शब्दों से परे की बात मनुष्य कैसे समझे ?
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/ Categories: Year-2020, March-2020

शब्दों से परे की बात मनुष्य कैसे समझे ?

प्रस्तोता (Host) : बापूजी ! संतों ने अपनी वाणी में कहा है कि ‘ब्रह्म की अनुभूति’ यह शब्दों से बाहर की बात है । तो यह बात सामान्य मनुष्य कैसे समझे ?

पूज्य बापूजी : सामान्य मनुष्य सत्संग करे तो फिर वह सामान्य मनुष्य रहेगा ही नहीं । उपनिषद् कहती है : यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह ।... जहाँ से मन के सहित वाणी उसे न पाकर लौट आती है उस ब्रह्मानंद को जाननेवाला पुरुष कभी भय को प्राप्त नहीं होता । (तैत्तिरीय उपनिषद् : 2.4.1)

वहाँ पर वाणी नहीं जा सकती... । उच्चारण करने की भी एक कला है । ये बावन अक्षर जहाँ से निकलते हैं उन वैखरी, मध्यमा, पश्यंती और परा वाणियों का जो उद्गम-स्थान है उसका वर्णन नहीं हो सकता । यह राज समझ में तो आता है पर समझाया नहीं जाता है । यह अनुभूति का विषय है परंतु इसका यह भी अर्थ नहीं कि अनुभूति होगी तब होगी... नहीं, शुरुआत होगी भी सही ।

यहाँ (वडोदरा) से अपने को अहमदाबाद जाना हो तो तुरंत अहमदाबाद नहीं दिखता किंतु रास्ते के चौराहे तो दिखेंगे । नड़ियाद का चौराहा दिखेगा, आणंद का चौराहा दिखेगा, और भी दिखेंगे... इसी तरह से ब्रह्मानुभूति के मार्ग पर जायें तो पूर्ण अनुभूति का तो वर्णन नहीं कर सकते पर उससे पहले सद्गुण आते हैं, दैवी सम्पदा आती है ।

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । 

दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ।।     (गीता : 16.1)

सरलता आती है, स्वाध्याय में रुचि होती है । सुख-दुःख में थोड़ी समता आती है । पहले जरा-जरा बात में डरते थे... ये सारे दुर्गुण उसी प्रकार अपने-आप कम होते जाते हैं जैसे सूर्योदय होने से पहले उजाला हो जाता है । इस प्रकार यदि साधक को परम अनुभूति होती है तो उससे पहले उसके अंदर दिव्य गुण और शांति का माधुर्य प्रकट होते हैं । यह सामान्य मनुष्य नहीं समझ सकता फिर भी समझ जाता है ।

जिन पाया तिन छुपाया,

छुपत नहीं कछु छुपे छुपाया ।

जिन्होंने (परमात्म-अनुभव) पाया उन्होंने छुपाया पर छुपाने से वह छुपा नहीं ।

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