अलौकिक भगवद्रस का पान करानेवाली महापुण्यमयी रात्रि
Ashram India

अलौकिक भगवद्रस का पान करानेवाली महापुण्यमयी रात्रि

(शरद पूर्णिमा : 5 अक्टूबर)

एकोऽहं बहु स्याम् । जैसे एक स्वप्नद्रष्टा अनेक हो जाता है, ऐसे ही एक परमेश्वर-सत्ता अनेकरूप हो जाती है । पृथ्वी में उसी परमेश्वर की सत्ता पेड़-पौधों को, बीजों को पोषण देती है । पृथ्वी का कण-कण मधुमय परमात्मा से संचारित, जल की बूँद-बूँद स्वादमय सत्ता से सम्पन्न, वायु का हर झोंका सच्चिदानंद की सत्ता से सराबोर...

भगवान श्रीकृष्ण गीता (7.8) में कहते हैं :

प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।

‘चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश मैं हूँ ।’

पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ।

‘रसस्वरूप, अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों, वनस्पतियों को मैं पुष्ट करता हूँ ।’     (गीता : 15.13)

चन्द्रलोक से वह रस चन्द्रमंडल में आता है, चन्द्रमंडल का रस धरती के पेड़-पौधों, अन्न-औषधियों, गर्भस्थ शरीरों को पुष्ट करता है । अन्न-औषधियों से हमारा तन पुष्ट व मन स्फुरित होता है । मधुमय की कैसी मधुमय लीला है ! वे ही मधुमय परमेश्वर साकार होकर भक्तों के छुपे हुए आनंदस्वभाव को जगाने के लिए प्रेमावतार, कृष्णावतार ले के आते हैं ।

जो पृथ्वी (धरा) का सुख है देखने, चखने, सूँघने, स्पर्श करने, सुनने का, वह विकारी सुख है । निर्विकारी सुख (अधरामृत) देने की ठान ली श्रीकृष्ण ने कि ‘शरद पूनम की रात को मैं बंसी बजाऊँगा और जो अधिकारी होंगे उनको वह ‘क्लीं’ बीजमंत्र की ध्वनि, वह आनंददायिनी ध्वनि सुनायी पड़ेगी ।’

वे पुण्यशीला, महात्मास्वरूपिणी गोपियाँ दौड़ती-भागती जंगल में पहुँचीं । शुद्ध हवामान है और शरद पूनम की रात है । श्रीकृष्ण ने सब कुछ जानते हुए भी लोक-उपदेश के निमित्त उन गोपियों को थोड़ा झकझोरा : ‘‘इस बेला में जंगल में कैसे आयी हो ? शरद पूनम की रात के कारण रंग-बिरंगे पुष्पों से लदे इस वन की लताओं की, पेड़-पौधों की चमक देखने को आयी हो ? देख लिया, अब अपने-अपने घर जाओ । अपने बच्चों को देखो, पति, ससुर-सासु आदि की सेवा करो !’’

गोपियाँ कोई साधारण आत्मा नहीं हैं । इन गोपियों से प्रेमाभक्ति का प्रसाद नारदजी, उद्धवजी और अर्जुन ने पाया ।

गोपियाँ कहती हैं : ‘‘हे आचार्यदेव ! हम तो अधरामृत का पान करने आयी हैं । ये रीति-रिवाज, कर्तव्य की अपनी सीमा है और इन सारे कर्तव्यों का फल है कि परमात्मा के सत्-चित्-आनंदस्वभाव का प्रसाद पाकर मुक्तात्मा, निहालात्मा, तृप्तात्मा होना । तुम क्या हो, केशव ! हम तुम्हें जानती हैं और आप हमें अपने घर भेजना चाहते हो तो हम आपसे कहती हैं कि हम सचमुच में अपने घर आयी हैं । जीव का वास्तविक घर परमात्मा है । घर-परिवार, धर्म-अनुष्ठान वैराग्य लाने के लिए हैं और वैराग्य का फल है भक्तियोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग । अब हमें तुम सीख देते हो कि जाओ । माधव ! जिसने आपके शब्दब्रह्म का, अधरामृत का, भगवद्रस का पान कर लिया है, उसका मन फिर दूसरी आसक्तियों में नहीं फँसता है ।’’

