रोग की उत्कृष्ट रसायन औषधि पानी में क्यों फेंकना ?
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रोग की उत्कृष्ट रसायन औषधि पानी में क्यों फेंकना ?

- स्वामी अखंडानंदजी सरस्वती

जो आर्त है वह भगवान को पाता है । जिनको कोई बल है (बल को अपना मानते हैं) - धन, जन, बुद्धि, पद, विद्या आदि का बल, उनके ऊपर जो भगवत्कृपा बरसती है, उसका उन्हें अनुभव नहीं होता । आर्त का दिल थोडा गीला होता है तो जो भगवान की कृपा आती है वह उसमें अटक जाती है और अभिमानी का जो दिल है वह थोडा सख्त होता है तो भगवान की कृपा उसके अभिमान के ऊपर से छलककर बह जाती है ।

हमारी वेदांत में बचपन से बहुत रुचि थी, सत्संग में भी रुचि थी । एक महात्मा के पास गये तो उन्होंने कहा : ‘‘देखो, तुम चाहे वेदांत सीखना चाहो, चाहे भक्त बनना चाहो, चाहे धर्मात्मा होना, एक बात हमारी याद रखना - जब तक शास्त्र का एक-एक अक्षर तुमको सच्चा मालूम न पडे, तब तक समझना कि अपने ही ज्ञान में गलती है और शास्त्र सच्चा है । ये शास्त्र जिस देश में, जिस काल में, जिस जाति में, जिस अवस्था में, जिस अधिकारी के लिए जिस वस्तु का वर्णन करते हैं उस रूप में वे बिल्कुल ठीक हैं । और जिस ब्रह्मज्ञान के हो जाने पर शास्त्र बाधित हो जाते हैं यह वर्णन भी शास्त्र करते हैं कि हम बाधित हो जाते हैं ।

शास्त्र बताते हैं कि अमुक अवस्था में सब मिथ्या है । तो उन्होंने कहा : ‘‘देखो, वह अवस्था तो प्राप्त न हो अर्थात् तत्त्व-साक्षात्कार तो प्राप्त न हो और यह भक्ति जो अंतःकरण का निर्माण करनेवाली, सर्वोत्तम रसायन, सर्वोत्तम औषधि है अब इसको मिथ्या कह देना माने आरोग्य-रसायन को अपने हाथ से फेंक देना है । जैसे रोगी उत्कृष्ट औषधि को अपने हाथ से फेंक दे, यह वैसा ही है ।

जिसका अंतःकरण अशुद्ध है, विकारयुक्त है, संसार के राग-द्वेष से दूषित है, यदि वह भगवान की भक्ति का त्याग कर दे तो उसने क्या किया ? कि रोगी ने अपने रोग की उत्कृष्ट रसायन औषधि पानी में फेंक दी । कैसे सुधरेगा उसका अंतःकरण ?

तो वे जो सिद्ध महापुरुष थे उन्होंने हमको बात बतायी कि ‘‘जैसे जिज्ञासु के लिए वेदांत सत्य वस्तु का प्रतिपादन करता है, वैसे भगवत्प्रेमी के लिए भक्ति-शास्त्र अंतःकरण को शुद्ध करके भगवदाकार करने के लिए बिल्कुल शुद्ध वस्तु का प्रतिपादन करता है । भगवान से प्रेम करना यह बडा कल्याणकारी है, मंगल है !    

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