सत्संग का ऐसा बल कि राक्षसी का स्वभाव गया बदल
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सत्संग का ऐसा बल कि राक्षसी का स्वभाव गया बदल

सीताजी की खोज के लिए हनुमानजी लंका पहुँचे और लंका के द्वार से अंदर प्रवेश करने लगे तो लंकिनी नाम की राक्षसी ने उन्हें रोक लिया । इस पर हनुमानजी ने उसे एक मुक्का मारा, जिससे वह गिर पड़ी । उसके बाद उसने जो बात कही उससे पता चलता है कि वह मूलतः बुरी नहीं थी । हनुमानजी के सत्संग के बाद लंकिनी के स्वभाव में परिवर्तन आया । रावण के कुसंग से उसके स्वभाव पर एक आवरण छा गया था, जिसे हनुमानजी ने दूर कर दिया ।

वह हनुमानजी को बताती है कि ‘‘जब ब्रह्माजी ने रावण को वरदान दिया और मुझे ऐसा लगा कि मुझे रावण के शासन में रहना पड़ेगा तो मुझे बड़ी चिंता हो गयी और मैंने ब्रह्माजी से निवेदन किया : ‘‘महाराज ! पहले मेरे ऊपर देवताओं का शासन था, फिर यक्षों का शासन हुआ, अब राक्षस मेरे ऊपर शासन करेंगे, क्या मुझे नीचे-से-नीचे ही गिरते जाना है ?’’

ब्रह्माजी ने कहा : ‘‘चिंता मत करो । तुम्हारा बहुत बड़ा कल्याण होनेवाला है क्योंकि रावण के शासन में एक दिन श्रीरामजी आयेंगे तथा लंका में रामभक्त का राज्य होगा ।’’

मैंने पूछा : ‘‘मुझे कैसे पता लगेगा कि वह शुभ अवसर आनेवाला है ?’’

तब ब्रह्माजी ने कहा :

बिकल होसि तैं कपि कें मारे । 

तब जानेसु निसिचर संघारे ।।

‘‘एक कपि के प्रहार से जब तुम व्याकुल हो जाओ तब समझ लेना कि अब रावण का संहार होनेवाला है ।’’

यदि विचार करके देखें तो यह एक बहुत बड़ा सूत्र है । प्रश्न यह है कि ‘व्यक्ति के अंतःकरण में संस्कार अच्छे हों किंतु वह यदि बुरे व्यक्तियों के संग में रहकर बुराइयों से घिरा हुआ-सा प्रतीत होने लगे तथा उसके आचरण और वाणी से भी ऐसा ही लगे तो फिर उसमें परिवर्तन कैसे होगा ?’ ब्रह्माजी लंकिनी से कहते हैं कि ‘‘जब कपि के प्रहार से तुममें व्याकुलता आ जाय तब परिवर्तन होगा ।’’ हमारे-आपके जीवन में भी ठीक यही सूत्र है । हमारे जीवन में संतों की वाणी सुनकर जो व्याकुलता आती है - परमात्मा को पाने की उत्कंठा जागती है, जो एक परिवर्तन होता है वही परिवर्तन मानो आवरण हट जाने की तरह है । आवरण हट जाने पर लंकिनी अंदर से बदली हुई दिखती है । उसके मुख से कितनी सुंदर बात निकली है :

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग ।

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ।।

‘हे तात ! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाय तो भी वे सब मिलकर (दूसरे पलड़े पर रखे हुए) उस सुख के बराबर नहीं हो सकते जो क्षणमात्र के सत्संग से होता है ।’  (श्री रामचरित. सुं.कां. : 4)

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