असली सुख कहाँ है ?
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असली सुख कहाँ है ?

एक बार आनंदमयी माँ अद्वैत वेदांत पर बड़ा गम्भीर सत्संग कर रही थीं । बीच में ही सामान्य भावमुद्रा में आकर श्रोताओं को एक कहानी सुनाने लगीं :

‘‘एक तालाब था, जिसका पानी साफ था । उसके तल-देश मेंं सफेद पत्थरों के बीच सोने का एक सुंदर हार दिखाई पड़ रहा था । बहुमूल्य स्वर्ण हार इस तरह पड़ा हुआ देख किसे लोभ नहीं होगा ? बहुत लोग पानी में उतर पड़े । हार को उठाकर लाने की कोशिश की जाने लगी । कितनी ही डुबकियाँ लगायी गयीं । तालाब के नीचे की कितनी रेत, कितने पत्थर वे डुबकी लगाकर ले आये पर हार किसीको भी नहीं मिला ।

अनेक परिश्रम करके हैरान होने पर भी जब वह हार नहीं मिला तब सारे लोग निराश होकर सोचने लगे कि ‘बात क्या है ? यह कौन-सा रहस्य है ?’

उनमें से एक बुजुर्ग व्यक्ति अंतर्मुख होकर विचार करने लगा । विचार करते-करते अचानक तालाब के किनारे खड़े एक वृक्ष पर उसकी दृष्टि पड़ी । उसे दिखा कि पेड़ की एक ऊँची डाल पर उसी तरह का एक सोने का हार लटक रहा है । फिर सबने उधर देखा । अब उनको यह समझने में देर न लगी कि असल में हार तो पेड़ की ऊँची डाल पर लटक रहा है और जो तालाब के तल में झिलमिला रही है वह उसकी छायामात्र है ।’’

इतना कहकर माँ चुप हो गयीं । एक व्यक्ति ने कहा : ‘‘माँ ! यह कैसी कहानी ?’’

माँ बोलीं : ‘‘वाह ! यह तो सबकी कहानी है । पृथ्वी पर सब कोई आनंद चाहते हैं पर किसीको नहीं मिलता । क्यों नहीं मिलता ? क्योंकि सब उस हार की छाया की तरह सुख की छाया लेकर व्यस्त हैं । असली सुख कहाँ है क्या यह कोई सोचकर देखता है ?’’

वास्तव में संसार की तुच्छ वस्तुओं में, परिस्थितियों में सुख नहीं है, सुख का आभास है । हम उस सुखाभास से आकर्षित होकर खूब परिश्रम करते हैं । लगता है कि ‘अभी मिलेगा... यह मिल गया...’ लेकिन फिर देखते हैं कि कुछ हाथ नहीं लगा, केवल मिलने का भ्रम ही था । जैसे उस हार का पानी में सुंदर प्रतिबिम्ब या आभास दिख रहा था, वैसे ही सत्यस्वरूप परमात्मा का विवर्त या आभास है यह लुभावना संसार । बहिर्मुखता से जो सुख का एहसास होता है, वह केवल आभास है । अंतर्मुख होने पर पता चलता है कि प्रतिबिम्ब सत्य नहीं है, मूल वस्तु सत्य है । सुख बाहर नहीं, भीतर है । सुख अज्ञान में नहीं, आत्मा के ज्ञान में है । वह सच्ची, सुंदर, सुखकारी मूल वस्तु बाहर नहीं, दूर नहीं, कोई और नहीं, बस हम (चैतन्य आत्मा) ही हैं ।

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