आप भी ऐसी दिवाली मनाओ !
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आप भी ऐसी दिवाली मनाओ !

(दीपावली पर्व : २५ से २९ अक्टूबर)

दिवाली पर्व मनाने के कई-कई कारण हैं । महावीर स्वामी, ऋषि दयानंद, स्वामी रामतीर्थ इसी दिन निर्वाण को प्राप्त हो गये । इसी दिन भगवान श्रीराम राजगद्दी पर बैठे । रामजी अयोध्या आये तब से दिवाली शुरू हुई ऐसी बात नहीं, रामजी के अवतरण के पूर्व से ही वेदों में लक्ष्मी-पूजन का वर्णन है । दिवाली अति प्राचीन है ।

वे ही घड़ियाँ हमारी, दिवाली की घड़ियाँ होंगी

इस मायावी जगत में धन, ऐश्वर्य पाने के लिए धनतेरस को गाय की पूजा की जाती है, लक्ष्मी की पूजा की जाती है । ये सब पूजन अनात्मा के पूजन हैं । इनसे अनात्म चीजें मिलती हैं । वेदांत की दृष्टि से तो सच्ची दिवाली है आत्मज्ञान, आत्मा की पूजा... ब्रह्माकार वृत्ति को लाओ । जैसे सीताजी को रामजी ले आये रावण के चंगुल से छुडाकर और अयोध्या गये तो राह रोशन हो गयी, ऐसे ही तुम्हारी वृत्तिरूपी सीता नीचे के केन्द्रों में, काम-क्रोध में घूम रही है, उसको ऊपर के केन्द्रों में लाओ और फिर अंतरात्मारूपी अयोध्या में लाओ ।

नरक चौदस के दिन भगवान श्रीकृष्ण १६ हजार कन्याओं को नरकासुर की कैद से छुडाकर लाये थे और वे ही बाद में श्रीकृष्ण की पत्नियाँ बन गयीं । लेकिन तत्त्व की दृष्टि से देखा जाय तो अहंकाररूपी असुर के हाथ में हमारी वृत्तियाँरूपी कन्याएँ कैद में पडी हैं । जिस दिन उन चित्तवृत्तियों को आत्मदेवरूपी श्रीकृष्ण छुडा लें वह हमारे लिए नरक चौदस का दिन है और जिस दिन अंतरात्मा श्रीकृष्ण उन वृत्तियों को अपने पास रख लें (अर्थात् वृत्तियाँ आत्मदेव में लीन होकर आत्मज्ञान का प्रकाश हो जाय) वे ही घड़ियाँ हमारी दिवाली की घड़ियाँ होंगी ।

आत्मज्ञान का दीया कैसे जले ?

रामराज्य के बदले राम-वनवास हुआ तो दशरथजी की क्या हालत हुई ? ‘हाय राम !... हाय राम !... हाय राम !... करके प्राण छोड दिये । ऐसे ही ‘हाय सुख !... हाय सुख !...ङ्क करके संसारी लोग बेचारे मर जाते हैं । सुख को वनवास हो जाता है । जब दशरथ कैकेयी के कहने में आ जाते हैं तो उनकी अयोध्या अस्त-व्यस्त हो जाती है । ऐसे ही हम लोगों की यह शरीररूपी अयोध्या है । इसमें दस इन्द्रियों में रमण करनेवाला जीवरूपी दशरथ है । तीन गुण (सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण) रूपी जीव की पत्नियाँ हैं और ४ बेटे हैं - मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार । जीव कीर्ति के चक्कर में अथवा तमोगुण के प्रभाव में आ जाते हैं । फिर हाय राम !... हाय राम !... हाय सुख !... हाय सुख !... करके सब मर जाते हैं । इसलिए प्रज्ञा की दिवाली मनाओ । आत्मज्ञान की ज्योत जगाओ तो आत्मराम के दीदार हों, आत्मराम का राज्य हो, आत्मशांति मिले ।

व्यक्ति को सब मिले लेकिन आत्मशांति नहीं मिले तो वह अभागा है और कुछ भी न हो पर आत्मशांति मिले तो वह पूजने योग्य है । खाने को रोटी भी नहीं हो, लोग कंकड-पत्थर मारते हों... शुकदेवजी जैसी हालत हो फिर भी आत्मज्ञान है तो उनको प्रणाम है । इसलिए आत्मज्ञान का दीया जगाना चाहिए ।

‘स्वामीजी ! आत्मज्ञान का दीया कैसे जगे ?

वेदांत-ज्ञान के वचनों को सुनो, सुने हुए वचनों का एकांत में विचार करो और विचार करते-करते उन्हीं वचनों में डूब जाओ, खो जाओ । ऐसा करोगे तो आत्मज्ञान का दीया जगेगा । जहाँ सूर्य का प्रकाश भी नहीं, अग्नि भी नहीं, वाणी भी नहीं पहुँचती... जो कभी नहीं बुझता, मरने के बाद भी नहीं बुझता वह आत्मज्ञान का दीया है । वह दीया जगा तो तुम्हारा नूतन वर्ष हो जायेगा फिर कभी नहीं जायेगा । अभी तो नूतन वर्ष ३६४ दिन बाद आता है परंतु एक बार आत्मज्ञान का दीया जगेगा तो रोज वर्ष का पहला दिन ! आत्मज्ञानी को जब देखो तब ताजा, जब देखो तब उत्सव !     

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