गोपियों की करुण पुकार सुनकर सम्पूर्ण योगों के स्वामी पीताम्बरधारी भगवान श्रीकृष्ण गले में वनमाला पहने व मुखकमल पर मंद-मंद मुस्कान लिये दो-दो गोपियों के बीच सहसा प्रकट हो गये । हरेक गोपी के संग एक श्रीकृष्ण, ऐसे सहस्रों गोपियों के साथ दिव्य रासोत्सव प्रारम्भ हुआ । स्वर्ग की दिव्य दुंदुभियाँ अपने-आप बज उठीं । स्वर्गीय पुष्पों की वर्षा होने लगी ।

भगवान जीवों पर कृपा करने के लिए ही मनुष्यरूप में प्रकट होते हैं और ऐसी लीलाएँ करते हैं, जिन्हें देख-सुनकर जीव विकारी रस से उपराम हो के भगवद्रस-परायण हो जाय ।

राजा परीक्षित ने शुकदेवजी से पूछा : ‘‘गोपियाँ श्रीकृष्ण को अपना परम प्रियतम मानती थीं । वे उन्हें कोई परात्पर परब्रह्म तो मानती नहीं थीं, अंतर्यामी आत्मा तो मानती नहीं थीं । ऐसे में उनके लिए गुणों के प्रवाहरूप इस संसार की निवृत्ति कैसे सम्भव हुई और उन्होंने आंतरिक रस - अधरामृत कैसे पा लिया ?’’

श्री शुकदेवजी कहते हैं : ‘‘चेदिराज शिशुपाल भगवान से द्वेषभाव से जुड़ा था, गोपियाँ जारभाव से जुड़ी थीं, कंस शत्रुभाव से, भय से जुड़ा था । कोई प्रेमभाव से जुड़ा है, कोई किसी भाव से जुड़ा है किंतु सब जुड़े तो परात्पर ब्रह्म से, सच्चिदानंदस्वरूप परमात्मा से ही हैं । वृत्तियाँ भगवान से जुड़ती हैं इसलिए भगवन्मय हो जाती हैं ।’’

आप क्या हैं और भगवान से किस भाव से जुड़े हैं - इसका महत्त्व नहीं है । महत्त्व इसका है कि आप किससे जुड़े हैं । आप किसी भी भाव से भगवान से जुड़ो तो आपको भगवद्रस ही मिलेगा । इस भगवद्रस के बिना सच्ची शांति, सच्चा सुख नहीं मिलता । इसे पाने के लिए जप, ध्यान, सुमिरन तो सहायक हैं परंतु शरद पूनम की रात्रि उनमें चार चाँद लगा देती है । ऐसी मंगल रात्रि में आप भी थोड़ा जप-ध्यान करके भगवद्-शरण स्वीकारें और परमेश्वर में गोता मारकर भगवद्-सुख, भगवद्-रस उभारें ।

अमृतमय खीर का लाभ लें

शरद पूनम को चन्द्रमा की सात्त्विक तरंगें पृथ्वी पर आती हैं । आप लोग इसका फायदा उठाना । रात को आप खीर बना लेना । 200 ग्राम पके चावल में एक लीटर दूध डालकर 2-4 उफान आने तक गर्म करो । बन गयी खीर । बादाम, काजू, पिस्ता नहीं डालना, नहीं तो गुर्दों पर भार पड़ेगा । प्रति व्यक्ति 1-2 काली मिर्च दूध में उबालनी चाहिए, जिससे दूध का वायु-दोष दूर हो जाय । चन्द्रमा की चाँदनी में खीर 8.30 से 11 बजे तक (2-3 घंटे) रख देना, फिर थोड़ी खाना और बाकी सुबह खा लेना क्योंकि ज्यों देर रात होती है, त्यों जठराग्नि मंद होती है । खाते समय थोड़ा मेरी तरफ भी इशारा कर देना : ‘लो बाबा ! खाओ ।’ संत और भगवान तो भाव के भूखे हैं । उस समय भाव से तुम्हारा हृदय पवित्र होगा और भोजन प्रसाद बन जायेगा ।

गाय का दूध पृथ्वी का अमृत माना जाता है लेकिन उसमें दुनियाभर की चीजें डालकर दूध को गाढ़ा करके खीर बनाना खाना खराब करना है । जितना गाढ़ा दूध उतना पचने में मुश्किल और उसका कुछ भाग नहीं पचा तो आम (अपक्व आहार रस) बन जाता है, जो आगे चलकर अनेक रोग, गाँठें (ट्यूमर), कैंसर बना देता है ।

