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संतों को बदनामी व जेल क्यों ?

जिन भी संतों-महापुरुषों ने संस्कृति-रक्षा व जन-जागृति का कार्य किया है, उनके खिलाफ षड्यंत्र रचे गये हैं । जगद्गुरु आद्य शंकराचार्यजी का इतना कुप्रचार किया गया कि उनकी माँ के अंतिम संस्कार के लिए उन्हें लडकियाँ तक नहीं मिल रही थीं । स्वामी विवेकानंदजी पर झूठा चारित्रिक आरोप लगाकर उन्हें खूब बदनाम किया गया । संत नरसिंह मेहताजी को बदनाम करने व फँसाने के लिए वेश्या को भेजा गया । संत कबीरजी पर शराबी-कबाबी, वेश्यागामी होने के घृणित आरोप लगाये गये । भक्तिमती मीराबाई पर चारित्रिक लांछन लगाये गये एवं उन्हें जान से मारने के कई दुष्प्रयास हुए । संत ज्ञानेश्वरजी को निंदकों द्वारा समाज से बहिष्कृत किया गया था ।

वर्तमान में भी शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वतीजी, स्वामी केशवानंदजी, श्री कृपालुजी महाराज, संत आशारामजी बापू आदि संतों पर विभिन्न झूठे आरोप लगा के उन्हें बदनाम करने का दुष्प्रयास किया गया ।

(१) द्वारका के श्री केशवानंदजी पर बलात्कार का आरोप लगाकर १२ साल की सजा दी गयी । ७ साल बाद निर्दोष बरी हुए ।

(२) शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वतीजी पर हत्या का आरोप लगाकर ११ नवम्बर २००४ को दिवाली के दिन पुलिस हिरासत में लिया गया । ९ साल बाद निर्दोष साबित हुए ।

(३) कृपालुजी महाराज पर ८५ साल की उम्र में २००७ में त्रिनीदाद देश में एक २२ साल की युवती के साथ बलात्कार का आरोप लगा । आरोप झूठा व निराधार साबित हुआ ।

(४) स्वामी लक्ष्मणानंदजी पर भी विभिन्न आरोप लगवाये गये थे । फिर २३ अगस्त २००८ को उनकी व उनके ४ शिष्यों की गोलियाँ मारकर निर्मम हत्या कर दी गयी । हत्या करनेवाले ७ ईसाइयों को उम्रकैद की सजा सुनायी गयी थी ।

(५) जगद्गुरु शंकराचार्य श्री राघवेश्वर भारती स्वामीजी (बेंगलुरु के श्री रामचन्द्रपुर मठ के प्रमुख) पर २६ अगस्त २०१४ को उनके मठ की रामकथा गायिका द्वारा दुष्कर्म का आरोप लगाया गया । न्यायालय ने एफएसएल व डीएनए की टेस्ट के निगेटिव आने तथा सीडी में फर्जी आवाज निकलने पर उन्हें निर्दोष बरी किया ।

संतों को इतनी बदनामी व जेल क्यों ? संतों द्वारा किये गये जन-जागृति व देशहितकारी कार्य जिन्हें रास नहीं आते, वे संतों को बदनाम करने, उन्हें सताने व जेल भेजने के षड्यंत्र करते हैं ।

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