न जाने क्यों लोग संसाररूपी बंधनालय में प्रवेश करते हैं !
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न जाने क्यों लोग संसाररूपी बंधनालय में प्रवेश करते हैं !

तुङ्गं वेश्म सुताः सतामभिमताः

सङ्ख्यातिगाः सम्पदः

कल्याणी दयिता वयश्च नवमित्यज्ञानमूढो जनः ।

मत्वा विश्वमनश्वरं निविशते संसारकारागृहे

संदृश्य क्षणभङ्गुरं तदखिलं धन्यस्तु संन्यस्यति ।।

‘ऊँची हवेली, विद्या-विनयादि द्वारा सज्जनों को मान्य पुत्र, असंख्य धनराशि, अनुकूल व सुंदरी पत्नी, यौवन तथा संसार (गृह-पुत्रादि) चिरस्थायी हैं - ऐसा मानकर अज्ञान के कारण मूर्ख लोग संसार (प्रपंच) रूप बंधनालय (जेल) में प्रवेश करते हैं । भाग्यवान विरला पुरुष ही उन सबको क्षणभंगुर सोच के उस संसार से विरक्त हो उसका त्याग कर देता है । (वैराग्य शतक: २०)

भर्तृहरिजी महाराज समझा रहे हैं कि कैसे मनुष्य मूढतावश संसार में फँसा हुआ है । अगर विचार करे तो संसार की असारता उसे समझ में आ जाय । मछली केंचुओं को अज्ञानवश पकडने के लिए दौडती है और फँस मरती है, पतंगा अज्ञान के कारण ही अग्नि की लपटों में अपने को भस्म कर देता है किन्तु मनुष्य जिसके पास इतनी बुद्धि है, जो विचारवान कहा जाता है, न जाने क्यों दुःख, दोषपूर्ण विषय-भोगों में लिपटा रहता है ।

अपवित्र गर्भ से उत्पन्न होकर, युवावस्था में विषय-भोग में लगे रह के, मानसिक अशांति भोग के, वृद्धावस्था में कोमल अंगोंवाली युवतियों के हास्यजनक पदार्थ हो के मनुष्य न जाने कैसे इस संसार में इस शरीर से सुख प्राप्त करना चाहते हैं !

यह जानकर भी कि वृद्धावस्था राह देखा करती है, मृत्यु अपने मुख में रखने के लिए सदा प्रतीक्षा किया करती है, रोग मन और शरीर को सदा विकृत किया करते हैं, न जाने मनुष्य किस प्रकार अविचारी रूप से बुद्धिहीन होकर सदा पापकर्म किये जाता है ! कितने आश्चर्य की बात है !!

पूज्य बापूजी के सत्संग में आता है : ‘‘जो मिला है, छूटने के लिए मिला है । ऐसी कोई सम्पदा नहीं जिससे हाथ धोना न पडे । ऐसा कोई शरीर नहीं जिसको छोडकर मरना न पडे । ऐसा कोई संयोग नहीं जहाँ वियोग न हो ।

संसार तेरा घर नहीं, दो-चार दिन रहना यहाँ ।

कर याद अपने आप की, शाश्वत सुख व ज्ञान जहाँ ।।

अपने आत्मराज्य की याद करो, अपने स्व के राज्य को पाओ । जो सदा सुखस्वरूप है, ज्ञानस्वरूप है, अमर है, आनंदस्वरूप है, जिसको तुम कभी छोड नहीं सकते उस परमेश्वर को पा लो । जिन चीजों को रख नहीं सकते उनके लिए कितनी कूदफाँद करोगे ?

छूट जानेवाली वस्तु नहीं मिली तो क्या हो गया ? अपने अंतर्यामी को धन्यवाद दो, ‘अच्छा है, तेरी मर्जी... वाह ! वाह ! और जिनको मिल जाता है उनकी तो आसक्ति मिटी नहीं, उनको फिर-फिर से चाहिए । तो

कबीरा कुत्ते की दोस्ती दो बाजू जंजाल ।

रीझे तो मुँह चाटे, खीझे तो पैर काटे ।।

तो दोनों तरफ मार क्यों खाना ? सत्संग रक्षक है । विदेशों में और सब कुछ है लेकिन आत्मज्ञान का सत्संग दुर्लभ है इसलिए लोग परेशान भी खूब हैं । यहाँ आत्मज्ञान का सत्संग है इसलिए परेशानी इतनी नहीं है । कौसल्या, कैकेयी, सुमित्रा रामराज्य और रामजी को छोडकर आत्मशांति पाने को शृंगी ऋषि के आश्रम में जाती हैं । राजा भर्तृहरि उज्जयिनी का राजपाट छोडकर चले गये गोरखनाथजी के चरणों में और दीक्षा ले ली । लँगोटीधारी साधु हो गये और साधना करते हैं, कंदमूल खाते हैं । अपने आत्मा-परमात्मा के ज्ञान को, परमात्म-शांति को पाने का कितना भारी महत्त्व है !          

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