समस्याओं का अंत करते हैं संत
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समस्याओं का अंत करते हैं संत

परम सत्य इतना कमजोर नहीं...

श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा आयोजित कार्यक्रम में उनके बालसखा मुकुंद दत्त आमंत्रित नहीं थे । भक्तों ने जिज्ञासा दिखायी । गौरांग बोले : ‘‘मुकुंद मायावादियों का संग करता है । मायावादी वे धूर्त हैं जो यह सोचते हैं कि ‘परम सत्य का कोई रूप, नाम, गुण तथा स्वभाव सम्भव नहीं है ।ङ्क हमारा परम सत्य इतना निर्बल नहीं है जो साकार रूप व नाम को धारण न कर सके, वह सम्पूर्ण है । अतः मुकुंद को यहाँ मत आने दो ।

मुकुंद का हृदय टूट गया । भक्तों के द्वारा उसने प्रार्थना भेजी : ‘‘मैं आपकी शरण पुनः कब प्राप्त कर सकूँगा ? उत्तर मिला : ‘‘एक करोड जन्मों के बाद ! मुकुंद आनंदविभोर हो नृत्य करने लगा कि ‘अनंत जन्मों से ठोकरें खाते मुझ जीव को तब ही सही, मेरे प्रभु स्वीकार तो करेंगे ! मैं धन्य हूँ, महाधन्य हूँ !

मुकुंद के धैर्य व समर्पण ने उसके पूर्वकृत दोषों को दूर कर दिया । गौरांग ने तुरंत ही उसे बुलवा लिया । उसके अपराध क्षमा कर सूझबूझ दी कि श्रीकृष्ण, श्रीराम आदि भगवान के अवतारों एवं नित्य अवतारस्वरूप ब्रह्मनिष्ठ महापुरुषों में शरीरबुद्धि करनेवाले एवं उनसे ईष्र्या करनेवाले महापातकी व्यक्तियों का पुनः कभी संग न करे ।

महापुरुष तुमसे लेते भी क्या हैं ?

एक बार गौरांग ने अपनी माँ शचीदेवी के चरणों में गिरकर प्रार्थना की : ‘‘माँ ! मुझे एक वस्तु दान में दोगी ?

माँ : ‘‘पुत्र ! जो तुम माँगोगे वह दूँगी ।

‘‘आप एकादशी के दिन उपवास रखें और उस दिन अन्न त्याग दें ।

‘‘तुम्हारी माँग उत्तम है, मैं इसे पूरा करूँगी ।

धन्य हैं ऐसे सुपुत्र, जो अपने स्वार्थ के लिए नहीं, दूसरों के कल्याण के लिए ऐसे व्रत का संकल्प दान में माँगते हैं और धन्य हैं ऐसी माताएँ, जो सहज में ऐसा व्रत लेकर आजीवन निभाती हैं ! वर्तमान समय में एक साथ हजारों-लाखों लोगों से व्यसन छोडने एवं साधन-भजन करने का व्रत गुरुदक्षिणा में लिवाते हुए किन्हीं महापुरुष को आपने देखा है ? व्यसन मांस और मद्य छुडाये... लाखों के हैं रोग मिटाये... शोक करोडों के हैं छुडाये... बस-बस, जान गये बाबा ! पहचान गये ।

पुस्तकीय कृमि नहीं महापुरुष-अनुगामी बनें

पूर्वी बंगाल के तपन मिश्र ब्राह्मण परम तत्त्व का अनुभव करने हेतु अनेक पुस्तकों का अध्ययन करते थे लेकिन गुत्थी सुलझी नहीं, उलझती ही गयी । एक रात को स्वप्न में एक दिव्य पुरुष ने उन्हें गौरांग के पास जाने का संकेत किया ।

तपन बडे आदरपूर्वक महाप्रभु के चरणों में गये तो उन्होंने उपदेश के साथ समझाया : ‘‘जड पुस्तकों का कृमि बनकर कोई भी मनुष्य चेतन आत्मतत्त्व को नहीं जान सकता अपितु भगवान और भगवत्स्वरूप महापुरुषों की आज्ञानुसार चल के ही उसका अनुभव किया जा सकता है ।

तपन को ढेरों पुस्तकों से जो शांति और समाधान नहीं मिला था वह  एक   हयात महापुरुष के कुछ वचनों से मिल गया । जो ऐसे प्रकट महापुरुषों का सम्मान करते हैं वे तो आबाद होते हैं किंतु जो उन्हें अपमानित व प्रताडित करते हैं, उनको प्रकृति का कोप झेलना ही पडता है ।  

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