वे तो सब देखते हैं...
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वे तो सब देखते हैं...

स्वामी शारदानंद ईश्वर में अपने अनंत विश्वास के लिए प्रसिद्ध थे । वे नेत्रहीन थे परंतु ईश्वर का नियमित भजन-पूजन किया करते थे । एक दिन मंदिर में एक श्रद्धालु ने उनसे प्रश्न किया : ‘‘महाराज ! आपकी ईश्वर में असीम आस्था प्रशंसनीय है । आप भजन-पूजन करते हैं, यह भी संतोषप्रद है किंतु आप नेत्रहीन होकर भी रोज इस मंदिर में आते हैं, यह थोड़ा अटपटा लगता है । आप तो मूर्ति को देख नहीं सकते फिर इससे क्या प्रयोजन सिद्ध होता है ?’’

बड़े विनम्र स्वर में स्वामी शारदानंदजी ने उत्तर दिया : ‘‘मैं नहीं देख सकता तो क्या हुआ, ईश्वर तो सब देखते हैं । मुझे तो वे यहाँ आता देख ही रहे हैं, यही मेरे लिए प्रसन्नता की बात है । इसी हार्दिक प्रसन्नता हेतु मैं यहाँ आता हूँ ।’’ श्रद्धालु उनकी ईश्वर के प्रति असीम आस्था देख गद्गद हो गया ।

अहमदाबाद आश्रम में भी एक सूरदास आये । सूरदास होते हुए भी वे बापूजी के जाहिर सत्संगों में और अहमदाबाद आश्रम आते रहे हैं । उन्होंने पिछले वर्षभर में दिल्ली से जोधपुर जाकर करीब 40 बार पूज्यश्री के दर्शन किये । जब उनसे भी उपरोक्त प्रकार का प्रश्न पूछा गया तो उन्होंने उत्तर दिया : ‘‘भाई ! मेरी बाहरी दृष्टि नहीं है तो क्या हुआ, उनकी मंगलमय कृपादृष्टि डलवाने मैं बार-बार आता हूँ । जब बापूजी की गाड़ी सामने से गुजरती थी तो मेरे आसपास खड़े लोगों में खुशी और आनंद का माहौल छा जाता था । उसी समय मेरे मन में भी आनंद की तरंगें उठ आती थीं । मुझे पता चल जाता था कि बापूजी की कृपादृष्टि हम पर पड़ गयी है, उनके नेत्रों से आशीर्वाद बरस गया है । लोग बाहरी आँख से दर्शन कर लेते थे और मैं अपनी मन की आँख से इन सबकी अनुभूति करता था । केवल तुम लोग ही नहीं, मैं भी गुरु-दर्शन का सौभाग्य पा लेता था । बापूजी की दृष्टि पड़नेमात्र से हृदय में आनंद-आनंद उमड़ने लगता है और ध्यान-भजन आदि सहजता से होने लगता है ।

अब 5 साल हो गये हैं, मेरी देश के सभी व्यवस्था-तंत्रों से प्रार्थना है कि यहाँ अहमदाबाद आश्रम के पंडाल में ही बापूजी के दर्शन-सत्संग का लाभ हमें दिलायें ।’’


[September 2018]

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