सूर्य भगवान किस सूर्य का पूजन करते हैं ?
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सूर्य भगवान किस सूर्य का पूजन करते हैं ?

(मकर संक्रांति : १४ जनवरी)

ब्रह्माजी को याज्ञवल्क्य मुनि ने कहा : ‘‘महाराज ! मैं सूर्यनारायण की उस आराधना-विधि को सुनना चाहता हूँ, जिसके द्वारा मैं संसार-सागर को पार कर जाऊँ ।

भक्तिभाव से परिपूर्ण याज्ञवल्क्यजी के इन वचनों को सुन के ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर कहा : ‘‘याज्ञवल्क्य ! एक बार मैंने भगवान सूर्यनारायण की स्तुति की । उस स्तुति से प्रसन्न होकर वे प्रत्यक्ष प्रकट हुए, तब मैंने उनसे पूछा कि ‘‘महाराज ! वेद-वेदांगों में और पुराणों में आपका ही प्रतिपादन हुआ है । आप शाश्वत, अज तथा परब्रह्मस्वरूप हैं । आप ही सबके माता-पिता और पूज्य हैं । आप किस देवता का ध्यान एवं पूजन करते हैं ?

भगवान सूर्य ने कहा : ‘‘ब्रह्मन् ! यह अत्यंत गुप्त बात है qकतु आप मेरे परम भक्त हैं इसलिए मैं इसका यथावत् वर्णन कर रहा हूँ । वे परमात्मा सभी प्राणियों में व्याप्त, अचल, नित्य, सूक्ष्म तथा इन्द्रियातीत हैं । उन्हें क्षेत्रज्ञ, पुरुष, हिरण्यगर्भ, महान, प्रधान तथा बुद्धि आदि अनेक नामों से अभिहित किया (कहा) जाता है । जो तीनों लोकों के एकमात्र आधार हैं, वे निर्गुण होकर भी अपनी इच्छा से सगुण हो जाते हैं, सबके साक्षी हैं, स्वतः कोई कर्म नहीं करते और न तो कर्मफल की प्राप्ति से संलिप्त रहते हैं । वे परमात्मा सब ओर सिर, नेत्र, हाथ, पैर, नासिका, कान तथा मुख वाले हैं, वे समस्त जगत को आच्छादित करके अवस्थित हैं तथा सभी प्राणियों में स्वच्छंद होकर आनंदपूर्वक विचरण करते हैं । शुभाशुभ कर्मरूप बीजवाला शरीर ‘क्षेत्र कहलाता है । इसे जानने के कारण परमात्मा ‘क्षेत्रज्ञ कहलाते हैं । वे अव्यक्तपुर में शयन करने से पुरुष, बहुत रूप धारण करने से विश्वरूप और धारण-पोषण करने के कारण महापुरुष कहे जाते हैं । ये ही अनेक रूप धारण करते हैं ।

जिस प्रकार एक ही वायु शरीर में प्राण-अपान आदि अनेक रूप धारण किये हुए है और जैसे एक ही अग्नि अनेक स्थान-भेदों के कारण अनेक नामों से अभिहित की जाती है, उसी प्रकार परमात्मा भी अनेक भेदों के कारण बहुत रूप धारण करते हैं । जिस प्रकार एक दीप से हजारों दीप प्रज्वलित हो जाते हैं, उसी प्रकार एक परमात्मा से सम्पूर्ण जगत उत्पन्न होता है । जब वे अपनी इच्छा से संसार का संहार करते हैं, तब फिर एकाकी ही रह जाते हैं । परमात्मा को छोडकर जगत में कोई स्थावर (स्थिर) या जंगम (चलने-फिरनेवाले) पदार्थ नित्य नहीं है क्योंकि वे अक्षय, अप्रमेय और सर्वज्ञ कहे जाते हैं । उनसे बढकर कोई अन्य नहीं है, वे ही पिता हैं, वे ही प्रजापति हैं, सभी देवता और असुर आदि उन परमात्मा भास्करदेव की आराधना करते हैं और वे (परमात्मा) उन्हें सद्गति प्रदान करते हैं । वे सर्वगत होते हुए भी निर्गुण हैं । उसी आत्मस्वरूप परमेश्वर का मैं ध्यान करता हूँ तथा सूर्यरूप अपने आत्मा का ही पूजन करता हूँ ।

ब्रह्माजी ने कहा : ‘‘हे याज्ञवल्क्य मुने ! भगवान सूर्य ने स्वयं ही ये बातें मुझसे कही थीं । आप स्वयं भी अपने आत्मसूर्य का पूजन करके संसार-सागर से तर सकते हैं । 

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