शरद पूर्णिमा में पायें स्वास्थ्य-लाभ

विजयादशमी के बाद एकादशी से पूर्णिमा तक केदिनों में चन्द्रमा में विशेष औषधि-पुष्टि के साथ-साथ प्रसन्नता और आरोग्यता की वृद्धि करनेवाला आभामंडल बनता है । इन दिनों में चन्द्रमा की चाँदनी को देखना हितकारी है । हो सके तो चाँदनी में सूई में धागा पिरोयें, इससे नेत्रज्योति बढ़ती है । चन्द्रमा की चाँदनी गर्भिणी स्त्रियों की नाभि पर पड़े तो गर्भस्थ शिशु विशेष प्रभावशाली व प्रसन्न होते हैं ।

गाय का घी, शहद और

त्रिफला - इनका मिश्रण करके चन्द्रमा की चाँदनी में रातभर रखो । सुबह काँच की बर्नी में रख दो (त्रिफला रसायन) । सुबह-शाम 10-10 ग्राम 40 दिन खाओ । मैंने तो 60 दिन खाया तो चश्मा उतर गया ।

त्रिफला रसायनवाले त्रिफला रसायन बनायें, खीरवाले खीर को अमृतमय बना-बनाकर खायें, नेत्रज्योति बढ़ाने की इच्छावाले चन्द्रमा पर त्राटक करें परंतु सभी भगवच्चिंतन करते-करते आत्मज्योति, रसमय प्रभु की मंगलमय, मधुमय शांति, भक्ति, प्रीति में पावन जरूर होयें ।

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The Supremely Meritorious Night of Sharad Purnima

 gives the Transcendental Divine Joy      – Pujya Bapuji

(Sharad Purnima: 26th October)

एकोऽहं बहु स्याम् ।. “I am One. May I become many.” The way one dreamer becomes many in the dream, the same way one Supreme Lord manifests into many forms. The same Existence of the Supreme Lord gives nourishment to all trees, plants and seeds on earth. Every particle of the earth is charged with the blissful Supreme Self, every drop of water contains the taste of Existence and every breeze of the wind is permeated by the Existence of Sachchidananda. Lord Krishna says in the seventh verse of chapter eight:

प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।

  ‘I am the light in the moon and the sun.’

पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ।

“I nourish all herbs by becoming Soma (the savoury moon) which is the repository of all savours.” (The Bhagavad Gita: 15.13)

The Soma that comes to the Lunar region from the realm of Chandra (moon) nourishes the trees, plants, foods, and herbs on the earth. Our body gets nourishment from foods and plants and our mind shines forth with the power of that. How joyous is the Lila of the blissful Lord! He, the same Blissful
Supreme Lord, assumes a form and descends on earth as Love-incarnate Lord Krishna to awaken the dormant blissful nature of His Bhaktas (devotees).

All the earthly pleasures of smell, taste, sight, hearing and touch are sensual pleasures. Lord Shrikrishna decided to give the transcendental (free from passions) joy on the full moon night of ‘Sharad Punam’: “I will play on my flute, and those who are deserving, will get to listen to the blissful sound of the Beej mantra- ‘Klim’”.

The virtuous great souls, Gopis hurriedly rushed to the forest. It is the autumnal full moon night (of Sharad Punam) and the atmosphere is pure and calm. Already being omniscient, Lord Krishna admonished the Gopis for the sake of religious teaching, “What is the purpose of your coming to this forest at this time? Have you all come to see the forest full of creepers in bloom, laden with multicoloured flowers, plants and trees illuminated by the bright shining of the full moon on the night of Sharad Punam? All right! So having seen it already, now you return to your homes and serve your children, husbands, in-laws etc.”

Gopis are not ordinary souls. Even Sage Narada, Uddhava and Arujuna learnt devotional love from these Gopis.

Gopis say, “Oh divine Instructor! We have come here to enjoy transcendental bliss. All customs and manners and religious duties have their limitations; and the goal of all duties is to become a liberated soul, blessed soul, by attaining the Prasada of the Sachchidananda nature of Supreme Self. Keshav, who you are! We know that, and if you wish to send us back to our homes then we say to you that we have actually come here to our home only. The real home of the Jiva (Soul) is God. Home and family, practice of dharma and Anushthanas all are meant for developing dispassion, and the goal of dispassion is Bhakti Yoga, Jnana Yoga and Dhyana Yoga. Now you are teaching us to go back! Madhava! The one who has been captivated by your divine nectar of Shabda Brahman, of transcendental bliss (lit. lips overflowing with nectar); has lost all attraction for material enjoyments.”

