माँ महँगीबाजी के पावन संस्मरण
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माँ महँगीबाजी के पावन संस्मरण

ब्रह्मलीन मातुश्री माँ महँगीबाजी का महानिर्वाण दिवस : २४ अक्टूबर

पूज्य बापूजी की मातुश्री माँ महँगीबाजी (अम्माजी) का जीवन गुरु-आज्ञापालन, नियमनिष्ठा, गुरुभक्ति आदि सद्गुणरूपी फूलों का गुलदस्ता है । अम्माजी के जीवन का एक-एक प्रसंग ऐसा दिव्य पुष्प है, जिसकी सुगंध पाठकों के जीवन में भी इन दैवी गुणों का संचार करेगी । प्रस्तुत हैं अम्माजी की सेविका सजनी बहन द्वारा बताये गये अम्माजी के जीवन के कुछ संस्मरण :

नियमनिष्ठा व गुरुनिष्ठा की प्रतिमूर्ति

पूजनीया अम्माजी की नियमनिष्ठा गजब की थी । अपने सद्गुरु पूज्य बापूजी के वचन उनके लिए पक्का नियम बन जाते थे । अम्माजी का प्रतिदिन का नियम था भगवद्गीता का पाठ करना और घडी देखकर कम-से-कम एक घंटे तक गुरुमंत्र का जप करना । चाहे स्वास्थ्य कमजोर हो या और कुछ समस्या हो, कुछ भी हो जाय पर अम्माजी नियम नहीं छोडती थीं ।

पूज्यश्री ने दही व भुट्टा खाने के लिए मना किया तो उन्होंने जीवनपर्यंत दोनों चीजें नहीं खायीं । अम्माजी के जीवन में पहले से ही ऐसी नियमनिष्ठा देखने को मिलती है । श्री थाऊमलजी (पूज्य बापूजी के पिताश्री) ने एक बार अम्माजी से कहा कि ‘‘सुबह पहले किन्हीं संत या गरीब को दान देना, उसके बाद ही भोजन बनाना । तब से उनका यह नियम ही बन गया था ।

अम्माजी गुरुदेव के सामने कभी कोई भी बात छुपाती नहीं थीं, उसे जैसी-की-तैसी बता देती थीं । उनका भाव रहता था कि ‘ब्रह्मज्ञानी गुरु से बढकर कोई हितैषी नहीं हो सकता और वे अपने आत्मरूप हैं तो उनसे कोई बात छिपी नहीं रह सकती, फिर कुछ भी क्यों छुपाना !

‘धर्म की किसी भी चीज का बिगाड न होङ्क यह पूज्यश्री का सिद्धांत अम्माजी के जीवन में पग-पग पर दिखाई देता था । वे आश्रम की हर चीज-वस्तु का ध्यान रखती थीं । घूमने निकलतीं और कभी कुछ बिगाड होता दिख जाता तो स्वयं उसे सँभालने में लग जाती थीं ।

सरल स्वभाव

अम्माजी आश्रमवासियों को बहुत स्नेह करती थीं । जो उनसे एक बार भी बात करता उसका हावभाव, क्या सेवा करता है आदि वयोवृद्ध होने के बाद भी उन्हें याद रह जाता था, फिर वे उसे नये नाम से पुकारती थीं, जैसे - महंत, चौकीवाला आदि । अम्माजी का प्रेम ऐसा था कि साधकों को ऐसे नये नाम सुनकर बहुत आनंद आता था । अम्माजी आश्रम में रहनेवाले साधकों के सोने का ढंग देखकर बता देती थीं कि ‘यह ऐसा सोचता है, इसके मन में यह चल रहा है ।...

महिला आश्रम की बहनों का अम्माजी माँ की तरह खयाल रखती थीं । वे न केवल उन्हें साधना में आगे बढाने हेतु प्रयत्नशील रहतीं बल्कि उन्हें चलने-फिरने, उठने-बैठने का सही ढंग आदि व्यावहारिक बातें भी बताती थीं । कई बार तो कुछ बहनों के चलने की नकल करके सबको खूब हँसातीं, फिर समझातीं कि ‘बेटी ! ऐसा चलना ठीक नहीं है ।

दृढ मनोबल की धनी

बात उस समय की है जब अम्माजी की उम्र काफी हो गयी थी । उन्हें कमर की  तकलीफ थी । शरीर की ऐसी स्थिति थी कि बिना सहारे उठना-बैठना भी नहीं हो पाता था ।

एक संचालक दुपहिया (two-wheeler) गाडी लेकर आये, बोले : ‘‘अम्मा ! गाडी चलायेंगी ?

सेविका विनोद में बोली : ‘‘चलाने की तो बात क्या, अम्माजी तो उस पर बैठ भी नहीं पायेंगी ।

अम्मा : ‘‘क्यों ?

सेविका : ‘‘अम्मा ! आप गाडी पर कैसे बैठ पायेंगी ?

‘‘बैठकर दिखाऊँ तो ?

‘‘अगर बैठ जायेंगी तो मैं पूरे महिला आश्रम में प्रसाद बाँटूँगी ।

अम्माजी पूरे मनोबल से उठीं और गाडी पर बैठ गयीं व पूरे आश्रम का एक चक्कर लगाया ।

शरीर की ऐसी स्थिति थी लेकिन ठान लिया तो करके दिखाया, ऐसा दृढ मनोबल था अम्माजी का !

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