सुख का मूल स्रोत क्या ?
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सुख का मूल स्रोत क्या ?

- पूज्य बापूजी

लोग संसार के विषयों में आनंद ढूँढ़ते हैं परंतु आनंद बाहर नहीं है, हमारे अंदर ही है । हमारे अंदर जो आत्मा-परमात्मा है वही चेतन सत्ता आनंदस्वरूप है । वह आत्मसत्ता सर्व समय उपस्थित है । उसीके सहारे हम सब कुछ देख रहे हैं, सुन रहे हैं, अनुभव कर रहे हैं । उसी सत्ता का सहारा लेकर हमारा मन हमको बाहरी पदार्थों में सुख की अनुभूति कराता है । हम देहभाव के कारण उसे तो भूल गये हैं जो सत्य है और इस संसार को, जिसे मन दिखाता है, सत्य मान लेते हैं जो कि मिथ्या है ।

हम जो कुछ जाग्रत अवस्था में देखते हैं वह व्यावहारिक सत्ता कहलाती है । जो हम सुप्तावस्था में स्वप्न देखते हैं उसे प्रातिभासिक सत्ता कहते हैं । और इन्द्रियों से परे जो सत्ता है यानी जो इन्द्रियगम्य नहीं है वह पारमार्थिक सत्ता कहलाती है ।

हम स्वप्न में कई प्रकार की घटनाएँ देखते हैं । हम तो सो जाते हैं फिर यह कौन देखता है ? उसी चेतन-सत्ता से शक्ति लेकर हमारा मन स्वप्न के जगत का निर्माण करता है । यानी उस समय भी वही चेतन-सत्ता साक्षीभाव में उपस्थित रहती है । वह यदि न हो तो स्वप्न के जगत का आभास नहीं होगा ।

इसी प्रकार जाग्रत जगत में उसी सत्ता के सहारे मन बाह्य वस्तुओं का आभास कराता है । यदि उस सत्ता की साक्षिता नहीं हो तो हमारी आँखें भले ही खुली रहें, हम नहीं देख सकते; कान भले ही खुले रहें और बहुत-सी आवाजें हो रही हों पर हम नहीं सुन सकते । हमें सुनाई नहीं देगा । वह सत्ता कभी मरती नहीं । वह कभी जन्मती नहीं । वह अजन्मा और अमर्त्य है । वही सत्ता सर्वत्र व्याप्त है । उसे ही कोई आत्मा कहता है, कोई परमात्मा कहता है, कोई ब्रह्म कहता है, कोई सत्य कहता है । एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति । (ऋग्वेद : मंडल 1, सूक्त 164, मंत्र 46) उसके अतिरिक्त कहीं कुछ नहीं है । एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति ।

वही परम तत्त्व हम हैं । उसीकी सत्ता से सब कुछ हो रहा है । वह स्वयं आनंदस्वरूप है । उस अपने आनंदस्वरूप को आप भूले बैठे हैं और बाहर की चीजों में सुख, जो कि इन्द्रियाँ बताती हैं, ढूँढ़ रहे हैं । क्षणिक सुख का आभास भी उसीकी सत्ता से होता है । प्रकृति स्वयं अपूर्ण है । वह भी उसीकी सत्ता से शक्ति लेकर पुरुष (जीवात्मा) को सुख का आभास कराती है । अपूर्ण प्रकृति आखिर कब तक उससे शक्ति लेकर सुख का आभास करायेगी ? आनंदस्वरूप तो जीव की वह आत्मसत्ता स्वयं है । अतः जीव को सुख के लिए अपनी आनंदस्वरूप आत्मसत्ता का ही सहारा लेना चाहिए । यदि वह प्रकृति में सुख ढूँढ़ेगा तो धोखा ही हाथ लगेगा ।

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