कर्म करते समय सावधान रहें !
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कर्म करते समय सावधान रहें !

 - पूज्य बापूजी

(संत कबीरजी जयंती : 17 जून)

एक व्यक्ति ऐसा था जो किसीका गुरु बन गया । जितना लम्बा उतना चौड़ा । किसान के यहाँ रहता, खूब माल, मावा-मिठाई खाता और पड़ा रहता । संत कबीरजी उसके पास गये, बोले : ‘‘तुम भजन भी करते हो कि खाली भगत का माल खाकर पेट बढ़ा रहे हो ?’’

वह बोला : ‘‘तुम जाओ ! तुम सफेद कपड़ेवाले हो, मैं तो संन्यासी हूँ । मुझे क्या उपदेश देते हो !’’

कबीरजी तो चले गये । 2-5 वर्ष के बाद फिर आये, किसान से पूछा : ‘‘वे तुम्हारे मोटे-मोटे, लम्बे-चौड़े जो थे, वे कहाँ गये ?’’

किसान बोला : ‘‘वे तो स्वर्गवासी हो गये ।’’

कबीरजी ने ध्यान करके देखा कि वह कहाँ गया । देखा कि वह तो बैल बनकर उसी किसान के यहाँ अरहट में जुता है । कबीरजी को दया आयी । धीरे से वे अरहट के पास गये और बैल के कान में कहा कि ‘‘महाराज ! देखो, खाने के समय ध्यान नहीं रखा, अब चुकाना पड़ रहा है । अगर आप ध्यान, जप, प्रभुप्राप्ति की यात्रा कर लेते तो आपका भी उद्धार हो जाता और भगत का भी कल्याण हो जाता । अब भगत को तो बदले में आपको चुका के देना पड़ रहा है । अब डंडे खा-खाकर चुकाओ, चाहे उत्साह से चुका दो । उत्साह से चुकाओगे तो जल्दी चुक जायेगा, डंडे खा के चुकाओगे तो देर लगेगी । इसलिए अभी भी मेरी यह बात मान लो ।’’

पहले के जमाने में अरहट होते थे । कुएँ पर बैल गोल-गोल घूमते थे, जिससे खटखट करते हुए अरहट घूमता था और खेत के लिए पानी निकलता था । महाराज ! बैल तो अरहट में ऐसा भागा, ऐसा भागा कि खेत में पानी-पानी कर दिया !

दो दिन के बाद किसान दूसरे दो बैल ले आया कबीरजी के घर, बोला : ‘‘महाराज ! इनके कान भी फूँक दीजिये । इनको भी गुरुमंत्र दे दीजिये ।’’

‘गुरु’ माने बड़ा । बड़ी बात का मन में, अंतर में जिससे मनन हो वह है ‘गुरुमंत्र’ ।

कबीरजी बोले : ‘‘ये तो निगुरे हैं, भोगी बनकर जन्म-मरण के चक्कर से घूमते-घामते बैल बने हैं और वह तो बेचारा अकस्मात् बैल बना है । उसने साधन-भजन नहीं किया था लेकिन गुरु से दीक्षा ली हुई थी । दीक्षा के प्रभाव से पशु योनि में भी उसको संत की वाणी असर कर गयी और मुक्ति के रास्ते चल पड़ा परंतु ये तो निपट निराले हैं, निगुरे हैं, इन पर असर नहीं होगा ।’’

तो जैसे पाप और पुण्य मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ते, ऐसे ही गुरुमंत्र भी जब तक मुक्ति नहीं मिली तब तक जापक का पीछा नहीं छोड़ता । 


[LKS-MAY-2019-263]


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