Hearing the piteous appeal of the Gopis, Lord Krishna- the Master of all Yogas, dressed in yellow silk, wearing a flower garland around his neck, smiled gently within the cheeks and all of a sudden emerged in many numbers among every pair of Gopis standing in a circle, appearing as one Krishna standing by each and every Gopi! Thousands of Gopis, each one having Krishna with her, participated in the divine Raasa Dance. Heavenly divine trumpets began to play on their own. Heavenly flowers began to shower. God incarnates in the form of a human being only to shower His grace on His devotees. And He performs such Lilas, that by seeing or listening to them, the Jivas become averse to carnal pleasures and turn to divine joy.

King Parikshit asked Shukadevaji: “Gopis considered Lord Krishna to be their supreme beloved paramour. They did not know His real nature as the Supreme Brahman, as Antaryamin, (the Inner Ruler).  Then how was it possible for them to be freed from the Samsara and attain transcendental bliss?”

Shri Shukadevaji says: “Shishupala, the king of Chedi, was enviously connected with the Lord while Gopis were connected with the love of a paramour, Kansa was connected with feelings of enmity and fear. Someone is connected through love, another with some different Bhava (emotion); but all are connected with the same Supreme Brahman, Supreme Self. When modifications of the mind are connected with God, they become divine.”

Who you are, and with what sort of sentiments you are attached with the Lord is of no importance. The all important factor is to whom you are connected. With whatever sentiments you become attached to God, you will invariably get divine joy. Absolute peace and bliss cannot be attained without divine joy. No doubt Japa, meditation and remembrance are helpful in attaining That, but the full moon night of the Sharad Punam enhances it tremendously. On such an auspicious night, you too surrender yourself to the divine Existence by doing some Japa-meditation and thus become immersed in the Supreme Lord to arouse divine joy and happiness within.

Take benefits of the Nectarine Kheer

Sattvic rays of the moon fall on the earth in the night of Sharad Punam. You all must avail yourselves of its benefits. Prepare Kheer during night. Add 200 gm of cooked rice to 1 litre of milk and boil it till it effervesces 2-4 times. The Kheer is ready. Do not add cashews, almonds or pistachios; otherwise, it will put an undesirable load on the kidneys. Add 1-2 seeds of black pepper per person into the milk and boil it so that the Vayu Dosha of the milk is neutralized. Put the Kheer in the moonlight from 8:30 to 10-11 p.m. (around 2-3 hours), and eat only a small quantity thereof. Eat rest of the Kheer in the morning, because more the night advances, the milder becomes the digestive fire. While eating Kheer, make a gesture of offering a little to me too: “Have it! Babaji!” Saints and God are hungry for your Bhava. That moment, your heart will be purified with divine feelings and the Kheer will turn into Prasada.

Deshi cow’s milk is considered as nectar on the earth; but to condense it or adding dry fruits thereto, renders the Kheer heavy to digest, making it a spoiled food. The more condensed the milk, the more difficult it is to digest. Eventually the undigested milk turns into Aama (undigested food) which may cause many diseases, tumours and even cancer.

Get Health Benefits during Sharad Purnima

During the days after Vijaya Dashmi, from ekadashi till the full moon night, special types of rays are reflected from the moon, which nourish the plants, and also increase joy and health. During these days, moon-gazing is especially beneficial. If possible, thread a needle in the moonlight. This improves the eyesight. If the moonlight falls on the navel of a pregnant woman, the foetus in the womb becomes more influential and cheerful.

Prepare a mixture of Deshi cow’s ghee, honey and triphala powder and put it under the moon light for the entire night. Store it in a glass jar in the morning. Take 10 gm twice a day- morning and evening. I consumed it for 60 days and I got rid of my spectacles!

Those who wish to prepare Triphala Rasayana should prepare that, those wishing to prepare Kheer should do that and have it as the nectarine Prasada, those willing to improve their eye sight should do Trataka (looking with fixed gaze) on the moon; but all of you must get sanctified in the Self-effulgence, in the auspicious, blissful peace, devotion and love of the bliss personified Lord by contemplating on Him.


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