कुम्भ-स्नान का अमिट फल पाना हो तो...
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कुम्भ-स्नान का अमिट फल पाना हो तो...

(प्रयागराज कुम्भ : 14 जनवरी से 4 मार्च)

- पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च ।

लक्षं प्रदक्षिणा भूमेः कुम्भस्नानेन तत्फलम् ।।

‘हजार अश्वमेध यज्ञ, सौ वाजपेय यज्ञ और लाख बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो फल प्राप्त होता है वह फल केवल कुम्भ के स्नान से प्राप्त होता है ।’ (विष्णु पुराण)

किनको नहीं होता तीर्थ-स्नान का फल ?

नारद पुराण (उत्तर भाग : 62.16-17) में आता है कि 5 प्रकार के मनुष्यों को तीर्थ-स्नान का फल नहीं होता है : (1) अश्रद्धालु (2) पाप में रत (3) नास्तिक (4) संशयात्मा और (5) जो कुतर्क से घिरे हैं ।

श्रद्धालु, धर्मात्मा, आस्तिक, संशयरहित और कुतर्करहित प्रेमी को तीर्थ-स्नान का फल होता है ।

प्रयाग कुम्भ-स्नान का महत्त्व

गंगा और यमुना - दोनों का पानी आपस में टकराता है । गंगा यमुना के गले का हार बनती है तो यमुना गंगा के गले का हार बनती है । गंगा ज्ञान-प्रधान है तो यमुना का जल भक्तिभाव-प्रधान है ।

प्रयागराज में गंगाजी और  यमुनाजी आती हैं, एक-दूसरे से मिलती हैं, पानी में थोड़ा टकराव पैदा होता है । उससे एक प्रकार की सात्त्विक तरंगें पैदा होती हैं, शुद्धीकरण होता है । फिर ये सूर्य-चन्द्र और ग्रहों के प्रभाव से जो महत्त्वपूर्ण कुम्भ-स्नान माने गये - अमावस्या, मकर संक्रांति, षट्तिला एकादशी, महाशिवरात्रि के स्नान - उन दिनों में ग्रह-नक्षत्रों की सात्त्विक तरंगें पड़ती हैं और जैसे बिजली की लाइन बिजली को पहुँचाती है ऐसे ही जल ग्रह-नक्षत्रों की तरंगों और संकल्पों का परिवहन करके हम लोगों तक पहुँचाता है । कई महात्मा भी जल में देखकर संकल्प करके दे देते हैं जल, ‘लो बेटा !’ अथवा जल का छींटा मार देते हैं तो उनमें संकल्प प्रविष्ट होता है । ऐसे ही राशियों का भी जल पर प्रभाव पड़ता है । उस जल में नहाते समय जिधर से प्रवाह आता हो उधर की ओर सिर झुका के एवं पहले सिर गीला करके फिर नहाना चाहिए । इसमें गंगा, यमुना आदि का आदर भी हो जाता है और सिर की गर्मी और उसके कारण जो सिरदर्द आदि होते हैं वे दूर करने में मदद मिलती है ।

...तो स्वर्ग-सुख भी फीका लगेगा

जो कुम्भ पर्व पर स्नान करते हैं, संयम रखते हैं, सत्संग सुनते हैं उनके सौ कल्पों1 के पाप नष्ट हो जाते हैं और उन्हें पुण्य की प्राप्ति होती है, वे स्वर्ग के अधिकारी बन सकते हैं । और यदि वेदांत के, ब्रह्मज्ञान के सत्संग में प्रीति हो जाय तो... इन भारी पुण्यों से जो स्वर्ग मिलेगा वह भी फीका लगेगा क्योंकि स्वर्ग का सुख भी अंत मे खत्म हो जायेगा, फिर वहाँ से गिरेंगे । और यदि स्वर्ग की भी इच्छा नहीं... जो परमात्मा हमारे थे, हैं और रहेंगे वे आनंदस्वरूप हैं, प्रेमस्वरूप हैं उन्हींसे रति, प्रीति, संतुष्टि हो जाय और उन्हींमें हम तृप्त रहने लगें... तो फिर क्या होता है ? जो भगवान को चाहता है, भगवान भी उसको चाहते हैं; फिर वह तर जाता है और लोगों को भी तारनेवाला हो जाता है ।

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1. एक कल्प = ब्रह्माजी का एक दिन = 4 अरब 32 करोड़ मानवीय वर्ष

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