कौन मारेगा बाजी ?
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कौन मारेगा बाजी ?

एक गुरु के दो शिष्य थे । एक पढ़ने में तेज, बुद्धिमान, परिश्रमी था और दूसरा आलसी, फरियादी स्वभाव का था । पहला जहाँ भी जाता उसको मान-सम्मान मिलता जबकि दूसरे को कोई पूछता तक नहीं था । एक दिन दूसरेवाले शिष्य ने गुरुजी से कहा : ‘‘गुरुजी ! मैं तो इससे पहले से ही आपसे ज्ञान प्राप्त कर रहा हूँ परंतु आपने मुझसे ज्यादा शिक्षा इसको दी ।’’

गुरुजी बोले : ‘‘बेटा ! सुन, एक प्यासा राही रास्ते से जा रहा था । रास्ते में उसने देखा कि कुएँ के पास बाल्टी तो है परंतु रस्सी नहीं है । प्यासा होकर भी वह आगे निकल गया । कुछ देर बाद दूसरा एक प्यासा राहगीर उसी रास्ते से गुजरा । कुएँ के पास आने पर उसने इधर-उधर दृष्टि दौड़ायी और आसपास से लम्बी-लम्बी घास इकट्ठी कर उसकी रस्सी बनायी । उसकी सहायता से बाल्टी कुएँ में डाल के पानी निकाला व अपनी प्यास बुझायी । अब तुम यह बताओ कि उन दो राहियों में से किसको ज्यादा प्यास थी ?’’

शिष्य बोला : ‘‘दूसरे राहगीर को, उसने प्यास बुझाने के लिए पुरुषार्थ किया ।’’

तब गुरु ने कहा : ‘‘बेटा ! तुममें और तुम्हारे सहपाठी में यही फर्क है । उसमें ज्ञान की तेज प्यास है । वह मेहनत करके पढ़ाई करता है । जिस प्रश्न का जवाब नहीं आता उसे मुझसे पूछकर समझ लेता है और अपनी ज्ञान की प्यास को बुझा लेता है । तुम्हें ज्ञान की प्यास नहीं है ।’’

शिष्य ने गुरु के उपदेश को आदर से समझा तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ । उसने गुरु को साष्टांग प्रणाम किया और उनके मार्गदर्शन में पुरुषार्थ करने का निश्चय किया ।

जो सतत उद्यमशील रहता है, सफलता उसीका वरण करती है । कहा भी गया है :

उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ।।

उद्यम (पुरुषार्थ) से ही सब कार्य सफल होते हैं, केवल मन में विचार करने मात्र से नहीं । जैसे सोये हुए सिंह के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करते वैसे ही संसार में उद्यम के बिना कोई कार्य सफल नहीं हो सकता । पुरुषार्थ से ही सफलता और सौभाग्य के द्वार खुलते हैं । संसार की चीजें पाने में मेहनत करते हैं तो वे थोड़ा-बहुत मिलती हैं जितना प्रारब्ध आदि साथ दें और बाद में छूट जाती हैं लेकिन परम पुरुष परमात्मा को जानने के अर्थ उद्यम करते हैं तो वह ‘पुरुषार्थ’ कहलाता है और ईश्वर का अनुभव कराके जीवन्मुक्त बना देता है । फिर संसार तो छाया की तरह अनुगमन करता है और बाँधता भी नहीं है ।    

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