साँर्इं श्री लीलाशाहजी की अमृतवाणी
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साँर्इं श्री लीलाशाहजी की अमृतवाणी

मोक्ष का एकमात्र उपाय

स्वयं को स्वप्न में भुलाकर बैठते हैं, जब जागते हैं तब जानते हैं कि ‘मैं तो इस सपने का दर्शक था । यह संसार और शरीर बदलते रहते हैं, बादलों की तरह आयेंगे-जायेंगे ।

विद्या वह जो कंठ (याद) हो और पैसा वह जो गाँठ में हो । जिसमें दैवी सम्पदा के गुण हैं वही मोक्ष प्राप्त करेगा । योग, तप, मंत्र आदि से मन शुद्ध होता है, तत्पश्चात् ज्ञान होगा । मोक्ष का उपाय एक आत्मज्ञान है ।

एक ऐसा मटका जो कभी नहीं भरता

हम नासमझी के कारण काम, क्रोध, मोह, अहंकार और लोभ में डूबे हुए हैं । इन विकारों में से एक भी होगा तो सफलता नहीं मिलेगी । तृष्णा ही है जो मनुष्य को जन्म-मरण के चक्कर में भटकाती है । मन को कहना चाहिए, ‘मैं बहुत दिनों तक तुम्हारा नौकर बनकर रहा परंतु अब तुम्हें अपना सेवक बनाऊँगा । तृष्णा ऐसी वस्तु है कि वह तृप्त होनेवाली नहीं है । यह ऐसा मटका है जो वास्तव में भरनेवाला नहीं है, चाहे हजार-लाख मन उसके भीतर डालो तो भी खाली-का-खाली रहेगा ।

इसे कहते हैं वैराग्य !

शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध के आकर्षण में फँसने से बचना चाहिए और दुनिया की वस्तुओं से मोह-ममतारहित हो आवश्यकतानुसार उनसे काम निकालना चाहिए । संसार की कोई भी वस्तु और शरीर न सुंदर है न प्रेमरूप है और न आनंदरूप । ये नाशवान हैं । संसार और शरीर को उपरोक्त रीति से ठीक समझकर उसकी आसक्ति से बचो । इसे कहते हैं वैराग्य !       

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