हईशो-हईशो में ही बीत रही है पूरी जिंदगी
Ashram India

हईशो-हईशो में ही बीत रही है पूरी जिंदगी

ब्रह्मज्ञानविवेकनिर्मलधियः कुर्वन्त्यहो दुष्करं

यन्मुञ्चन्त्युपभोगभाञ्ज्यपि

धनान्येकान्ततो निःस्पृहाः 

सम्प्राप्तान्न पुरा न सम्प्रति

न च प्राप्तौ दृढप्रत्ययान्

वाञ्छामात्रपरिग्रहानपि परं

त्यक्तुं न शक्ता वयम् ।।

‘अहो ! ब्रह्मज्ञान के विवेक से निर्मल हुई बुद्धिवाले ज्ञानीजन असाध्य कर्म करते हैं कि उपभोग में आनेवाली उस समृद्धि को भी अत्यंत निःस्पृह होकर पूरी तरह से त्याग देते हैं जो उन्हें प्राप्त होकर सुख दे रही थी । वहीं हम उन सुखों को भी त्याग नहीं पाते जो हमें केवल अपनी गहरी तृष्णाओं के रूप में ही प्राप्त हैं और जो हमने न कभी पूर्व में पाये हैं, न अभी पा रहे हैं और न ही हमें भविष्य में कभी प्राप्त होंगे इस बात का कोई भरोसा है ।                   (वैराग्य शतक : १३)

किसीको न्यायाधीश बनने की इच्छा है तो किसीको डॉक्टर बनने की । कोई गाडी-बँगला पाना चाहता है तो कोई स्वर्ग आदि लोकों को । कोई धन की इच्छा लेकर बैठा है तो कोई मान की इच्छा ले के । बडा आश्चर्य है कि जो पहले नहीं मिला, अभी अप्राप्त है और ‘भविष्य में भी मिलेगा - ऐसा निश्चित नहीं है; उसकी भी इच्छा हम लोग नहीं छोड पाते हैं !

तात्पर्य यह है कि चीज-वस्तु, धन, पद आदि प्राप्त करना मना नहीं है परंतु पहले आसक्ति का त्याग करना परम आवश्यक है । जैसे भगवान श्रीरामचन्द्रजी, भगवान श्रीकृष्ण, राजा जनक आदि ने ब्रह्मज्ञान को महत्त्व दिया, प्राप्त किया और राज्य भी सँभाला, राजपद में आसक्त नहीं हुए । ऐसे ब्रह्मज्ञानी बिना क्लेश के क्षणभर में सब कुछ त्यागने का सामथ्र्य रखते हैं । योगी भर्तृहरिजी ने ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों की इस स्थिति को सराहा है और सज्जन मनुष्यों को इसकी प्राप्ति के लिए प्रेरित किया है ।

जैसे स्वप्न में प्राप्त धन उस समय तो प्राप्त-सा लगता है लेकिन जागने पर पता चलता है कि वह प्राप्ति की प्रतीति मात्र थी, ठीक इसी प्रकार जब आत्मज्ञान में जागेंगे तब पता चलेगा कि इस मिथ्या प्रपंच में प्राप्त पदार्थ भी जाग्रतरूपी स्वप्न में प्राप्त पदार्थ हैं, वास्तव में प्राप्त नहीं हैं । वास्तव में प्राप्ति तो केवल परमात्मा की ही होती है, अन्य तो मात्र प्रतीति या भ्रम है । मिथ्या जगत के पदार्थ मिल भी जायें तो भी अप्राप्त ही रहेंगे इसलिए वे अविश्वसनीय ही नहीं बल्कि सारहीन भी हैं ।

मनुष्य-शरीर का निर्माण हलकी इच्छाओं की पूर्ति हेतु नहीं बल्कि परमात्मप्राप्ति हेतु सत्संग, साधन-भजन, सेवा-सुमिरन का दृढ पुरुषार्थ करने के लिए हुआ है, जिसके फलस्वरूप अनंत सुख की प्राप्ति होती है । पूज्य बापूजी के सत्संग-वचनामृत में आता है : ‘‘श्रीरामचन्द्रजी का १६ वर्ष की उम्र में विवेक जगा कि ‘यह सब जगत नाशवान है । सब जीव इन्द्रियों के भोगों में जल रहे हैं, पच रहे हैं । जैसे मृग हरी-हरी घास चरता है और कब तीर आ गया, पता नहीं चलता तथा मारा जाता है; जैसे बिलार आ के चूहे को झपेट लेता है, ऐसे ही जो इन्द्रियों के भोग में, संसार-व्यवहार में रम जाता है उसका समय तो निकल ही जाता है और कालरूपी बिलार आ के झपेट लेता है ।

जिसको जलाना है उसीके लिए हईशो-हईशो करके मौत की तरफ ही तो जा रहे हैं और कर क्या रहे हैं ? कौन-सा बडा काम किया ? कोई बोले, ‘पहले निर्धन था, अब ब‹डा धनवान हो गया; बहुत बडा काम कर लिया ! अरे, धन सँभाल-सँभाल के मजदूरी करके मर गया, और क्या किया उसने ? ‘पहले तो निरक्षर था, अभी साक्षर हो गया; बडा काम कर लिया... पहले तो अप्रसिद्ध था, अभी इसको बहुत लोग जानते हैं; बडा काम कर लिया... अरे, फूटी कौडी भी नहीं कमायी । जिसको जलाना है उसके ऊपर नाम रखा, उस नाम की प्रसिद्धि हो गयी... जिसको जलाना है उसको ऐश-आराम दिलाया और उसीके लिए धन इकट्ठा करके मर गये ।

जैसे पतंगे परिणाम पर दृष्टि नहीं रखते और सुख लेने के लिए दीये में कूदते हैं, ऐसे ही जो जीव मूढ हुए हैं वे संसार के कीचड में, दलदल में अपने को फेंकते हैं । देखते हैं कि कई लोग फँसे हैं, कई मर रहे हैं और इस तरह मर के किसी सत्तावान, धनवान या कीर्तिवान का मोक्ष हो गया हो यह कहीं नहीं सुना । ऐसे लोग सत्संग के बिना, ज्ञान के बिना, आत्मसाक्षात्कार के बिना नरक में पडते हैं, कई योनियों में भटकते रहते हैं । अमुक राजा ने भोग भोगे फिर नरक में पडा, कोई कुछ करके स्वर्ग में गया फिर गिरा यह तो सुना लेकिन भोग्य वस्तुओं से किसीकी मुक्ति हुई यह आज तक नहीं सुना है । फिर भी इन्हींके पीछे लोग लग रहे हैं क्योंकि ऐसे अभागे लोगों की बहुमति है ।

यह शरीर दुःखों का कारण है । इसका कुछ ठिकाना भी नहीं । अल्प समय में, देखते-देखते यह नष्ट हो जाता है; आज है, कल नहीं । अतः निरंतर रहनेवाले, चिरंतन सत्य - आत्मा का ही चिंतन करना चाहिए । आत्मा शुद्ध, बुद्ध और पवित्र है । उसका ही ज्ञान कल्याणकारी है ।    

- लोक कल्याण सेतु अंक-236

Previous Article समस्याओं का अंत करते हैं संत
Next Article साँर्इं श्री लीलाशाहजी की अमृतवाणी
Print
493 Rate this article:
No rating

Please login or register to post comments.

Name:
Email:
Subject:
Message:
x