जन्मदिन किसका और क्यों ?
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जन्मदिन किसका और क्यों ?

  (पूज्य बापूजी का ८१वाँ अवतरण दिवस : १७ अप्रैल)

सच पूछो तो शरीर के जितने वर्ष हुए उतनीवीं उसकी वर्षगाँठ मनाना मतलब ‘मैं देह हूँ यह पक्का करना है । शरीर का जन्मदिवस तो मनाना ही नहीं चाहिए, मनाना है तो उन महापुरुषों का अवतरण दिवस मनाओ जिनके आने से दूसरों का कल्याण हुआ । भगवान कृष्ण का, रामजी का, वेदव्यासजी, आद्य शंकराचार्यजी, स्वामी श्री लीलाशाहजी जैसे ब्रह्मज्ञानियों का मनाओ तो ठीक है, बाकी अपना-अपना जन्मदिवस मनायेंगे कि ‘बापूजी ! आज मेरा जन्मदिवस है । तो तेरा जन्मदिवस क्या है, तेरे पुतले का है, शरीर का है ! तो जितने वर्ष हुए हैं उतने बड (आश्रम के बड बादशाह) को फेरे फिरो कि ‘इतने वर्ष तो खत्म हुए, बाकी न जाने कितने रहे... शरीर की यात्रा है । शरीर का जन्म हुआ, शरीर के वर्ष हुए, हमारा जन्म नहीं हुआ । ऐसा समझना चाहिए । कभी-कभी तो तुम अपना मनाओ-न मनाओ, तुम्हारे कुटुम्बी, प‹डोसी मनायें, माँ-बाप मनायें लेकिन फिर भी अगर असावधान रहे तो देहाध्यास पक्का हो जायेगा । दो आदमी मनाते हैं तो उतनी जोखिम, १०० मनायें तो और ज्यादा जोखिम, हजारों-लाखों लोग मनायें तो और ज्यादा जोखिम ।

बोलते हैं : ‘बापूजी ! जन्मदिन की बधाई हो !  अगर हम पर गुरु महाराज (साँर्इं श्री लीलाशाहजी महाराज) की कृपा नहीं होती तो हम समझते कि ‘हाँ, सचमुच, अब इतने साल हुए... अब इतने हुए... अब मेरा जन्मदिन आ रहा है... । गुरु महाराज की प्रसादी है इसलिए कसम खा के बोलता हूँ कि हमारा जन्म ही नहीं है । अब तुमको मनाना है तो मनाओ ।

आनंदमयी माँ का जन्मदिवस मनाया जा रहा था । भीड इकट्ठी हो गयी, दूर-दूर से लोग आये ।

वे बोलीं : ‘‘भाई ! आप इतने सब इकट्ठे हो गये... कोई भगवान की चर्चा करो, पूछो कोई सत्संग का सवाल । लोगों को लगा कि ‘इस बहाने संत के वचन मिलते हैं, संत का दर्शन मिलता है, चलो पूछते हैं । तो दिनकर राय नामक एक रिटायर्ड पोस्ट मास्टर थे । वे जरा विद्वान थे, सत्संगी भी थे, दूसरों को सत्संग सुनाते भी थे । सब लोगों ने उनको तैयार किया कि ‘तुम ऐसा कुछ प्रश्न पूछो कि माताजी १-२ घंटा बोलती रहें और अपने कान पवित्र होते रहें, अपना ज्ञान ब‹ढता रहे । उन्होंने सोच के प्रश्न पूछा : ‘‘माताजी ! आपका जन्म हुआ तब से लेकर आज तक आपके जीवन में क्या-क्या घटनाएँ घटीं, कैसे वैराग्य हुआ, क्या आया-क्या गया ?... बस, यही हमारा प्रश्न है । जन्म से लेकर अभी तक का आपका जीवन-चरित्र आपके मुख से सुनना चाहते हैं ।

माँ बोलीं : ‘‘पिताजी ! मेरा जन्म ही नहीं हुआ । यह उत्तर है मेरा ।

जन्म होता है देह का, आत्मा का जन्म नहीं होता । घडे का जन्म होता है, आकाश का नहीं होता । घडे में जो आकाश आता है न, उसको घटाकाश बोलते हैं । तो घडे बनने की तो तिथि-तारीख हो सकती है लेकिन घडे में आकाश आया क्या ? वह तो था ही । ऐसे ही जिनको बोध (आत्मबोध) हो जाता है उनको पता चलता है कि हमारा कभी जन्म नहीं और मृत्यु भी नहीं । जिस देह के द्वारा उस आत्मतत्त्व का पता लगा, उसका लोग आदर करें या अनादर करें, वह उनका पुण्य या पाप है, उनका भाग्य या प्रारब्ध है, उनकी मौज है । इसलिए आशाराम की तरफ से कोई आमंत्रण नहीं है, कोई कार्यक्रम नहीं, कोई नियोजन नहीं । समिति जाने, तुम लोग जानो । 

      

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