकाश का समय था । महाराज बोले : ‘‘अच्छा चलो ।’’


साधुओं की टोली के साथ वे परम साधु, परमात्मा को पाये हुए साधु गये । गर्मियों के दिन थे, पहाड़ी गाँवों में उत्सव चल रहा था । हर गाँव के अपने-अपने रीत-रिवाज के, उत्सवों के गीत गूँज रहे थे । एक साधु ने कहा कि ‘‘ये फलानी माता का गीत गाते हैं ।’’ दूसरे ने कहा : ‘‘नहीं, ये भैरव के गीत गा रहे हैं ।’’ किसीने कहा : ‘‘गंगाजी का भी भजन सुनाई दे रहा है, वे गंगा माता के भगत हैं ।’’ कोई बोला : ‘‘नहीं, शिवजी के भजन गा रहे हैं, वे शिवजी के भगत हैं ।’’ 


इस तरह आपस में मतभेद हो गया कि ‘ये किसकी उपासना करते हैं ? किसलिए करते हैं ? किसको (उद्देश्य करके) गा रहे हैं ?’


आखिर बात उन महापुरुष के पास पहुँची । वे बैठे थे एकांत में, भोजन आदि करके । उनसे बोले : ‘‘स्वामीजी ! ये सब किसको गा रहे हैं ?’’


महाराज ने चुटकी में उत्तर दे दिया, बोले : ‘‘चाहे देवी को, चाहे गंगा को, चाहे भैरव को, चाहे किसीको भी गा रहे हैं लेकिन कुल मिला के उसी (परमात्मा) को गा रहे हैं और उसीसे गा रहे हैं ।’’


ऐसे ही कोई ‘झूलेलाल’ कह के गा रहा है तो उसीको गा रहा है और कोई ‘धन गुरु नानक...’ गा रहा है तो उसीको गा रहा है । कोई ‘धन गुरु लीलाशाहजी...’ गाता है तो उसीको गा रहा है, ‘श्रीकृष्ण कन्हैया लाल की जय !’ करता है तो उसीको गा रहा है । ‘अम्बे मात की जय !’ करता है, ‘ॐ गणानां त्वा गणपतिँहवामहे...’ कर रहा है तो भी उसीको गा रहा है और कोई ‘अल्लाह हो अकबर’ कर रहा है, कोई ‘माय गॉड ! माय गॉड !’ करता है तब भी उसीको गा रहा है । सब उसीको गा रहे हैं और उसीसे गा रहे हैं । 


तो साधु बोले : ‘‘यही समझौता सच्चा है महाराज !’’


अपना-अपना मनमाना गा रहे हैं तो भी उसीको गा रहे हैं लेकिन उसमें गानेवाला और जिसके लिए गा रहे हैं वह - इनका भेद नहीं मिटेगा । इसलिए गुरुवाणी में कहा गया है : 
संत जना मिलि हरि जसु गाइओ । 


संतों के चरणों में बैठकर हरि का यश गाओ ताकि उसके स्वरूप का पता चले, अपनी वास्तविकता का रहस्य प्रकट हो ।  

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