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कितने महत्त्वपूर्ण हैं देशी गायों के सींग !

देशी गायें केवल अपने पंच गव्यों (दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र) से ही हमको पोषित नहीं करतीं अपितु सूक्ष्म, अति सूक्ष्म सौर ऊर्जा, ब्रह्मांडीय ऊर्जा (cosmic energy) आदि को प्राप्त कर उनसे भी समस्त प्राणियों को लाभान्वित करती हैं । क्या आप जानते हैं यह कैसे होता है ? उनके शीश पर सुशोभित होनेवाले सींगों की उत्पत्ति का इतिहास एवं सींगों की विशेषताएँ इसका रहस्योद्घाटन करती हैं ।

भगवान वेदव्यासजी कहते हैं : ‘‘गौएँ पहले बिना सींग की ही थीं । उन्होंने सींग के लिए भगवान ब्रह्माजी की उपासना की । ब्रह्माजी ने गौओं को प्रायोपवेशन (आमरण उपवास) करते देख उनमें से प्रत्येक को उनकी अभीष्ट वस्तु दी । वरदान मिलने के पश्चात् गौओं के सींग प्रकट हो गये । जिसके मन में जैसे सींग की इच्छा थी, उसके वैसे ही हो गये । नाना प्रकार के रंग-रूप और सींग से युक्त हुई उन गौओं की बड़ी शोभा होने लगी ।’’ (महाभारत, अनुशासन पर्व : 81.13-15)

जैसे टी.वी. या मोबाइल टॉवर का रिसीवर उसकी तरंगें ग्रहण करता है वैसे गाय के सींग अंतरिक्ष में स्थित सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, तारे, देवगण (शुभ नक्षत्रों का समूह), सप्तर्षि आदि से प्रवाहित आकाशीय ऊर्जा को ग्रहण करके गाय के शरीर में प्रवाहित करते हैं । यह ऊर्जा गाय के दूध आदि पाँच गव्यों के द्वारा हमें प्राप्त होती है । अंतरिक्ष की इस शक्ति को आकृष्ट करने की शक्ति अन्य सींगवाले पशुओं में नहीं होती ।

दिन में सौर ऊर्जा को ग्रहण करने के लिए गौमाता सूर्यताप में जाने के लिए आकृष्ट रहती है और रात्रि में चन्द्रमा की सौम्य ऊर्जा एवं ग्रह-नक्षत्रों की विद्युत-चुम्बकीय तरंगें भी ग्रहण करने के लिए खुले आकाश के नीचे बैठना ही पसंद करती है ।

गायों में ऊर्ध्व, अधः, कुंडलाकार, वक्र आदि अनेक प्रकार के सींग देखने को मिलते हैं । ऊर्ध्व सींगवाली गायों का दूध अधिक ऊर्जाप्रद रहता है । महर्षि अग्निवेश ने आयुर्वेद औषधार्थ ऐसी गायों के दूध, घी को ग्रहण करने का संकेत किया है । अर्धचन्द्राकृति सींगोंवाली गायें चन्द्रमा की सौम्य ऊर्जा को विशेष संग्रहित करती हैं । पित्तदोष शमनार्थ एवं पित्त-संबंधी व्याधियों के प्रतिकार के लिए ऐसी गायों का दूध आदि सेवन करना चाहिए ।

गायों के सींग की खाद : पूर्णिमा के दिन (शरद पूर्णिमा का दिन सर्वोत्तम) 2 फीट लम्बे, 2 फीट चौड़े और 2 फीट गहरे गड्ढे का 9 इंच गहरा भाग गाय के गोबर से पाट (भर) दें । फिर मृत दुधारू गायों के सींगों में गोबर भरकर उनके मुँहवाले हिस्से गोबर में फँसा दें और नुकीले सिरे ऊपर रखें । इनके ऊपर गोबर पाट दें और दूसरी पर्त में भी सींगों को रोप दें । अब गड्ढे के बाकी बचे हिस्से को भी गाय के गोबर से पाट दें और भूमि समतल कर दें । छः माह बाद अमावस्या को (अगर सम्भव न हो तो कृष्ण पक्ष की किसी अन्य तिथि को) उन्हें बाहर निकालें । सींगों में से पाउडर बाहर निकाल के सुरक्षित रख लें । बुवाई के समय पाउडर का (1 ग्राम प्रति लीटर के हिसाब से) पानी में घोल बना के जमीन पर छिड़कें । अत्यंत प्रभावशाली भूमि-उर्वरक बनाने की अपनी इस सुंदर शास्त्रीय युक्ति का किसान फायदा उठायें ।

    ध्यान दें : प्राकृतिकरूप से मरी हुई गायों के सींगों का ही उपयोग लाभकारी है, कत्लखानों में मारी गयी गायों के सींगों का नहीं ।

     (विस्तृत जानकारी हेतु देखें लोक कल्याण सेतु’, सितम्बर 2011 अथवा लिंक - https://goo.gl/2UrXfQ)

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